युद्ध हमारे पुरखों ने भी लड़े थे
वे लड़े थे बीमारी से गरीबी से साहूकारों की हैवानियत से
भूँख से जर्जर शरीर से अपने मासूमों की चीख से
लड़े थे जातिवाद के चक्र व्यूह से
वो लड़े थे बिना धोती के कफन के रोटी के
बस उन्हें तमगे नहीं दिए गये थे
न ही नाम लिखे गए दीवारों पर
नहीं इतिहास के पन्नों पर
उन्हें नजर अंदाज कर दिया समाज ने
धर्म ने गांव ने शहर ने देश ने उनके अपनो ने
अनायाश उन्होंने जंग को खत्म नहीं किया
वे वीर गति को प्रात हुए
मगर किसकी को भनक तक नहीं होने दिया
न ही हिसाब मांगा अपनी
मर्दानगी का जवानी का कहानी का
उन्होंने जंग की कुछ बेशकीमती यादें अपनी
पीढ़ियों को सुनाई और चल बसे
साहूकारों की बनाई कहानी के पात्रों के संग
बैठ कर भैंसे पर जिन्होंने ने नसीब नहीं होने दिया जिंदगी भर
आराम खाना पानी और रहना
नाही ही वादा किया अगले जन्म में फिर से जंग लड़ने का
क्यूंकि भरोसा उठ गया ऊपर से ओर ऊपर वाले से
बे लौटेंगे तो बहस करेंगे कोर्ट में
बिना वकील के सबूत के गवाह के
और में दावे के साथ कह सकता हूं
उनकी जीत मानी जाएगी हर जंग में
बिना तलवार के भाले के तीर के तोप के