मैं एक साधारण-सी लड़की हूँ,
सजने-संवरने का हुनर नहीं मेरा।
चेहरे पे वो चाँद-सा नूर नहीं,
साँवलेपन की नर्मी है—मैं अपनी राह में स्थिर हूँ।
भीड़ की रौनक मुझे भाती नहीं,
ख़ामोशी में मेरी दोस्ती बसती है।
मेरी आँखों में वो चमक नहीं,
जो हर ख़्वाब में तुम तलाशते हो।
मेरी नज़र बस सुकून की आदत में डूबी है,
तो फिर क्यों वक़्त ज़ाया करते हो मेरे पीछे?
जाओ, ढूँढ लो वो चाँद-सा चेहरा कहीं,
इस दुनिया में हुस्न की कोई कमी नहीं।
तुम्हें मिल जाएगी वो नूर वाली,
आँखों में जादू लिए कोई और हसीन।
और मैं रहूँगी अपनी सादगी की छाँव में,
ख़ामोशी की रौशनी में, अपने रंगीन जीवन में।
writer by अमृता सिंह ✍🏽