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शिर्षक- प्रेम कुठेहीनव्या रुपात भेटतं
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कधी आई बनुन स्वर्ग दाखवत
कधी बाबा बनुन खांद्यावर खेळवत
प्रेम कुठेही नव्या रूपात भेटतं
कधी मीत्र बनुन जगणं शिकवत
कधी प्रियकर बनुन आयुष्य हसवत
प्रेम कुठेही नव्या रुपात भेटतं
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सोनल सुनंदा श्रीधर
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