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ये लोकतंत्र, ये आज़ादी, और ये प्यारा देश हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की अमूल्य धरोहर हैं। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अपने जीवन की अंतिम साँस तक इनकी गरिमा, एकता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करेंगे। 🇮🇳 जय हिंद। 🙏🏻
आज सोचती हूं कितनी खुशनसीब रही होगी वो रात जब ये हिंदोस्तान आजाद हुआ होगा शायद कोई खुशी से सोया ही नहीं होगा। अपनी आजादी का जश्न, अपने लोकतंत्र का गुमान किया होगा। कितने ही बलिदानों के बाद मिला होगा ये लोकतंत्र। तो मुझे अपने एक गुरु जी की कुछ सालों पहले कही बात याद आती है...कुछ साल नहीं कह सकते लगभग 14-15 साल पहले की वो कहते थे इतना खुश होने की जरूरत नहीं है, वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर से गुलाम होगा। मैं तब सोचा करती थी कि ऐसे थोड़ी होता है। एक इतना शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश फिर से गुलाम कैसे हो सकता है? फिर सोचा करती कि उतरी कोरिया में अब तक तानाशाही क्यों है ? वहां की जनता क्यों नहीं करती विरोध? पर धीरे धीरे इन सभी सवालों के जवाब मिल रहे है।
और इस सफ़र में मैंने अपनी विनम्रता, करुणा और इंसानियत भी खो दी। अब एक खोखली-सी आत्मा से भला इन सबकी उम्मीद क्या करना। अब रिश्ते हों या ज़ख्म, दोनों एक जैसे लगते हैं, मौजूद, मगर बेअसर। सबसे बड़ा शोक किसी अपने को खो देने का नहीं होता, सबसे बड़ा शोक ख़ुद के भीतर के इंसान को धीरे-धीरे मरते देखने का होता है।
आंखों से बहते हर एक आंसू के साथ ही बह जाते है कुछ लोग और कुछ रिश्तें।
फिर वो कहते है कि सीधे रस्ते चलोगे तो सब साथ देंगे काफी सोचा ये सीधा रास्ता क्या होता है? सीधी सड़क, सीधी गली या सीधा कोई गलियारा या फिर सीधा श्मशान का रास्ता फिर समझ आया सीधा रास्ता मतलब उनके बनाए नियम कायदे नियम कायदे मतलब क्या? नियम कायदे मतलब आपकी एक एक सांस पर किसी और का आधिपत्य। पर मैंने देखा है जो लोग सच में सीधे रास्ते पर चल रहे है उनका साथ देने वाला भी कोई नहीं है। हां साथ देते है सब पर सीधे रास्ते चलने वाले का नहीं उन लोगों के जो भले ही कितने गलत राह पर चल रहे हो बस उनके पास सत्ता , पद और पैसा हो। हाथ जोड़े वो उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलते है जिनसे उनका स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो।
इतनी बड़ी self obsessed हूँ कि खुद के ही फोटोज़ को देखकर घंटों मुस्कुरा लेती हूँ। खुद को ही निहार लेती हूँ, अपनी तारीफ़ करते थकती नहीं। अपने सिवा कोई बेहतर लगता ही नहीं। गिरती हूँ तो खुद ही संभल जाती हूँ, रोती हूँ तो खुद को ही गले लगा लेती हूँ। दुनिया ताली बजाए या नहीं, मैं अपनी सबसे ज़ोरदार चीयरलीडर हूँ।🫡 अपनी ही नज़र न लगे, इसलिए कभी-कभी माथे पर काला टीका भी लगा लेती हूँ।🫠 मेरी सबसे पसंदीदा कंपनी... मैं खुद हूँ।🫣 आख़िर उम्रभर का साथ सबसे पहले खुद से ही तो निभाना है। मेरे सारे राज़ भी मुझे मालूम हैं, और मेरी सारी खूबियाँ भी। मेरी कमियाँ भी मेरी हैं, मेरी जीत भी मेरी है, मेरी हार भी मेरी है। खुद से रिश्ता इतना गहरा है कि किसी और के स्वीकार की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैं खुद को रोज़ चुनती हूँ, क्योंकि दुनिया बदलती रहती है, पर आईने में दिखने वाला इंसान हर दिन मेरा इंतज़ार करता है। 🤍
अब डर लगता है। डर लगता है मेरा बुरा साया उसकी खुशियाँ ना छीन ले, उसकी खिलखिलाती आँखें नम ना हो जाएँ। डर लगता है कि कहीं मैं ही उसकी दुश्मन ना बन जाऊँ, डर लगता है उसके अंतर्मन की गहराइयों में छुपी कुंठा, उसके जेहन में मेरे लिए दबे तिरस्कार से। डर लगता है कि कहीं मेरे होने का अर्थ ही उसके लिए एक संघर्ष ना बन जाए, मेरा नाम उसकी बेचैनियों का कारण ना बन जाए। डर लगता है , मेरी मौजूदगी उसे उसके हिस्से की खुशियों से दूर ना कर दे, और मुझे चुनने की कीमत उसे हर रोज़ खुद से ही ना चुकानी पड़े। डर लगता है, एक उस ऐसे दिन से जब मेरी आहट पर उसके चेहरे की मुस्कान बुझ जाए, और मेरी ओर बढ़ते उसके कदम अनचाहे ही ठहर जाएँ। डर लगता है कही मैं उसके जिंदगी की सबसे बड़ी भूल न बन जाऊं और अंत में डर लगता है कि वो मुझसे नहीं,मेरे वजूद से नफ़रत करने लगे; मेरी परछाईं भी उसे अपने जीवन पर एक अभिशाप लगे।
कुछ शख्स फ़रिश्ते जैसे होते है वो आपकी जिंदगी में तब आते है जब आप खुद जीने की हिम्मत खो चुके होते हो वो यकीन दिलाते है आपको अपने होने का आपका वजूद इस प्रकृति में कितना महत्वपूर्ण है ये बार बार जताते है। वो उस वक्त आपको सुनते है जब आप अपने भीतर के सन्नाटे से जुझ रहे होते है। बिना सवाल बिना उम्मीद आपके आंसुओं और आपकी हंसी का हिसाब रखते है। जब सारी दुनियां आपको तोड़ने में लगी रहती है तब वो एक शख्स भीतर ही भीतर आपके टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ने की जद्दोजहद में लगा रहता है। खुद भले कितनी ही दिमागी कश्मकश में हो पर आपके लिए हमेशा वो सुलझा हुआ रहता है। शायद हजार पाप के बीच किए एक पुण्य का फल है वो❤️
सबने दुनिया नहीं देखी उन लोगों ने भी नहीं जो अपने जीवन के अंतिम चरण में है या शायद मृत्यु शैया पर लेटे हुए है ये लोग अपने समय की बाते बड़े गर्व से कह देते है पर सच तो यही है न कि यही वो लोग थे जो समाज के डर से कभी आवाज उठा ही नहीं पाए और न ही सुन पाए कभी अपने भीतर की आवाज़ ये लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि हमने दुनियां देखी है पर अपनी गांव की गलियों को तो दुनियां नहीं कहते न हां ये हो सकता है कि उन्होंने उसी छोटी सी परिधि को अपनी दुनियां मान लिया हो जो उन्हें ताउम्र गर्व करवाती रही हैं।
और अंतिम बार मैंने देखी उसकी आँखें मेरे लिए ज़हर उगलती हुई। जैसे कभी उनमें मेरे नाम की रोशनी ही न थी, जैसे मेरी मौजूदगी उसके भीतर कोई युद्ध छेड़ देती हो। मैं खड़ी रही ख़ामोश, अपनी ही धड़कनों के मलबे पर, और वो आंखे बिना कुछ कहे मुझे मेरी सारी मोहब्बत का शोक सौंपकर चली गई।
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