तेरी मेहरबानियों का सिलसिला कुछ इस कदर छाया है,
सूखी पड़ी इस रूह में जैसे सावन उतर आया है।
न कोई शिकवा रहा अब, न कल की कोई फिक्र रही,
इश्क ने जब से इन धड़कनों को अपना बनाया है।
तेरी नजर के करम ने मुझे जीना सिखा दिया,
खामोश थे जो लफ्ज़, उन्हें गीत बना दिया।
यूँ तो मुसाफिर थे हम तन्हाई की राहों के,
पर तेरी चाहत ने हर मंजर को जन्नत बना दिया।