जो रोज़ की ज़रूरी चीज़ें हैं
उन्हें सामने की शेल्फ में रखो , बाकी नीचे
बचपन से सुनते आए बड़ों की बातें
फिर भी अक्सर अदलबदल हो जाती हैं ..
गैर ज़रूरी उपर आ जाती हैं ,
ज़िन्दगी के करीने में लम्हों का रख रखाव ;
न जाने कब संभालना आएगा
लगता है अभी भी कुछ बचपन बचा है मुझमें ...