प्रेम...बस प्रेम है
अनछुए,अनदेखे, अहसास
जो अनुभव किये हमने!
जो समाए हैं अंतस में
चिरस्थाई बन कर!
वो यादें हैं प्रेम...
बचपन मे किसी ने
कर दिया था होमवर्क
मार से बचाने के लिए!
किसी ने कवर चढ़ाए थे
मेरी किताबों पर!
वो परवाह थी प्रेम.....
वो फलवाली अम्मा रोज
देती थी कोई एक फल
अपने आखिरी दिन तक!
एक बड़ी लड़की मुझे रोज
सायकल पर घुमाती थी!
वो वात्सल्य था प्रेम....
मुझे अस्पताल में देखने
हर दिन आया करती थी ...
एक, बेवजह खिड़की पर
इंतज़ार करती थी मेरा
देख कर बस मुस्कुराती थी !
वो मुस्कुराहट थी प्रेम.....
खाना खाते हुए हाथ से
बाटी चूर दी दाल में मेरी..
किसी ने मेरी जरूरत पर
अपने पिता से झूठ बोला!
कोई मेरी हार पे रोया था!
वो अपनत्व था प्रेम.....
दोस्त, प्रेम तो अनुभव है
प्रेम निःस्वार्थ है, रिश्ता नही
ये अहसास है, बन्धन नही...
हाँ, याद रखना मेरी बात!
अटूट प्रेम..अनवरत आँसू!
आंखों से बहता है प्रेम.....