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ArUu

ArUu Matrubharti Verified

@aruuprajapat6784
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मैं ऐसी क्यों हो गई हूं ?
कोई भी ऐसा क्यों हो जाता है?
कैसे हो सकता है कोई इतना निष्ठुर।
कोई कैसे इतने बड़े घर में अकेले रह सकता है।
पूरे दिन ,पूरे हफ्ते, पूरे महीने...
बिना किसी से बात किए...
मैं कैसे अकेले रहना सिख सकती हूं।
क्यों मुझे अब किसी की दरकार नहीं...?
शायद किसी बहुत अपने को खोने के बाद इंसान निष्ठुर हो जाता है।
उसे समझ आ जाता है कि दुनिया छलावा है
या वो फिर किसी को खोने से डरता है।
शायद इसलिए हो जाता है इंसान इतना निष्ठुर हृदयविहीन
और जब मैं खुद में खोई रहती हूं तब मुझे ये अकेलापन इतना डरावना नहीं लगता।
पर जब मुझे इसका अहसास होता है।
ये बहुत डरावना सा दिखता है
ArUu ✍️

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अब मैं अलार्म नहीं लगाती
क्योंकि अब मेरा जगने का मन नहीं करता। जब तक सोती हूं पूरी दुनियां भूल जाती हूं जगते ही जगत के झमेले याद आने लगते है ।मुझे किसी का इंतजार नहीं।
अब मुझे कही नहीं जाना होता।
ऐसा नहीं है कि जाने के लिए जगह नहीं है।
पर अब बस मन नहीं करता।
ArUu ✍️

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सोना सबको पसंद है
गहरी नींद सबको भाती हैं
पर कोई शारीरिक रूप से सो रहा है तो कोई मानसिक रूप से।
शारीरिक रूप से सोने वाले लोगों को उठाना फिर भी आसान है।
थोड़ी मेहनत करो तो वो उठ जाते है।
पर मानसिक रूप से सोए लोगों को उठाना बहुत कठिन है।
पर जो उठना ही नहीं चाहता उनको गहरी सुषुप्त अवस्था से उन्हें उठाना असंभव है

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हम भारतीय लोग भी कितने दोगले है न
हर किसी के फट्टे में टांग अड़ाना अच्छे से जानते है।
दोगले है
इसलिए कहते है कि ये नववर्ष हमारा नहीं
पर जब अंग्रेजों के दिए खेल की बात हो तो करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति जाग जाती है
बड़ा सा हुजूम उमड़ पड़ता है।
ईसाइयों के त्यौहारों पर सबको तुलसी पूजा याद आ गई
और घर में लगाने को एक पौधा नहीं मिल रहा इनको।
प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने की कोई कसर नहीं छोड़ते और बात करेंगे देशभक्ति की।
हां भाई हम भारतीय तो दोगले है।
ArUu ✍️

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एक दिन मैं इस दुनिया के सारे बंधन तोड़ दूंगी
एक दिन मैं वो चुनूंगी
जो मुझे चाहिए
ArUu ✍️

अच्छा मैंने सुना है कि आप जलते हो मुझसे
सच है क्या🙈😌
ArUu ✍️

इस अतरंगी-सी दुनिया में
वो एक मर्यादित-सा लड़का है—
जहाँ लोग चालाकी को हुनर समझते हैं,
वहाँ वो साफ़ नीयत को
अब भी आदत कहता है।
छल-कपट से कोसों दूर,
वो उन रास्तों पर चलता है
जहाँ भीड़ नहीं ...ज़मीर साथ चलता है।
स्त्रियों पर लिखे गए लाखों हर्फ़
वो है उन सभी का सादा-सा प्रत्युत्तर।
उसकी स्मृति में रहते है चंद नाम
ज़िम्मेदारी, मर्यादा,
विश्वास और प्रेम।
उसके कंधों पर
दिखावे का बोझ नहीं,
वचन टिके रहते हैं।
और आँखों में
वादों की थकान नहीं,
ईमान की शांत रोशनी है।
वो प्रेम करता है
अधिकार से नहीं, आदर से।
इस अतरंगी-सी दुनिया में
वो थोड़ा अकेला पर
बहुत पूरा लड़का है
और सच यही है—
इन्हीं जैसे लोग
दुनिया को अब भी
थामे हुए हैं।
ArUu ✍️

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मैंने जब देखा उसे पहली दफ़ा,
मुझे लगी
वो साधारण-सी एक लड़की।
अगली मर्तबा जब मिली,
उसके हाथों में थी कुल्हाड़ी
अन्याय की जड़ों पर
निर्भीक वार करती हुई।
फिर देखा एक दिन
उसको हाथों में करछी लिए
पर वो सिर्फ़ स्वादिष्ट भोजन नहीं पकाती
उसके मसालों में परंपरा थी, और
उसकी आँच पर अपने फैसलों की आज़ादी थी।
रसोई उसके लिए बंधन नहीं, एक प्रयोगशाला थी
जहाँ वो प्यार, प्रतिरोध और आत्मसम्मान
एक साथ गढ़ती थी।
कभी वो चूल्हे के पास खड़ी
पूरी दुनिया को संभाल रही होती,
तो कभी उसी धुएँ से
अपने सपनों की लकीरें खींचती।
कई बार जब देखा,
कभी वो नाज़ुक-सी किलकारी बन नई सृष्टि रचती,
कभी सुई–धागा थाम बिखरे रिश्तों को चुपचाप सीती।
कभी मशाल संग, अंधकार से टकराती
कभी झाड़ू उठाए,आंगन नहीं
सदियों की उपेक्षा साफ़ करती
उसके चेहरे पर था साहस,
आँखों में करुणा और जाग्रत चेतना
उसका दिमाग़ रसोई , रिश्ते और डर की सीमाओं में कैद नहीं था
वहाँ सवाल थे,तर्क थे,और
सच से नज़र मिलाने का पूरा हौसला भी था।
आख़िरी बार जब देखा,
उसके हाथों में थमी थी कलम
पर वो शब्द नहीं लिख रही थी,
वो उन पन्नों को आग लगा रही थी
जो उसे कमज़ोर बताते थे।
वो कलम एक ऐलान थी—
कि अब भविष्य उसके हाथों से रचा जाएगा।
उसका जेहन चार दीवारों तक सीमित नहीं था,
वहाँ पूरी कायनात थी और वह
उसके केंद्र में खड़ी मुस्कुरा रही थी।
ArUu ✍️

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मैंने जब देखा उसे पहली दफ़ा,
मुझे लगी
वो साधारण-सी एक स्त्री
अगली मर्तबा जब मिली,
उसके हाथों में थी कुल्हाड़ी
अन्याय की जड़ों पर
निर्भीक वार करती हुई।

फिर एक दिन देखा,
उसको करछी लिए
पर वो सिर्फ़ स्वादिष्ट भोजन नहीं पकाती
उसके मसालों में परंपरा थी, और
उसकी आँच पर अपने फैसलों की आज़ादी ।
कभी वो चूल्हे के पास खड़ी
पूरी दुनिया को संभाल रही होती,
तो कभी उसी धुएँ से
अपने सपनों की लकीरें खींचती।

कई बार जब देखा,
कभी सुई–धागा थामे,
बिखरे रिश्तों को फिर से
सीती हुई
कभी मशाल संग,
अंधकार से टकराती
कभी झाड़ू उठाए,
आंगन नहीं, सदियों की
उपेक्षा साफ़ करती हुई
उसके चेहरे पर था साहस,
आँखों में करुणा और जाग्रत चेतना

उसका दिमाग़
रसोई, रिश्तों और डर की सीमाओं में
क़ैद नहीं था;
वहाँ सवाल थे,तर्क थे,और सच से
नज़र मिलाने का पूरा हौसला भी था।

आख़िरी बार जब देखा,
उसके हाथों में थमी थी कलम
किसी और की कहानी लिखने नहीं,
अपना भविष्य खुद रचने के लिए।
उसका जेहन चार दीवारों तक
सीमित नहीं था, वहाँ पूरी कायनात थी
और वह
उसके केंद्र में खड़ी मुस्कुरा रही थी।
ArUu ✍️

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तुम खोजते रह जाओगे गुनाह मेरे
निकलूंगी फिर भी मैं बेगुनाह
ArUu ✍️