Hindi Quote in Shayri by JUGAL KISHORE SHARMA

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ग़ज़ल —
उस रात तूफ़ान छत उड़ा ले गई,
तमाम उम्र की कमाई जमा ले गई।

काग़ज़ों में सुरक्षित था जो मेरा घर,
हक़ीक़त में फ़ाइल जद वही ले गई।

राहत के नाम पर आई जो हुकूमत,
जस्टिस वर्मा से उम्मीद भी ले गई।

थाने में दर्ज़ हुआ जब दर्द-ए-हादसा,
रसीद, गवाह, ईमान जर्फ सभी ले गई।

अदालत पहुँचा तो कूब तारीख़ें मिलीं,
न्याय की उम्र भी पोशा पेशी ले गई।

वुकला ने कहा— “वक़्त लगेगा”,
जेब से धैर्य फकत रेजगारी ले गई।

जो आका रहबर आया था आँसू पोंछने,
कैमरे के बाद खलिश ज़ुबान बदल ले गई।

अफ़सर ने मर्ज सर्वे किया आँखों से,
मगर नज़र कब मेरी ज़मीन ले गई।

यह आपदा नहीं, दस्तूर है मुल्क का,
हर आँधी कुछ नहीं — सब कुछ ले गई।

जो बचा था रैम या ज़मीर के तहख़ाने में,
वो भी चुप्पी की सरकारी फजीहत ले गई।

जुगल किशोर शर्मा बीकानेर 24 01 2026

Hindi Shayri by JUGAL KISHORE SHARMA : 112013898
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