आख़री ख़्वाहिश….
बयाँ-ए-हाल कैसे करे दिल-ए-बेताबी का
जिसे क़ब्र में भी सब्र नसीब न हो सकी ....
उम्र भर मुहब्बत के गुल खिलाए जिसने
बेरहम! अश्क़ के दो फूल भी ना चढ़ा सकी…
बड़ी बेअदबी होगी ग़र मैं सो गया और
मेरी क़ब्र पे वो आँसू बहाने आ गए तो…
हालात क्या होंगे इन बदनसीब आँखों के
जो बंद होने से पहले दीदार-ए -यार ना कर सकी..!
-देवांशु पटेल