*पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।*
*एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥*
? अर्थात् ?
*यद्यपि धन, संपति, मित्र, स्त्री, राज्य बार-बार मिल सकते हैं*
*लेकिन मनुष्य-शरीर केवल एक ही बार प्राप्त होता है।*
*एक बार नष्ट हो जाने के बाद पुनः प्राप्त करना असंभव है।*
*इसलिए मनुष्य को शुभ कार्य करके इस देह का सदुपयोग करना चाहिए।*
*जो मनुष्य प्रत्येक दिन सत्कार्य करते हैं, वास्तव में उनका ही जीवन सफल होता है..*
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:- जय लंकेश