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ArUu

ArUu Matrubharti Verified

@aruuprajapat6784
(1.1m)

और अंतिम बार
मैंने देखी उसकी आँखें
मेरे लिए ज़हर उगलती हुई।

जैसे कभी उनमें
मेरे नाम की रोशनी ही न थी,
जैसे मेरी मौजूदगी
उसके भीतर कोई युद्ध छेड़ देती हो।

मैं खड़ी रही ख़ामोश,
अपनी ही धड़कनों के मलबे पर,
और वो आंखे
बिना कुछ कहे
मुझे मेरी सारी मोहब्बत का
शोक सौंपकर चली गई।

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आज तुम बहुत याद आ रही हो।
हां, रोज़ याद आती हो,
पर आज कुछ ज़्यादा आ रही हो।
मैंने हर उस शख़्स को बदलते देखा है
जिसके ना बदल जाने का गुमान था मुझे।
पर ऐसे वक़्त में तुम्हारा असीमित प्रेम बहुत याद आता है।
कुछ लोग कहते हैं “उदास होती हो तो इतना क्यों याद करती हो उन्हें?”
अब कैसे बताऊँ कि एक तुम ही तो थी मेरे पास
जो मुझमें लाख बुराइयाँ होने के बावजूद मुझसे अनंत प्रेम करती रही।
हर किसी को नापसंद रहने वाली लड़की से तुम ही तो मुस्कुराकर बात किया करती थी।
तुम ही तो थी जो मेरे गुस्से के पीछे छुपी फ़िक्र पढ़ लेती थी।
जब पूरी दुनिया मुझे गलत समझ लेती थी, तब भी तुम मेरे हिस्से की सफ़ाई अपने दिल में बचाकर रखती थी।
एक तुम ही तो थी जिसको फिक्र थी मेरी देर रात लगने वाली भूख की।
एक तुम ही तो थी जो कहती थी कि अब सो जा बहुत थक गई है।
तुम ही तो थी जो मेरे चिड़चिड़े मिजाज को झेल लेती थी इतनी सहजता से।
एक तुम ही तो थी जिसके सामने मुझे अच्छा बनने का अभिनय नहीं करना पड़ता था , मैं जैसी थी,तुमने वैसे ही अपना लिया था मुझे।
तुम ही तो समझती थी कि तुम्हारे जाने के बाद
मैं कितनी टूट जाऊँगी।
अगर ये सच नहीं है,केवल मेरा भ्रम है,
तो मैं डरती हूं…
इस भ्रम के टूट जाने से भी।

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कई बार इंसान जैसा दिखता है उससे कई ज्यादा बुरे समय से लड़ रहा होता है
आप अगर उसका साथ नहीं दे सकते
उसे समझ नहीं सकते
तो कम से कम उसकी जिंदगी में दखल ना दे।
आपकी हंसती खेलती जिंदगी में वो शख्स जहर नहीं घोल रहा
तो उसकी उदास जिंदगी से आप दूर रहे।
हो सकता है वो कोशिश कर रहा हो हर दिन जीने की सिर्फ़ एक वजह ढूंढने की।
आप उसे फिर से मरने की एक वजह ना दे।

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मैं बहुत मजबूत हूं
बहुत ज्यादा
इतनी की मुझे भीड़ भी नहीं तोड़ सकती।
मैं कभी किसी के सामने खुद को कमजोर नहीं होने देती।
हां मेरे लिए अकेले में खुद के सवालों और अपने ही विचारों से लड़ना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।
कई बार मेरे अपने विचार मुझे पराजित करने की क्षमता रखते है,
बस मेरे अपने
किसी और के विचार मुझे खास प्रभावित नहीं कर पाते।
अब जब मैं जिंदगी के ऐसे मोड पर खड़ी हूं
जहां मुझे न कुछ खोने का डर है और न कुछ पाने की खुशी
तो मैं बस भयभीत हूं
खुद के खो जाने से❤️‍🩹

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अच्छा आज कल एक ट्रेंड बड़ा कॉमन चल रहा
शायद आज कल नहीं बहुत पुराने टाइम से चला आ रहा है जिसके बारे में बात करना थोड़ा असहज हो सकता है
पर जरूरी है।
मेरी समझ में कई लोगों के extra merital affairs चल रहे हैं।
इनसे अपनी एक शादी सम्भल नहीं रही और मुंह पर एक ही सवाल रहता है किसी अविवाहित को देख कर
आप शादी कब कर रहे?
देखो पहली बात अपना ध्यान रखो और अपने लाइफ पार्टनर का भी।
शादी कर के तुम लोगों ने कुछ उखाड़ नहीं लिया ।
एक पार्टनर की जिम्मेदारी तुमसे सम्भल नहीं रही और किसी अविवाहित को देख कर तुम्हारे दिमाग की नस खींच जाती है।
इन घटनाओं से इतना खौफ बैठ गया है दिमाग में कि शादी से डर ही लगने लगा है और फिर लोग बिना एक मिनट सोचे कह देते है शादी कब कर रहे हो?
पुरुष या महिलाओं की बात नहीं है ।
इस क्षेत्र में वर्तमान में दोनों ही अग्रणी है।
और यहां बात कामकाजी या गृहस्थ लोगों की भी नहीं है।
ज्ञान सब दे जाते है बस अपने गिरेबान में झांक कर कोई नहीं देखता ।
कभी पूछो अपने आप से की आप अपने पार्टनर के लिए कितने ईमानदार है?
और क्या वाकई आज के वक्त में शादी करना एक अच्छा निर्णय है अपनी मानसिक शांति के लिए?

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मुझे सुधा बहुत पसंद है
सिर्फ धर्मवीर भारती के *गुनाहों के देवता* के चन्दर वाली सुधा नहीं।
वो तो देवी है अपने भीतर अथाह प्रेम और समर्पण वाली देवी...प्रेम त्याग कर अमर बन गई
पर मुझे मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास *निर्मला* कि सुधा उससे भी ज्यादा पसंद है।
वो एक ऐसी स्त्री है जिसने दूसरी स्त्री को समझा
उसका साथ दिया।
निर्मला का मंगेतर जो कि बाद में सुधा का पति बना
उसने निर्मला से सिर्फ दहेज के लिए शादी से इनकार कर दिया।
ये जानने के बाद भी उसने निर्मला से अपनी मित्रता खत्म नहीं की और ना ही कभी उसे हीन नजरों से देखा।
उसके लिए निर्मला सदैव एक पूजनीय छवि रही।
अपने पति का पक्ष न लेकर उसने निर्मला के साथ हुए अन्याय के खिलाफ बात कही
और भी सुधा के चरित्र में बहुत खूबियां रही।
उसने मित्रता में सब न्योछावर किया।
सच में सुधा बहुत पसंद है मुझे।
दोनों ही उपन्यास में सुधा औरत की अपनी परिभाषा को चरित्रार्थ करती नजर आती है।

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एक धुंधला-सा पल,
जिसमें कुछ धुंधली यादें।
उन्हीं धुंधले लम्हों में
आँखों से एक अश्रु बह जाता है,
और बह जाती हैं
उसके साथ अनंत स्मृतियाँ।
अहसास होता है
इस अनंत ब्रह्मांड में
मैं नितांत अकेली खड़ी हूँ,
एक छोर पर कुछ स्मृतियाँ लिए।
जिस छोर की दूसरी ओर है
अनंत हर्ष, आह्लाद और सौंदर्य,
फिर भी मैं खड़ी हूँ
वही छोर थामे,
उन्हीं मीठी स्मृतियों की
एक नाज़ुक-सी डोर थामे
और पुनः आँखों से
बह उठती है
एक अनंत अश्रुधार।

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मेरी दुनियां ...
तुम्हारा होना ही मेरे लिए जन्नत था...तुम्हारा चले जाना जैसे मन्नत के सबसे मजबूत धागे का टूट जाना
या टूट जाना उन असंख्य सपनो का
जो तुम्हारी गोद में सर रख मैने देखे थे।
जब तुम हंसती थी तो किसी मासूम परी सी लगती थी...तुम्हारी उदासी मुझे बेहद डरावने तुफानों सी लगती थी...तुम्हारा मुस्कुराना मुझे तपती गर्मी में भी बर्फ सी ठंडक का अहसास दे जाता...
आज इतनी भीड़ में इतनी खुशी के मौके पर भी तुम्हारी कमी बहुत खलती है...ना चाहते हुए भी आंखे जलथल हो जाती है...आंखों की उदासी मुस्कुराते चेहरे को पराजित कर देती है...पर मैं जानती हूं... तुम मुझे सुन सकती हो मुझे महसूस कर सकती हो...
मैंने देखा है यथार्थ में ना सही...
सपनों में अक्सर जब मैं तुम्हें अपने पास चाहती हूं तुम हमेशा मेरे पास होती हो...जब कभी बहुत ज्यादा परेशान या बहुत ज्यादा खुश होती हूं तो तुम आती हो मुझे ये अहसास दिलाने की तुम आज भी मेरे पास हो और मुझे सुन सकती हो...
जिंदगी में जब कभी त्रासदी हुई ...जब कभी परिस्थितिया विपरीत हुई तुम आई मुझे दिलासा देने मेरी हिम्मत बढ़ाने और खुशियों के मौकों से ठीक पहले तुम हर बार आई मेरी खुशियों को दोगुना करने
जैसे आज तुम आई थी वैसे हमेशा मुझे मिलने आती रहना मां ❤️

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हाँ, मैं आधुनिक स्त्री हूँ…
मुझे दफ़्तर अकेले जाने से डर नहीं लगता।
दफ़्तर से देर रात अकेले घर आने से भी नहीं डरती।
नहीं डरती मैं अंधेरी रात में एक घर में अकेले होने से।
नहीं डरती मैं सुनसान जगह अकेले पुरुषों के साथ काम करने से।
भीड़ में अकेले चलने से भी नहीं डरती मैं।
ना ही डरती हूँ सड़क के किनारे रुक कर अकेले कुछ खाने से।

पर बहुत डरती हूँ मैं परिवार की राजनीति से।
उन लोगों से भी
जो अपने होने का दावा करके
पीठ पीछे खंजर घोंपते हैं।

बहुत डरती हूँ उन आँखों से
जो मुस्कुराहट ओढ़े रहती हैं,
पर भीतर ईर्ष्या का अंधेरा छुपाए होती हैं।

डर लगता है उन रिश्तों से
जहाँ अपनापन शब्दों में होता है,
और हिसाब दिलों में।

फिर भी…
मैं हर सुबह खुद को समेटती हूँ,
अपने आँसू आँखों में ही सिलती हूँ,
और मुस्कुरा कर निकल पड़ती हूँ
क्योंकि मैं जानती हूँ,
मेरी लड़ाई दुनिया से कम,
नक़ाब पहने चेहरों से ज़्यादा है।

हाँ, मैं आधुनिक स्त्री हूँ…
बाहर के अंधेरों से नहीं हारती,
बस अपनों के भीतर बसे अंधेरों से
हर रोज़ थोड़ा लड़ती हूँ…
और फिर भी,
हर रोज़ खुद को बचा लेती हूँ।

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मुझे एक बात समझ नहीं आती
ये औरते इतनी औरते कैसे होती है भाई
बिल्कुल ही खुद के अस्तित्व को नकारती।
इन्हें किसी एक राह पर छोड़ दो, ये उसी राह पर चलती रहेगी।
राह सही हो या गलत इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता बस ये अपनी तरफ से कभी सही राह खोजने की कोशिश नहीं करती।
इन पर जितने चाहे रिवाज-कुरीतियां थोप दो ये बस बिना सिर उठाए उनका अनुसरण करती रहेगी
और जो इनके लिए आवाज उठाए उन्हें तो वो अलग ही हीन नजर से देखती है जैसे वो उनके बने बनाए ढर्रे पर आग लगा देगी। कभी कभी लगता है ये औरतें डरती है
जिस सुविधा क्षेत्र में वो अभी रह रही हैं उसे खोने से या जो उन्हें आसानी से हासिल है उसके छीन जाने से।
शायद अपने लिए आसमान खोजने में भी वो डरती है क्योंकि उसके लिए अथाह गहराई में उतरना पड़ता है।
वो उन स्त्रियों से भी डरती है जो पुरुषों के बुने चक्रव्यूह को ताड़ने का साहस रखती हैं।
वो डरती है शायद खुद की असीमित शक्तियों से भी ।
सच मैं आज तक नहीं समझ पायी ।
ये औरते इतनी औरते क्यों होती है।

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