भाग 6: पूर्णिमा का संस्कार
पूर्णिमा की रात थी और चाँदनी ने वर्मा हवेली के बरामदे को चांदी जैसा चमकदार बना दिया था। बूढ़े देवेंद्र वर्मा ने तेजी से काम किया था, पच्चीस लोग इकट्ठे हो चुके थे, सभी वर्मा परिवार के सदस्य जो चंद्रनगर और आसपास के गाँवों में रहते थे। कुछ युवा थे, कुछ बूढ़े, सभी के चेहरे पर उत्सुकता और डर का मिश्रण था।
आर्यन बरामदे के एक कोने में खड़ा था, मृया उसके बगल में। उसने देखा कि मृया की आकृति आज और भी स्पष्ट थी, अब वह पूरी तरह से मानव दिख रही थी, सिवाय उस हल्की सी चमक के जो उसके चारों ओर थी जिसे केवल आर्यन ही देख पा रहा था।
"तुम नर्वस हो?" आर्यन ने धीरे से पूछा।
मृया ने हाँ में सिर हिलाया। "सौ साल बाद... अपने हत्यारों के वंशजों के सामने खड़ी हूँ। पर ये लोग हत्यारे नहीं हैं। ये तो पीड़ित हैं। उस शाप के जो मेरी मृत्यु से शुरू हुआ।"
देवेंद्र ने एक छोटा सा मंच बनाया था, जहाँ एक पुरानी तस्वीर रखी हुई थी, राजेंद्र वर्मा की। तस्वीर के सामने एक दीया जल रहा था।
"भाइयो और बहनो," देवेंद्र ने शुरुआत की, उसकी आवाज़ भावुक थी। "हम यहाँ एक गलती सुधारने के लिए इकट्ठे हुए हैं। एक ऐसी गलती जो हमारे परिवार ने सौ साल पहले की थी।"
लोग चुपचाप सुन रहे थे। कुछ की आँखें नम थीं। शायद उन्हें भी यह कहानी पता थी।
"मेरे दादा, राजेंद्र वर्मा ने एक निर्दोष लड़की की हत्या की थी," देवेंद्र ने कहा, उसकी आवाज़ अब काँप रही थी। "सिर्फ इसलिए क्योंकि वह निम्न जाति की थी, और उनका बेटा उससे प्यार करता था। उस लड़की का नाम था मैत्रेयी।"
एक सामूहिक साँस भरने की आवाज़ आई। कुछ लोगों ने अपने मुँह पर हाथ रख लिए।
"और आज," देवेंद्र ने कहा, "वह लड़की हमारे सामने खड़ी है। अपना न्याय माँग रही है। नहीं... माफी माँग रही है।"
सभी की निगाहें मृया पर टिक गईं। कुछ लोग पीछे हट गए, डर से। पर मृया के चेहरे पर कोई क्रोध नहीं था - सिर्फ दुख और एक गहरी थकान थी।
"मैं माफी माँगती हूँ," मृया ने कहा, उसकी आवाज़ स्पष्ट और मधुर थी। "इतने सालों तक तुम्हारे परिवार को शापित करने के लिए। पर मैं मजबूर थी। मेरी आत्मा बंधी हुई थी।"
एक बुजुर्ग महिला आगे आई। "हम माफी माँगते हैं, बेटी," उसने कहा, आँसू बहाते हुए। "हम जानते थे, पर चुप रहे। हमारी शर्म ने हमें चुप रहने पर मजबूर किया।"
एक-एक करके, सभी लोग आगे आए। हर कोई मृया के सामने झुका, उसके पैर छुए, और माफी माँगी। आर्यन ने देखा कि हर माफी के साथ, मृया के चारों ओर की चमक और तेज होती जा रही थी। और साथ ही, उसकी अपनी कलाई पर मृया के हाथ का निशान भी चमकने लगा था।
तभी, हवा का तापमान अचानक गिर गया।
चाँदनी मद्धम पड़ गई, जैसे कोई बादल उसे ढक रहा हो, पर आसमान साफ था। बरामदे के बीचों-बीच एक छाया उभरने लगी, पहले धुंधली, फिर स्पष्ट।
एक युवक, बीस-बाईस साल का, पुराने कपड़े पहने। उसकी आँखों में एक अनंत दर्द था।
"विजय," मृया ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में प्यार और पीड़ा का मिश्रण था।
"मैत्रेयी," युवक की आत्मा बोली, उसकी आवाज़ हवा में सरसराहट की तरह थी। "मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की। मैं... मैं नाकाम रहा।"
"यह तुम्हारी गलती नहीं थी," मृया ने कहा, आगे बढ़कर। "तुम्हारे पिता..."
"मेरे पिता ने तुम्हें मारा," विजय ने कहा, उसकी आत्मा की रूप काँप रही थी। "और फिर... उसने मुझे भी मार डाला।"
एक सामूहिक चीख निकली। देवेंद्र पीछे हट गया। "क्या? हमें तो बताया गया था कि विजय चेचक से मरा था!"
"नहीं," विजय की आत्मा ने कहा। "जब मैंने उसका विरोध किया, जब मैंने कहा कि मैं पुलिस को बताऊँगा... उसने मुझे भी जहर दे दिया। उसी रसोईघर में। उसी तरह।"
आर्यन का सिर चकरा गया। यह नया सच और भी भयानक था। राजेंद्र वर्मा ने न सिर्फ मृया की हत्या की थी, बल्कि अपने ही बेटे की भी।
"इसलिए तुम यहाँ फँसे हुए हो," मृया ने कहा, अब रोते हुए। "तुम्हारी आत्मा को भी शांति नहीं मिली।"
"मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था," विजय ने कहा। "माफी माँगने के लिए। मैं तुम्हें नहीं बचा पाया। मैं कायर था। मैंने पहले ही विरोध क्यों नहीं किया? क्यों नहीं तुम्हें लेकर भाग गया?"
मृया ने विजय की ओर हाथ बढ़ाया। "तुम डरते थे। और अब... अब हम दोनों मुक्त हो सकते हैं।"
पर तभी, एक भयानक हँसी गूंजी। काल प्रकट हुआ, उसकी लाल आँखें आज और ज्वलंत थीं। "मुक्त? कौन कहता है कि तुम मुक्त हो सकते हो?"
सभी लोग डर से पीछे हट गए। काल का रूप आज पूरी तरह से दिखाई दे रहा था, एक लंबा, काला आकार, जिसमें सिर्फ दो लाल आँखें थीं।
"यह संस्कार अधूरा है," काल ने कहा। "सिर्फ माफी काफी नहीं है। न्याय चाहिए। बदला चाहिए।"
"नहीं," मृया ने दृढ़ता से कहा। "मैं बदला नहीं चाहती। मैं शांति चाहती हूँ।"
"तुम नहीं चाहती, पर न्याय की माँग करती है," काल ने कहा। "राजेंद्र वर्मा के कर्मों की कीमत चुकानी होगी। और चूँकि वह मर चुका है... उसके वंशजों को चुकानी होगी।"
आर्यन आगे बढ़ा। "क्या कीमत?"
काल ने उसकी ओर देखा। "एक जीवन। एक वर्मा वंश का जीवन। तभी शाप टूटेगा।"
हवेली में सन्नाटा छा गया। फिर देवेंद्र बोला: "मेरा जीवन ले लो। मैं बूढ़ा हूँ। मेरा समय हो चुका है।"
"नहीं," एक युवक बोला, जो शायद देवेंद्र का पोता था। "मेरा जीवन ले लो।"
"मेरा!" "नहीं, मेरा!"
सभी लोग एक साथ बोलने लगे, हर कोई अपना जीवन देने को तैयार था।
काल हँसा। "देखो, मनुष्यों की मूर्खता। एक दूसरे के लिए मरने को तैयार। पर नियम स्पष्ट है, जिसके कारण यह सब हुआ, उसी के वंश का जीवन चाहिए।"
सभी की निगाहें आर्यन पर टिक गईं। वह राजेंद्र वर्मा का सीधा वंशज था, उसका परपोता।
"मेरा," आर्यन ने शांति से कहा। "मेरा जीवन ले लो।"
"नहीं!" मृया चिल्लाई, पहली बार उसकी आवाज़ में घबराहट थी। "तुम्हारा नहीं। तुमने तो मुझे बचाया है। तुमने मुझे याद दिलाई है।"
"पर मेरे खून में ही वह पाप है," आर्यन ने कहा। "और अगर मेरी मृत्यु से तुम्हें शांति मिलेगी, तो मैं तैयार हूँ।"
विजय की आत्मा आगे आई। "नहीं। यह मेरा दोष है। मेरे कायरता का। मेरा जीवन ले लो... पर मैं तो पहले से मरा हुआ हूँ।"
तभी, एक और आवाज़ आई। पुरानी, कर्कश, पर दृढ़।
"मेरा।"
सभी ने पीछे मुड़कर देखा। राजेंद्र वर्मा की तस्वीर से एक छाया निकल रही थी। एक बूढ़े आदमी की आत्मा, सिर झुकाए हुए।
"दादा?" देवेंद्र ने फुसफुसाया।
"मैं ही दोषी हूँ," राजेंद्र वर्मा की आत्मा बोली। "मैंने दो निर्दोष जीवन लिए। मैंने अपने ही बेटे को मारा। और सौ साल से मैं नरक में जल रहा हूँ।"
उसने मृया की ओर देखा। "मैत्रेयी... मैं माफी माँगता हूँ। और मैं... मैं कीमत चुकाना चाहता हूँ।"
काल ने सिर हिलाया। "तुम मर चुके हो। तुम्हारे पास देने के लिए कुछ नहीं है।"
"मेरी आत्मा है," राजेंद्र ने कहा। "मेरी शाश्वत आत्मा। उसे ले लो। उसे नष्ट कर दो। मिटा दो। बस इन लोगों को शांति दो।"
एक सन्नाटा छा गया। शाश्वत आत्मा का विनाश, इससे बड़ी कीमत और क्या हो सकती थी?
मृया ने सिर हिलाया। "नहीं। मैं यह नहीं चाहती। कोई भी शाश्वत विनाश नहीं चाहेगा।"
"पर यही न्याय है," काल ने कहा।
तभी, आर्यन के दिमाग में एक विचार कौंधा। "रुको। एक और रास्ता है।"
सभी ने उसकी ओर देखा।
"राजेंद्र वर्मा ने दो जीवन लिए," आर्यन ने कहा। "तो उसे दो जीवन देने चाहिए। नए जीवन।"
"क्या मतलब?" काल ने पूछा।
आर्यन ने मृया और विजय की ओर देखा। "उन्हें नया जन्म दो। एक साथ। जिस प्रेम को राजेंद्र ने मारा था, उसे नया जीवन दो। और बदले में... राजेंद्र की आत्मा को मिटने की बजाय, उसे सजा दो। उसे... उनका रक्षक बना दो। उनके नए जन्म की रक्षक आत्मा।"
काल चुप रहा। पूरी हवेली में सन्नाटा था। फिर, काल की लाल आँखें मद्धम पड़ने लगीं।
"यह... एक नया प्रस्ताव है," काल ने कहा। "पर यह नियमों के विरुद्ध है। मुझे परिषद से पूछना होगा।"
तभी काल की आँखें चमक उठीं, मानो उसे कोई संदेश मिला हो।
"परिषद ने फैसला कर लिया है," काल ने कहा, उसकी आवाज़ में एक नई गंभीरता थी। "उन्होंने तुम्हारा प्रस्ताव ठुकरा दिया है।"
"क्या?" मृया चौंक गई।
"वे मानते हैं कि तुम तीनों का बंधन इतना शक्तिशाली है कि यह नए जन्म में भी टूटेगा नहीं," काल ने कहा। "इसलिए... तुम तीनों को एक नई परीक्षा से गुजरना होगा।"
"कैसी परीक्षा?" आर्यन ने पूछा।
"सात परीक्षाएँ, सात दिन," काल ने कहा। "हर परीक्षा तुम्हारे बंधन की शक्ति को परखेगी। अगर तुम सफल हो गए, तो तुम्हें एक साथ रहने की अनुमति मिलेगी। असफल होने पर... तुम तीनों हमेशा के लिए भटकने वाली आत्माएँ बन जाओगे। न जीवन, न मृत्यु। सिर्फ... अस्तित्व।"
सूर्योदय की पहली किरण ने हवेली को रोशन कर दिया। काल ने अपने हाथ फैलाए।
"कल से शुरू होगी पहली परीक्षा। तैयार रहना।"
और वह गायब हो गया।
आर्यन, मृया और विजय ने एक-दूसरे की ओर देखा। उनके सामने सात दिनों की सबसे कठिन परीक्षा थी।
पर वे डरे नहीं थे।
क्योंकि वे एक साथ थे।