भाग 4: दंडाधिकरण के सामने
चौराहे का पुराना बरगद वृक्ष सदियों से खड़ा था, पर आज रात उसकी उपस्थिति में एक अलौकिक भय समाया हुआ था। आधी रात का वक्त था, और सुनसान सड़क पर सिर्फ आर्यन खड़ा था, उसकी नब्ज तेजी से धड़क रही थी। उसने अपनी कलाई देखी, मृया के हाथ का निशान अब पूरी तरह उभर आया था, जैसे कोई टैटू।
"मैं यहाँ हूँ," उसने हवा में कहा। "मृया, तुम हो न?"
हवा में एक ठंडी लहर दौड़ गई। मृया धीरे-धीरे प्रकट हुई, उसकी आकृति आज और स्पष्ट थी। शायद इसलिए कि आर्यन अब उसे बेहतर देख पा रहा था, या शायद इसलिए कि उनका बंधन गहरा हो रहा था।
उसने आर्यन की ओर देखा, उसकी आँखों में डर था, पर दृढ़ता भी। उसने संकेत किया: तैयार?
"हाँ," आर्यन ने कहा। "पर यह दंडाधिकरण क्या है? कौन हैं ये लोग?"
मृया ने अपने हाथों से एक वृत्त बनाया, परिषद। फिर एक के बाद एक पाँच उँगलियाँ दिखाईं, पाँच सदस्य। सबसे पुराने दूत।
तभी, बरगद के पेड़ की छाया हिलने लगी। पाँच आकृतियाँ धीरे-धीरे प्रकट हुईं, हर एक अलग रूप में। एक लंबा और पतला, दूसरा गोलाकार, तीसरा टेढ़ा-मेढ़ा, चौथा एक बच्चे के आकार का, और पाँचवाँ... काल, जिसकी लाल आँखें आज और ज्वलंत थीं।
"आर्यन वर्मा और मृया," काल की आवाज़ गूंजी, हर दिशा से आती हुई। "तुम दोनों नियमों का उल्लंघन करने के लिए हमारे सामने उपस्थित हुए हो।"
पहली आकृति, जो लंबी और पतली थी, आगे बढ़ी। उसकी आवाज़ पत्थरों के रगड़ने जैसी थी। "मृया, तुम्हारा कर्तव्य था आर्यन वर्मा की आत्मा उसके निर्धारित समय पर ले जाना। तुमने ऐसा क्यों नहीं किया?"
मृया ने अपने हाथों पर "अनिश्चित" शब्द दिखाया।
"हाँ, हम जानते हैं," दूसरी आकृति बोली, जिसकी आवाज़ पानी के बहाव जैसी थी। "पर यह 'अनिश्चित' क्यों है? क्या तुमने उसके जीवन-सूत्र में हस्तक्षेप किया?"
मृया ने जोर से सिर हिलाकर न कहा।
"तो फिर क्या हुआ?" तीसरी आकृति बोली, जिसकी आवाज़ सूखे पत्तों की सरसराहट जैसी थी।
आर्यन आगे बढ़ा। "मैं बता सकता हूँ।"
सभी आकृतियाँ उसकी ओर मुड़ीं। उनका ध्यान महसूस कर आर्यन की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई, पर उसने अपनी आवाज़ स्थिर रखी।
"जब मृया ने पहली बार मेरी आत्मा लेने की कोशिश की," आर्यन ने कहा, "तो कुछ अजीब हुआ। उसकी शक्ति मुझ तक पहुँची ही नहीं। और जब वह मेरे करीब आई, तो मुझे... यादें आनी शुरू हुईं।"
"यादें?" चौथी आकृति, जो बच्चे के आकार की थी, ने पूछा। उसकी आवाज़ घंटी जैसी थी। "किसकी यादें?"
"मृया की," आर्यन ने कहा। "और मेरी भी। पुरानी यादें। एक हवेली। एक लाल गुलाब। बारिश।"
परिषद के सदस्यों के बीच एक असुविधाजनक खामोशी छा गई। फिर काल बोला: "यह असंभव है। दूतों की कोई यादें नहीं होतीं। वे निर्विकार होते हैं।"
"शायद वह हमेशा से दूत नहीं थी," आर्यन ने कहा। "शायद उसे दूत बनाया गया था। एक सजा के तौर पर।"
मृया ने आर्यन की ओर देखा, हैरान। उसे खुद यह बात नहीं पता थी।
पहली आकृति फिर से बोली: "हमें पिछले दराज़ों की जाँच करनी होगी। मृया, तुम्हारी उत्पत्ति का रिकॉर्ड।"
काल ने अपना हाथ उठाया, और उसके सामने हवा में एक प्रकाशमान पुस्तक प्रकट हुई। पन्ने अपने आप पलटने लगे, हजारों नाम और तिथियाँ तेजी से गुजरने लगीं। फिर वह रुका।
"मृया," काल ने पढ़ा। "पूर्व नाम: मैत्रेयी। मृत्यु: 15 जून, 1923। कारण: विष। सजा: सौ वर्ष का भटकाव।"
"विष?" आर्यन ने पूछा, उसकी आवाज़ में दहशत थी। "उसे जहर दिया गया था?"
"हाँ," काल ने कहा। "और सजा थी सौ वर्ष तक आत्माओं को ले जाने का कार्य, बिना किसी याद के, बिना किसी पहचान के।"
मृया, मैत्रेयी, ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, पर इस बार वे आँसू नहीं थे, वे चाँदी की बूंदें थीं जो हवा में घुल गईं।
"पर सौ वर्ष तो पूरे हो गए," दूसरी आकृति ने कहा। "1923 से 2023। अब तो तुम्हें मुक्त हो जाना चाहिए था। मोक्ष मिलना चाहिए था।"
"तो फिर क्यों नहीं मिला?" आर्यन ने पूछा।
पुस्तक के पन्ने फिर से पलटे। "क्योंकि एक शर्त पूरी नहीं हुई," काल ने पढ़ा। "उसके हत्यारे के वंशज से माफी।"
आर्यन का दिल एकदम से रुक सा गया। "उसके हत्यारे के... वंशज?"
सभी की नजरें उस पर टिक गईं। मृया ने आर्यन की ओर देखा, उसकी आँखों में एक नई समझ उभर रही थी।
"हाँ," काल ने कहा, उसकी आवाज़ में एक विषैली मिठास थी। "मैत्रेयी को जहर देकर मारने वाला था राजेंद्र वर्मा। तुम्हारे परदादा।"
आर्यन पीछे हट गया, जैसे उसे कोई चोट पहुँचाई गई हो। "नहीं... यह संभव नहीं।"
"पर यह सच है," तीसरी आकृति ने कहा। "राजेंद्र वर्मा ने मैत्रेयी को जहर दिया था, क्योंकि वह उसके बेटे से प्यार करती थी, और राजेंद्र को यह मंजूर नहीं था।"
आर्यन ने मृया की ओर देखा। उसकी आँखों में अब सदमा था, और दर्द। सैकड़ों वर्षों का दर्द।
"इसलिए तुम मेरी आत्मा नहीं ले पा रही थी," आर्यन ने फुसफुसाया। "क्योंकि तुम्हें माफी चाहिए थी। मेरे परिवार से माफी।"
मृया ने हाँ में सिर हिलाया, अब रोते हुए। उसने संकेत किया: मैं नहीं जानती थी। मुझे याद नहीं था।
"और जब तुम मेरे पास आईं," आर्यन ने कहा, "तो तुम्हें यादें आने लगीं। और मुझे भी। क्योंकि हमारे भाग्य जुड़े हुए हैं।"
काल आगे बढ़ा। "अब जब सच्चाई सामने आ गई है, तो निर्णय का समय है। मृया ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया। उसने एक इंसान से भावनात्मक लगाव बना लिया। सजा: शाश्वत विस्मृति।"
"नहीं!" आर्यन ने चिल्लाया, मृया के सामने खड़ा हो गया। "उसने कुछ गलत नहीं किया। वह तो बस... माफी चाह रही थी। शांति चाह रही थी।"
"यह हमारे नियम नहीं हैं," पहली आकृति ने कहा।
"तो फिर नियम बदलो!" आर्यन ने कहा, उसकी आवाज़ में एक नई शक्ति थी। "सौ साल तक भटकने की सजा काफी नहीं थी? उसे अपनी पहचान भूलने की सजा? अपनी यादें खोने की सजा? और अब जब उसे थोड़ी सी शांति मिल रही है, तो तुम उसे हमेशा के लिए मिटा दोगे?"
परिषद के सदस्य चुप थे।
आर्यन ने मृया का हाथ थामा। इस बार, एक तेज चमक निकली, नीली और सुनहरी, जो पूरे चौराहे को रोशन कर दिया। दोनों की कलाइयों के निशान जगमगा उठे।
"देखो," आर्यन ने कहा। "यह सिर्फ एक बंधन नहीं है। यह... संतुलन है। मृया ने मेरी जान बचाई है। हर बार जब वह मेरे पास आती है, मैं मजबूत होता जाता हूँ। और उसे यादें वापस मिलती हैं।"
"यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है," काल ने कहा, पर उसकी आवाज़ में पहले जैसी दृढ़ता नहीं थी।
"शायद प्रकृति का यही नियम है," चौथी आकृति, बच्चे के आकार वाली, बोली। "शायद कुछ बंधन इतने मजबूत होते हैं कि वे मृत्यु को भी पार कर जाते हैं। शायद यही तो कर्म का चक्र है, गलती का प्रायश्चित।"
एक लंबी खामोशी छा गई। फिर पहली आकृति बोली: "हमें विचार करना होगा। एक सप्ताह का समय। उसके बाद हम निर्णय सुनाएँगे।"
"पर..." आर्यन ने कहा।
"एक सप्ताह," काल ने दोहराया, और उसकी आवाज़ में अब एक अलग ही भाव था, शायद सम्मान, या शायद डर। "उस समय तक, तुम दोनों स्वतंत्र हो। पर याद रखो: अगर यह बंधन टूटता है, तो दोनों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।"
और वे गायब हो गए।
आर्यन और मृया अकेले रह गए, बरगद के पेड़ के नीचे। हवा में अब वह ठंडक नहीं थी। बल्कि एक कोमल गर्मी थी।
मृया ने आर्यन की ओर देखा, उसकी आँखों में आभार और दर्द का मिश्रण था। उसने संकेत किया: तुम्हारे परदादा ने मुझे मारा।
"हाँ," आर्यन ने कहा, उसकी आवाज़ भारी थी। "और मैं... मैं तुमसे माफी माँगता हूँ। उसकी तरफ से। मेरी तरफ से। हमारे पूरे वंश की तरफ से।"
उसने झुककर मृया के हाथ को चूमा। और जैसे ही उसके होंठ उसकी त्वचा को छुए, एक चमत्कार हुआ।
मृया के शरीर से एक चमकती हुई रोशनी निकली, जो आकाश की ओर उठी। उसकी आकृति और स्पष्ट हो गई। अब वह पूरी तरह से दिखाई दे रही थी, जैसे कोई साधारण इंसान, गहरी आँखें, लंबे बाल, और एक दुखभरी सुंदरता।
और उसकी आँखों से जो आँसू गिरे, वे अब चाँदी की बूंदें नहीं थे, वे साधारण, गर्म आँसू थे।
उसने पहली बार आवाज़ निकाली। धीमी, कर्कश, पर मधुर।
"धन्यवाद," उसने कहा।
आर्यन की साँस रुक गई। "तुम... तुम बोल सकती हो?"
मृया ने हाँ में सिर हिलाया, एक मुस्कान उसके होंठों पर खेल रही थी। "माफी... मुक्त करती है।"
और उस पल, आर्यन जान गया कि उनका सफर अभी खत्म नहीं हुआ था। वास्तविकता तो अब शुरू हो रही थी।
क्योंकि अब उनके पास एक सप्ताह था साबित करने के लिए कि उनका प्यार न सिर्फ एक पाप का प्रायश्चित था, बल्कि एक नई शुरुआत थी।
और उन्हें चंद्रनगर जाना था, उस हवेली में जहाँ यह सब शुरू हुआ था।