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ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત Matrubharti Verified

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क्या कहे आज की सुबह और ये कोहरा?
मंद मंद समीर जब तन को छुता है।
भीतर की सरोवर सी आग को शमा देता है।
बड़ी हलचल सी उठी थी,
लावा सी जलन थी,
धुआं धुआं सा श्वास तले था,
पर ये ठंड की ठिठुरती सी लहर,
मन को जैसे गोदी में बिठाया हो,
माथे पर स्नेह से हाथ रखा हो
और सुकून सी एक नींद में
सारे बाहरी भावों को भीतर में आनंद दे रहा है।।।।

- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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કોમળ ફૂલની કેવી અવદશા હોય છે,
ખીલે છે કાંટાની વચ્ચે તેમછતાં
પગમાં ચાદર બનીને કચડાઈ જાય છે..
તો પણ કેહવાય છે કે કુદરતની
સુંદર અને રંગબેરંગી કારીગરી.....
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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अपेक्षाएं निष्फलता को जन्म देती है
और इच्छाएं विकृति को,
जब इच्छा और अपेक्षा छोड़ा जाए तो इंसान परम आनंद को प्राप्त कर सकता है।।
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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जब तक इंसान टूटकर बिखर नहीं जाता,
तब तक वह कुछ नहीं बन पाता।
टूटा हुआ इंसान
खुद को जोड़ देता है,
खुद का होना ही
कामयाबी की तैयारी है।।।
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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हमे लगता है कि
मजा तो मंजिल तक पहुंचने से मिलता है,
पर ऐसा नहीं होता ,
क्योंकि जब भी हम मंजिल के बारे में याद करते है तो
मंजिल तक पहुंचने का सफर ही बेहतरीन लगता है।।
मंजिल मिलने के बाद मंजिल में मजा नहीं मिलता
पर सफर का अद्भुत आनंद होता है।।
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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मैं पूरा नहीं, पर अधूरा तो हूं,
मुझे सब कुछ आता नहीं ,
पर कुछ तो सिखा हुआ हूं ।
मैं बेहतर तो नहीं हूं,
पर जितना भी हूं,
उसको बेहतर तराशता हूं।


- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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ईश्वर की रची हुई रचना में सबसे सुकून देने वाली जो कोई रचना है वह आनंद या खुशी है। जिसने सही मायने मेंआनंद और खुशी को जान लिया वह कर्म से मुक्त हो गया। हम आनंद की प्राप्ति के लिए हर जगह भटकते रहते है पर हमें वहां आनंद नहीं मिलता। हम बाहरी साधनों में आनंद की प्राप्ति के लिए खोज लगाते है, पर भीतर में कभी नहीं खोजते। सच्ची खुशी या आनंद भीतर में है। जब भीतर की खुशी या आनंद जान जाए तब सभी बंधन से मुक्त हो जायेंगे। यह जानना और मिलना हमारे लिए असंभव सा है।।।।।
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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हाथ से रेत सरकती रही,
वैसे ही वक्त बहता रहा।
चंद लम्हों में मुट्ठी खाली सी हो गई,
फिर से वही रेत को वही मुट्ठी से उठाया,
पर बीता हुआ वह वक्त हाथों में नहीं आया,
बस,छूटे हुए लम्हों के निशान ही रह गए।।।।
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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किताब के कुछ पन्ने इतने हसीन होते है कि
बस, पूरी किताब वैसी ही हो,
और हमारी जिंदगी के चंद लम्हे ही हसीन होते है
लगता है वही पूरी जिंदगी हो।।
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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મૃગજળ છે એ તો કેમ એમાં તરી શકાય, જીવતર,
ડૂબકી મારોને માથું જમીન સાથે ભટકાય,જીવતર.
અથડવાનો કોઈ અવાજ નથી હોતો જીવતર,
વાગ્યાનો કોઈ ઈલાજ નથી હોતો જીવતર,
ક્ષિતિજ સમ વેરાય છે દૂરને દૂર મારગ,
થાક્યા પછી જ સમજાય છે જીવતર..
- ભૂપેન પટેલ અજ્ઞાત

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