फर्क पड़ता है तब
जब दिखाती हूं
कोई फर्क पड़ता नहीं/
बहुत दुखता है जब
दिखाती हूं कोई दर्द नहीं/
बहुत कुछ कहना हो
तो ओढ़ लेती हूं खामोशी/
पास आना चाहती हूं
तो खुद को खींच लेती हूं
तुझ से दूर
कितने रोड़े अटकाती हू
खुद को तेरी समझने की कोशिश में/
और फिर खुद ही लगा भी देती हूं इलज़ाम
कि तू तो मुझे समजता ही नहीं....
-KR