भारत का संविधान स्त्री पुरुष में भेद नहीं करता वह दोनों को बराबर मानता है। जैसे कानून दलित और सवर्ण को एक दृष्टि से देखता है लेकिन हकीकत में ना तो स्त्री पुरुष को बराबर माना जाता है और ना ही दलित सवर्ण को। हैरानी की बात है कि हमारी परंपरा इसकी इजाजत देती है उससे ज्यादा हैरानी इस बात की है इसी परंपरा में यह भी कहा गया है-' यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता'। यानी वह लक्ष्मी और सरस्वती भी और दुर्गा भी और चंडी भी है लेकिन सती भी उसे ही होना होता है। हमारी परंपरा में सती सावित्री तो है सती सत्यवान नहीं है। पति युद्ध में मरे तो पत्नी को जौहर करना होता है। इसलिए जब जब स्त्रीआवाज उठाती है उसे सम्मान से नहीं देखा जाता उसके चरित्र पर लांछन लगाया जाता है।
यही हमारे समाज की हकीकत है ।