"स्त्री की आत्म कथा"
मन है उदास, घटी अब प्यास,
मनाऊं खुशी क्या, जो बिटिया है आई,
दानव समाज में घूम रहे,
इस दर्द को कैसे बताएगी माई।
नियत ईमान गया किस ओर,
कहूँ किसको, कौन लागत हैं भाई,
बदला समाज, लगी चहुँ आग,
निहार कुकृत्य है लाज लजाई।।
नारी बेचारी, लचारी भई,
क्या दोष है नारी जो नारी कहाए,
दोष चाहे जो करे सो करे,
पर पाप की गठरी है सर पर मढाये,
पानी रहा न रहा अब पानी,
काम का चश्मा तो सब हैं चढ़ाए,
बीत गए जो वो दिन नहीं बहुरेंगे,
नियत में है अब खोंट समाई।।
गाँव गिरांव गली डेहरी,
निकलूँ किस ओर निगाह गड़ी है,
चिर हरण को है ठाड़ दुशासन,
द्रोपती अब विपदा में पड़ी है,
कलयुग में कहाँ कृष्ण मिलेंगे,
बुलाऊँ किसे हुए निर्मम रिश्ते,
सूझे न ठावँ, चलूँ किस गाँव,
जहाँ जनभावना साथ खड़ी है।।
रिश्ते कलंकित होने लगे,
कहाँ झूलन को मैं लगाउंगी झूला,
गिरने लगे नजरों में जो अपने ही,
लोभ की तृष्णा में है जग फुला,
दानव दहेज जो क्या कम था,
अब देह मृगा नजरें ललचाई,
उतर के आओ सिंघासन से प्रभु,
आप बिना के जो लाज बचाई।।
राकेश कुमार पाण्डेय"सागर"
आज़मगढ, उत्तर प्रदेश