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दर्द देना नहीं हैं लेना होता है, यकीन लेना नहीं देना होता हैं। "प्रસંग"
यही हाल है। महंगाई की मार में जीना कठिन यही हाल है, कमाई से बड़ा अब हर एक सवाल यही हाल है। वादों के मेले में सच की दुकानें बंद पड़ीं, झूठों के चेहरे पर बस इक कमाल यही हाल है। आँकड़ों की चादर से भूख को ढकने की कोशिश, हकीकत के शहर में हर दिन बवाल यही हाल है। जो ताली बजाते हैं सत्ता की हर बात पर, उनकी आँखों में बसा हुआ जंजाल यही हाल है। जनता की जेबों में बस कर्ज़ का बोझ बढ़ा है, उम्मीदों के घर का टूटा सा हाल यही हाल है। भाषणों की रोशनी में अंधेरा बढ़ता ही गया, सच की हर आवाज़ का होता दर्द यही हाल है। जो कहते हैं “सब ठीक है”, वो ही सबसे दूर खड़े, प्रसंग कहे, जन-जीवन बेहाल यही हाल है। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
“अधूरे हिसाबों में हूं” ए सच कहूं कि आजकल मैं मुश्किलों में हूं, बस खाली ये वक़्त गुज़रने के प्रयासों में हूं। कभी हौसला था जो आसमां को छू लेने का, वो बिखरे हुए एहसासों की टूटी किताबों में हूं। न रास्ता कोई साफ़ है, न ही मंज़िल का पता, मैं धुंधले से सफ़र और अधूरे हिसाबों में हूं। कभी जो अपने थे, वही अब अजनबी से हुए, मैं रिश्तों की भीड़ में सबसे तन्हा नक़ाबों में हूं। न अब शिकवा, न शिकायत किसी मोड़ पर, बस अपने सवालों के अनसुने जवाबों में हूं। कभी रोशनी थी, वो भी अब सिमट सी गई, मैं अंधेरों के शहर और खामोश सराबों में हूं। मैं अपनी ही कहानी का टूटा हुआ हूं, “प्रसंग”, हर मोड़ पर बिखरा मगर फिर भी यादों में हूं। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
“वक़्त और हम" जिसे समझना था उसे कभी हम समझ न पाए, साँसे तो चलती रही पर एक पल हम जी न पाए। वक़्त के धागों में उलझ कर रह गई हर बात यहाँ, दिल तक पहुँचा सच मगर होंठ उसे कह न पाए। दौर था समझदारी का फिर भी फ़ासले बढ़ते रहे, हम क़रीब होकर भी रिश्तों से रिश्ते जोड़ न पाए। हर तरफ़ शब्दों का शोर था मगर यहाँ सन्नाटा रहा, हमें जो महसूस हुआ वो भी किसी से बता न पाए। ख़ामोशियों ने भी कई राज़ सीने में दफ़न किए, हम जो थे अंदर से वह चेहरा कोई देख न पाए। जिसको समझा था अपना वो भी अपना न हुआ, हम ही “प्रसंग” थे जो खुद को भी समझ न पाए। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
इकरार की सज़ा। हम भूलकर भी कहाँ कैसे कोई भूल करें, आपने जो कह दिया है वही इकरार करें। हर ज़ख़्म को ख़ामोशी से ही मंज़ूर करें, मन पर जो गुज़र गया उससे पार करें। तन्हा सफ़र में धूप ही क़िस्मत का हिस्सा, छाँव की चाह में क्यों ख़ुद को बेकरार करें। सच की चुभन को हँसते हुए सह जाएँ, झूठी ख़ुशियों से क्यों मन बीमार करें। वक़्त के फ़ैसले पर कोई शिकवा न रखें, जो भी मिला है उसी पर विश्वास करें। ‘प्रसंग’ हर हाल में खामोशी से सहते रहें, लोग जो भी कहें, उसे बस स्वीकार करें। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
पहचान। तुम इतने गिरो कि उठाने वाला मिल जाए, टूटे हालात हो! अपना पराया सब खुल जाए। मुश्किल राहों में जब अँधेरा बहुत घना हो, कौन साथ है, ये हक़ीक़त उजागर हो जाए। अपनेपन के दावों में अक्सर फ़रेब छुपा रहता, सच की आँच में हर रिश्ता साफ़ नज़र आए। जिसे अपना समझा, उसी ने दगा कर दिया, दिल ही नहीं, जीने का सहारा भी टूट जाए। रातों की वो तन्हाई में जब सन्नाटा गहरा हो, आवाज़ों के बीच में सच्चा चेहरा उभर आए। अब न शिकायत, न कोई उम्मीद दिल में रहे, तजुर्बों का हर ज़ख्म सबक बनकर रह जाए। 'प्रसंग' सफ़र-ए-ज़िंदगी इतना समझ आया, गिरने पर ही इंसान की पहचान निखर जाए। - प्रसंग प्रणयराज रणवीर
वक्त के ज़ख्म। बदलते वक्त ने मुझे नया मुकाम दे दिया, मैंने जो चाहा नहीं था वही ज़ख्म दे दिया। सुकून की ख़ातिर बस दिल ठहर गया कहीं, किस्मत ने हर अरमान को धुआँ दे दिया। रिश्तों की भीड़ में अजनबी सा खड़ा रहा, चेहरों के बदलते रंगों ने इम्तिहां दे दिया। जिसको अपना समझा, वो बेवफ़ा निकला, उसने ही दिल की बात को सरेआम दे दिया। वफ़ा की राह पर चला तो ठोकरें मिलीं, दौर-ए-जहाँ ने हर कदम पे फ़साना दे दिया। अब न शिकायत रही, न कोई गिला बचा, तजुर्बों ने हर दर्द को सलीक़ा दे दिया। 'प्रसंग' तन्हाइयों में अपनी सदा सुनता रहा, ख़ामोशी ने हर लफ़्ज़ को बयाँ दे दिया। प्रसंग प्रणयराज रणवीर
“जो दिखा, वो था नहीं” हमने हर शख़्स में बस सच्चाई ही देखी थी, अपनी नज़रों में अजब गहराई भी देखी थी। जिसको अपना कहा, वार वही कर बैठा, हर मुलाक़ात में गहरी परछाई ही देखी थी। रिश्ते सींचे थे बड़े शौक़ से हमने लेकिन, उनकी फ़ितरत में मगर तनहाई ही देखी थी। हँसते चेहरों के तले दर्द छुपा था कितना, हर हँसी में कोई रुसवाई ही देखी थी। वक़्त ने खोल दिए राज सभी धीरे-धीरे, हर दिखावट में छुपी सच्चाई ही देखी थी। ‘प्रसंग’ अब हर क़दम ज़रा संभाल के रखता, अब वही राह न पहले-सी अच्छाई देखी थी। - प्रसंग प्रणयराज रणवीर
खयालात। लिखते हैं हम भी खयालात के शब्द कभी, जज़्बातों की जब कदर हो जाती है कभी। खामोशियों के शहर में गूँजते हैं सवालात, दिल की दीवारों पे दस्तक दे जाती है कभी। वो लम्हे जो गुज़रे थे अनकहे किसी मोड़ पर, याद बनकर आँखों में उतर आते हैं कभी। हमने भी सीखा है दर्द को मुस्कुराना यहाँ, वरना अश्क भी बगावत कर जाते हैं कभी। इश्क़ की राहों में हर पल इक इम्तिहान है, जो हार गए वही तो खुद को पाते हैं कभी। लफ़्ज़ों की स्याही से तक़दीर लिखने चले हम, पर हालात ही क़लम को मरोड़ जाते हैं कभी। प्रसंग कहता है, ख्वाबों को सच समझो कभी, वरना हक़ीक़त भी धोखा दे जाती है कभी। - "प्रसंग" प्रणयराज रणवीर
बदलते रिश्ते। एक वक़्त होता था जब तुम्हारी ज़रूरत थी हमें, अगर तुम खुदा भी हो तो इबादत कहाँ है हमें। न सुकूँ दिल को मिला, न आरज़ू का कोई रंग, सूने इस शहर में अब वो रौनक कहाँ है हमें। तुमने बदली हैं दिशाएँ भी बड़े सलीके से, अपनी ही चाहत से मिलती राहत कहाँ है हमें। मुस्कुराकर जो दिए तुमने वो गहरे ज़ख़्म, उनसे फिर आज कोई शिकायत कहाँ है हमें। जो थे कल तक क़रीब, आज पराये-से लगें, इस बदलते हुए दौर से हैरत कहाँ है हमें। तन्हाई से निभा ली है हमने हर एक घड़ी, अब किसी बज़्म की कोई ज़रूरत कहाँ है हमें। पाकर भी तुमको खोना अजब दास्ताँ ठहरी, किसी और को पाने की हसरत कहाँ है हमें। दिल ने छोड़ी हैं सभी उम्मीद की राहें अब, किसी रौशन सवेरे की आरज़ू कहाँ है हमें। ‘प्रसंग’ अब तो ख़ुदी से भी अजनबी-से हुए, ख़ुद से मिलने की कोई फ़ुर्सत कहाँ है हमें। - प्रसंग प्रणयराज रणवीर
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