चुनावी - सरगर्मियाँ
सियासी गहमा-गहमी में
नेताओं का मन कहता है,
जनमानस की कमजोरी का
पूरा लाभ उठाना है,
झूठे वादों और जुमलों से
सब का मन हर्षाना है,
आपस में लड़वाकर सबको अपना स्वार्थ भुनाना है।
जाति, धर्म, सम्प्रदाय की बातें
जन - जन तक पहुँचाना है,
देशहित को दबा काँख में
भ्रष्टाचार बढ़ाना है,
नैतिकता खो रहा देश अब
अपराध और बढ़ाना है,
आपस में लड़वाकर सबको अपना स्वार्थ भुनाना है।
चरखे को कर दरकिनार,
गाँधी नाम कमाना है,
सूट- बूट पहिन कर भइया
देश - विदेश में जाना है,
जनता के हित गा - गा कर
निज हित पार लगाना है,
आपस में लड़वाकर सबको अपना स्वार्थ भुनाना है।
सोच समझ लो जनता अब
वोट कीमती बड़ा तुम्हारा ,
हर नेता का दामन परखो
फिर सर माथ उसे ही रख लो,
न आपस में लड़ो कभी
न उनको स्वार्थ भुनाने दो,
लोकतंत्र अपना है, समझो! सुयोग्य प्रतिनिधि लाना है।
~बोधमिता