अभी के दौर में ऐसा है कि अपने धर्म को माननेवाले लोग 'अपने धर्म को ही श्रेष्ठ' मानते हैं।
यह मानना भी चाहिए
कोई ग़लत बात नहीं है।
किन्तु मेरा 'धर्म ही श्रेष्ठ' है, यह साबित करने में 'अधर्म करना' सबसे बुरी बात है।
अपने धर्म के प्रति प्रेम रखना और मानना चाहिए ।
ऐसे ही अन्य धर्मों के प्रति आदर भाव भी व्यक्त करना चाहिए।
हमारी जो यह सोच है तो एक अच्छे धर्म को माननेवाले अच्छे व्यक्ति में हमारी गणना सत्य के साथ संपादित होगी।
मानवता ही सभी धर्मों का मुख्य सार है।
बस इतना जान लेने वाला इंसान किसी भी धर्म का हो उसका धर्म अपने-आप श्रेष्ठ हो जाता है।