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हाँ, मैं आधुनिक स्त्री हूँ… मुझे दफ़्तर अकेले जाने से डर नहीं लगता। दफ़्तर से देर रात अकेले घर आने से भी नहीं डरती। नहीं डरती मैं अंधेरी रात में एक घर में अकेले होने से। नहीं डरती मैं सुनसान जगह अकेले पुरुषों के साथ काम करने से। भीड़ में अकेले चलने से भी नहीं डरती मैं। ना ही डरती हूँ सड़क के किनारे रुक कर अकेले कुछ खाने से। पर बहुत डरती हूँ मैं परिवार की राजनीति से। उन लोगों से भी जो अपने होने का दावा करके पीठ पीछे खंजर घोंपते हैं। बहुत डरती हूँ उन आँखों से जो मुस्कुराहट ओढ़े रहती हैं, पर भीतर ईर्ष्या का अंधेरा छुपाए होती हैं। डर लगता है उन रिश्तों से जहाँ अपनापन शब्दों में होता है, और हिसाब दिलों में। फिर भी… मैं हर सुबह खुद को समेटती हूँ, अपने आँसू आँखों में ही सिलती हूँ, और मुस्कुरा कर निकल पड़ती हूँ क्योंकि मैं जानती हूँ, मेरी लड़ाई दुनिया से कम, नक़ाब पहने चेहरों से ज़्यादा है। हाँ, मैं आधुनिक स्त्री हूँ… बाहर के अंधेरों से नहीं हारती, बस अपनों के भीतर बसे अंधेरों से हर रोज़ थोड़ा लड़ती हूँ… और फिर भी, हर रोज़ खुद को बचा लेती हूँ।
मुझे एक बात समझ नहीं आती ये औरते इतनी औरते कैसे होती है भाई बिल्कुल ही खुद के अस्तित्व को नकारती। इन्हें किसी एक राह पर छोड़ दो, ये उसी राह पर चलती रहेगी। राह सही हो या गलत इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता बस ये अपनी तरफ से कभी सही राह खोजने की कोशिश नहीं करती। इन पर जितने चाहे रिवाज-कुरीतियां थोप दो ये बस बिना सिर उठाए उनका अनुसरण करती रहेगी और जो इनके लिए आवाज उठाए उन्हें तो वो अलग ही हीन नजर से देखती है जैसे वो उनके बने बनाए ढर्रे पर आग लगा देगी। कभी कभी लगता है ये औरतें डरती है जिस सुविधा क्षेत्र में वो अभी रह रही हैं उसे खोने से या जो उन्हें आसानी से हासिल है उसके छीन जाने से। शायद अपने लिए आसमान खोजने में भी वो डरती है क्योंकि उसके लिए अथाह गहराई में उतरना पड़ता है। वो उन स्त्रियों से भी डरती है जो पुरुषों के बुने चक्रव्यूह को ताड़ने का साहस रखती हैं। वो डरती है शायद खुद की असीमित शक्तियों से भी । सच मैं आज तक नहीं समझ पायी । ये औरते इतनी औरते क्यों होती है।
मैं हमेशा देर कर देती हूं लोगों को पढ़ने इरादे समझने झूठ की परतें हटाने और सच को जगह दिलाने में छल करते ज़हर घोलते कपट दिखाते सच छुपाते चेहरों को पहचानने में मैं हमेशा देर कर देती हूं खुद को रिझाने दिल को समझाने खामोशी ओढ़ने आँसुओं को रोकने टूट कर संभलने खोखली यादें मिटाने और खुद से नज़रें मिलाने में
एक अंधेरे कमरे में खड़ी थी। बहुत अंधेरा...इतना कि रोशनी की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैं थी और मेरी एक उम्मीद थी। मैं उस उम्मीद के साथ उस अंधेरे कमरे में सांस ले पा रही थी। कभी कभी किसी खिड़की से कोई रोशनी आती तो मैं मजबूती से उस खिड़की को बंद कर देती। संभवतः अब मुझे अंधेरा पसंद आने लगा था सब कुछ ठीक था। फिर एक दिन कुछ हुआ बाहर शायद तूफान था या अतिवृष्टि मेरी उम्मीद को अपने साथ बहा ले गया। अब मुझे वहां घुटन हो रही थी। बहुत घुटन... मैं खड़ी ये सोच रही थी कि इस सब का जिम्मेदार कौन था? वो लोग जिन्होंने मुझे उस अंधेरे कमरे में धकेला या फिर वो मैं खुद जो सब कुछ जानते हुए खुद के साथ छल करती रही। पर जो भी हो सबसे ज्यादा आहत और छली तो बस मैं ही गई थी
Dear girls, जब तुम माँ बन जाओ, तो अपने बेटों को सिखाना औरत का सम्मान कैसे किया जाता है। सिखाना— कैसे उसके नियमित कामों की कद्र की जाए, कैसे “ये तो उसका काम है” जैसी सोच को खत्म किया जाए। उन्हें ये भी सिखाना कि औरत महज़ एक वस्तु नहीं होती, वो भी उतनी ही इंसान है जितना वो खुद हैं। सिखाना— औरतों के काम में हाथ बँटाना, और उससे भी ज़्यादा उसके काम को समझना। सिखाना— ना का मतलब ना होता है, और खामोशी हमेशा हाँ नहीं होती। सिखाना— आवाज़ ऊँची करने से कोई बड़ा नहीं हो जाता, और सम्मान माँगना नहीं, देना सीखा जाता है। क्योंकि कल वही बेटे किसी की दुनिया होंगे… और ये तुम पर है कि वो दुनिया बनें— या किसी की दुनिया उजाड़ दें।
हत्या करना तो पाप है न चाहे वो किसी की भावनाओं की हो या फिर संवेदनाओं की किसी के भरोसे की हो, उसके यकीन की किसी के सपनों की हो, उसके अपनेपन की किसी के सुकून की हो, उसकी मुस्कान की किसी की नींदों की हो, उसके ख्वाबों की किसी की रूह की हो, उसके अहसासों की किसी के कल की हो, उसके हर आज की किसी के हौसले की हो, उसके इरादों की किसी की पहचान की हो, उसके वजूद की किसी के प्रेम की हो, या उसकी आजीवन प्रतीक्षा की
कभी मात्र एक व्यक्ति के चले जाने से ही कुछ लोग उन्मत्त हो उठते हैं, और उन्हीं सरफिरे उन्मादों को दुनिया कवि, शायर और काव्य-प्रणेता कहती है। कभी कोई विरह शब्दों में आकार ले लेता है, कभी कोई निःशब्दता ग़ज़ल बनकर बह उठती है। जो अश्रु बहा नहीं पाते, वे अक्षरों में ढलने लगते हैं, और जो अक्षरों में ढलते हैं वो कालातीत हो जाते हैं। हर वेदना की कोख से एक कविता जन्म लेती है, हर विखंडन में कोई रचना सुसज्जित हो उठती है। वो जो किसी हृदय का बिखराव था, वही सृजन का प्रथम स्पंदन बन जाता है। — ArUu ✍️
मैं लिखती हूँ— लिखती हूँ क्योंकि कुछ लफ़्ज़ मुझे बहुत पसंद हैं, और कुछ लफ़्ज़ों को मैं बहुत पसंद हूँ। खामोशी में वो मेरे हमदर्द बन जाते हैं, उदास हूँ तो मेरी आँखों से बह जाते हैं। उमंग में मेरी हँसी से लिपट जाते हैं, कोई याद आए तो कोरी आँखों में सिमट जाते हैं। कभी तन्हाई घिर आए तो चुपचाप मेरे पास बैठ जाते हैं, जहाँ मैं खुद से हार जाऊँ वहीं मुझे थाम जाते हैं। और सच कहूँ, मैं लिखती नहीं हमेशा, कभी-कभी ये लफ़्ज़ ही मुझे लिख जाते हैं।
मेरे हाथ में एक कटोरा था... चांदी का सोने का या लोहे का नहीं याद पर था। कुछ ख्वाब थे जिन्हें उसमें डाल रखा था मैंने। हवा तेज होती तो वो ख्वाब उड़ने लगते, कभी एक गया दूसरा गया , जाता रहा मैं बस उन ख्वाबों को जाते हुए निहारती रही। कभी झुक के उस कटोरे की तरफ नहीं देखा। अंत में जब देखा तो वो खाली था। कटोरा सोने का था। पर मेरे बेशकीमती ख्वाब वो संभाल नहीं पाया❤️
मेरे अंतर्मन की गहराइयों से मैं ये प्रार्थना करती हूं की मुझे नुकसान पहुंचाने वाले हृदयों की आत्मा की अंतिम आह भी बस मेरे हृदय से क्षमा मांगे
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