उसको खुद खुशी की आदत है
उसे बस खुशी की चाहत है,
सुबह निकलता है घर से
ताने सुन सुन के
दर दर भटकता
फाइल के ढेर के साथ
हर जगह निराशा पाकर
शाम को उसी पिंजड़े में वापस
वो ऐसा काठ का पुतला है
जो अभी तक उसी पिंजड़े से
बंधा हुआ हताश हो लौटे
दो रोटी की आशा में
थाली तो परोसी सब्जी दाल से
पर एक थाली कानों में भी खनखनाती सुनी
पेट भरकर वापस कमरे में
सुबह निकलने की तैयारी
फिर एक मुस्कान और हताशा की नींद
अगले दिन फिर वही
खुद खुशी की राह
ये वो आदमी है
जो खुद ही खुद
जिम्मेदारी से बांधे हुए है
चाह कर खुद को आजाद
नहीं कर पाता किसी
बंधन से कैसे करे
खुद खुशी जो रोज कर
रहा अब उसी से
खुद को खुश रखें हुए है
जय जिनेन्द्र