"आम आदमी को इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता। और तकलीफ में किसी की मदद करने और कुछ वैदिक मन्त्रों को बोलने से मेरा कोई धर्म नहीं छिन जाएगा।" कहना था उस मुस्लिम गाँव के बाशिन्दे का जहाँ दो घर हिन्दूओं के भी हैं। मैं बात कर रहा हूँ कोलकाता-मालदा के शेखपुरा गाँव की। 24 अप्रैल का दिन था वो, बिश्वजीत राजक कैंसर से लड़ाई हार गया था और पिता ईलाज के चलते इतने खाली हो चुके थे कि उनके पास अन्तिम सँस्कार तक के पैसे नहीं बचे थे। यहाँ तक कि घर में इतने लोग भी नहीं थे कि अर्थी को शमशान तक पहुँचा सके। हिन्दुस्तान के गाँवों में आज भी घर की बात घर ही की नहीं, गाँव की होती है। थोड़ी ही देर में खबर पूरे गाँव को लग गयी थी।
घर के बाहर मुस्लिम भाई इकट्ठा होने लगे। उन्होंने बिश्वजीत के पिता से अर्थी सजाने और उठाने की अनुमति ली। 3 कि.मी. दूर शमशान तक 'राम नाम सत्य है' कहते पहुँचे, दाह-सँस्कार किया और इतना ही नहीं, गाँव ही के बाहर से गुजरती नदी में ससम्मान फूल विसर्जित किए और स्नान किया।
आज के माहौल में ये दिल छूने वाले वाकये तसल्ली देते हैं कि साँस अभी चल रही है। जब तक आम आदमी की ये भावनाएँ जिन्दा हैं, जो कि हमेशा रहेंगी, समझ लो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। अभी भी बहुत कुछ हो सकता है। हम एक थे और एक रहेंगे। अरे! आग सुलगने के लिए तो एक चिंगारी ही काफी होती है। बस, आपको और मुझे तो इन बची चिंगारियों को सम्भालना है जैसे तेज हवाओं के बीच हम दिए की लौ को हम अपने दोनों हाथों के बीच ले लेते हैं।