जो साथ मेरे बैठी है
लोग केहते जिसे जिन्दगी है
मायूस मैं मौन यह मासूम
ना जाने क्यू बेवजह थेरी है
खोयी है अपने मैं
चाहतों से है नाराज़ कुछ
दुआओं से है डरी हुई
प्यार के शब्द जैसे ज़हरी है
अपनो ने ही है मारा इसे
खुद गरज़ों ने कब बख्शा किसे
प्यार पैसों पे पलता है अब
खरीदारों की साज़िस बोहोत गहरी है
ज़माना हुआ ज़माने से रूबरु हुए
अरज़ा हुआ तसबबूर खुद का देखे
चाहत नहीं किसी दीदार की
आँखों मैं हसीन मौत आ थेहरी है
की कहती जिन्दगी अब उसे
रिशता ख़तम ए हर्जाई तुझसे
दूसरों के जीवन को अहमियत दी तूने
एक बार तो जीता, जो यह जिन्दगी तेरी है
रुतबे ने हकीकत से अंजान किया
गुरूर ने ख्वाहिशों का कत्ल किया
समाज के नियमों के अंधेरों मैं
समझ की जुबान बनी दोहरी है
राहों मैं गलत नहीं था कुछ
के राह ही तेरी गलत है
बेवजह ना मुझे कोष तू
ना इसमैं कोइ भूल मेरी है
तू ही वो कारण है
जिसका बना तू अंजाम है
की मायूसी के मौन मैं
आज आई जिन्दगी तेरी है