#Kavyotsav -2
बेनूर सा है पूरा बंजर और बेरंग सी ये फिजायें,
चांदनी भी बहती है अब नस-नस में नासूर बनके !!
लफ्ज़ भी सूखे मेरे, फंस के तेरी बेवफाई के दलदल में
ख्वाहिशें चुन ली दिवार में, इश्क के दरवाजे को बंद करके !!
फिर भी तेरी याद दीवारों से आये ,
दिनरात कोई आवाज़ मेरी कानों से टकराये ...
जानी पहचानी कोई आहट, दिल पे दस्तक मेरे दिए जाये ,
झूठे ख्वाबों से हूँ परेशां और मेरे गम को हवा दिए जाए !!
दो कदम साथ मेरे चलते थे, साथ साथ गिरते और संभलते थे,
जाने किस मोड़ पे वोह छूट गए , निशाँ उसके वफ़ा को छलते हैं
धूप में सेकीं थी वफ़ा फिर भी .. जाने क्यूँ बर्फ सी पिघल जाये !
सूखे दिल पे ग़मों की बारिश क्यूँ ? यूँ सताने की हमको साजिश क्यूँ ?
दिल मेरा तडपे जब बहारों को , पतज़ड से मेरी नवाजिश क्यूँ ?
धागे से सिल लिए थे दर्द फिर भी , जाने क्यूँ तार तार हो जाए !
जानी पहचानी कोई आहट, दिल पे दस्तक मेरे दिए जाये ,
अब न दो साद कोई आवाज़ , चुपकिदी भी शोर ही मचा जाए !!!!