जीवन रूपी जंगल में,
हर बार में भागा हूं,
उस मृग के पीछे,
घने जंगल में,
जिसको मार कर ही अपनी भूख मिटा सकता हूं,
पर हर दफा,
जब जब तरकश से तीर निकाला हूं,
निशाना साधे उसपे,
आंखो से ओझल हो जाता वो,
आंख मिचौली खेलता है,
पर हाथ कभी ना आता,
पर ये भी जनता हूं,
जिस दिन मै मार पाऊंगा उसे,
वो रात मेरा भोजन पूर्ण हो जाएगा,
और फिर मेरे जीवन का उद्देश्य भी।
© Krishna Katyayan 2018