ईक झलक दिखला के,जिंदा मार गई ,
कौन थी वो...
ईक बिजली की तरह, गिर गई मुजपे ,
कौन थी वो...
बारीश की बुंदे बनके,बरस गई मुजपे ,
कौन थी वो...
चांदनी बनकर ,ईक चमक दे गई ,
कौन थी वो...
आसमां से गिरी या,पाताल से पता न चला,
कौन थी वो...
मदहोश होके देखता रहा,पर समज ना पाया,
कौन थी वो...
सवाल सवाल ही रेह गया"राज"की आखीर,
कौन थी वो....