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Nazm-"उचटी नींदें"
एक वो भी दौर था
जिसमें सिर्फ़ तुम ही तुम थे,
एक ये भी दौर है
जिसमें बस मैं ही मैं हूँ।
निचोड़ती रहती हैं तन्हाईयाँ दिन के लिबास से भीगी हुयी यादें,
टप टप गिरती रहती है पलकों पे पिघली हुयी मोम की तरह,
आँखें जलती रहती हैं दोनों आफ़ताब की मानिंद।
ये ज़र्द बदन खिंचते खिंचते साँसें
जल उठती हैं तश्नगी की आग में,
रात की सरहद तक जाते जाते रूहें
बिखर जाती हैं फ़ज़ा में ख़ुश्बू की तरह,
जिस्म फूल की तरह
शब की शाख़ पे पड़े
हिलता रहता है सहर तक।
आँखों से निकलती रहती हैं रात भर चटखी हुयी आवाज़ें
रात भर टाँकता रहता हूँ नींदों को सलवटो में,
कोई सफ़्हा नहीं पलटता किसी ख़्वाब का।
कल तुम ही तुम थे
आज मैं ही मैं हूँ
एक वो भी दौर था
एक ये भी दौर है।
Written by-"NISHANT"