मनुष्यता ही परम धर्म है ( कविता )
रचनाकार/ कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
॥ मनुष्यता का अभ्युदय ॥
न पंथ श्रेष्ठ है, न मत विशिष्ट है,
मानवता ही इस जग में परम इष्ट है।
अहंकार का त्याग कर, जो पर-हित में संलग्र है,
वही मनुज चैतन्य है, वही ज्ञान में मग्र है।
हृदय-सिंधु में जिसके, करुणा का नव ज्वार हो,
पर-दु:ख देख जो द्रवित हो, ऐसा ही आचार हो।
जाति-पांति के दुर्ग तोड़, जो समरसता को धारे,
वही सत्य का पुत्र है, जो गिरते को सदा उबारे।
रक्त वर्ण सबका एक , एक ही प्राण-स्पंदन,
भेदभाव की राख तज, करें मानवता का वंदन।
परोपकार की वेदी पर, जो निज स्वार्थ देता आहुति,
वही देवत्व को प्राप्त है, वही विश्व की पावन विभूति।
शस्त्रों में न शक्ति है, न है शास्त्रों के पांडित्य में,
ईश्वर का वास निहित है, बस मनुष्य के सामिप्य में।
अतः जाग रे आत्मन्! तू निज धर्म को पहचान कभी
मानव होकर मानव की, सेवा को ही निज मान अभि।
जहाँ संवेदना शून्य हो, वह देह मात्र पाषाण है,
मुरझाए अधरों पर मुस्कान दे, वही पुण्य प्रमाण है।
पर-पीड़ा की अग्नि में, जिसका अंतर्मन तपता है,
मन्दिर के घंटों से अधिक, उसका मौन प्रार्थना तपता है।
न स्वर्ण की आभा महान है, न किरीटों का सम्मान है,
जो दीन के अश्रु पोंछ सके, वही पुरुष शक्तिमान है।
विघटित होते इस विश्व में, प्रेम ही एकमात्र सेतु है,
जीना वही सार्थक है, जो जिया जाए पर-हेतु है।
न संकुचित सीमाओं में, सत्य का विस्तार होता है,
वही मस्तक वंदनीय है, जिसमें परोपकार होता है।
क्या हुआ यदि हस्त रेखाएँ, वैभव को न छू सकीं?
अभि हृदय में दया शेष है, तो कोई कमी न रह सकीं।
जो स्वयंभू के द्वार पर, केवल स्वयं को माँगता,
वह मनुष्यता के मर्म को, तिल मात्र भी न जानता।
अश्रु किसी के नयन से, यदि धरा पर गिरते हों कहीं
और शब्द सांत्वना के, मरहम बनकर खिलते हों कहीं
तो समझ लेना कि तूने, पा लिया निर्वाण यहॉं
यही मानव-धर्म का, सबसे प्रखर प्रमाण यहॉं
अंधकार को कोसने से, ज्योति न प्रज्वलित होगी कभी
एक दीप जो तू जला दे, सृष्टि फिर संकलित होगी अभि
रचनाकार/ कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'