भाग 9: परीक्षा तीन, त्याग की कसौटी
तीसरे दिन की सुबह चंद्रनगर में बारिश के साथ आई। वर्मा हवेली की छत पर बारिश की बूंदों की आवाज़ एक सुरीला संगीत बना रही थी, पर आर्यन, मृया और विजय के लिए, यह आवाज़ एक अशुभ संकेत जैसी लग रही थी।
"त्याग," विजय ने कहा, छत के शेड के नीचे बैठे हुए। "मेरे पास तो त्यागने के लिए कुछ है ही नहीं। मैं तो पहले ही सब कुछ त्याग चुका हूँ, जीवन, प्रेम, सब कुछ।"
मृया ने उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में दर्द था। "हम सभी ने त्याग दिया है। मैंने अपनी पहचान त्याग दी। अपनी यादें।"
आर्यन चुपचाप बारिश को देख रहा था। "शायद यह त्याग उससे अलग होगा। शायद हमें कुछ ऐसा त्यागना पड़ेगा जो हमें अब भी चाहिए।"
तभी, बारिश की बूंदों ने एक अजीब सा पैटर्न बनाना शुरू कर दिया। हवा में बूंदें जमने लगीं, और एक प्रकाशमान पोर्टल बन गया। पर इस बार यह पोर्टल पारदर्शी था, जैसे बर्फ का बना हो।
काली की आवाज़ आई, पर आज उसमें एक अलग ही भारीपन था। "तीसरी परीक्षा का समय। त्याग की कसौटी। याद रखो, कभी-कभी पाने के लिए छोड़ना पड़ता है।"
पोर्टल ने तीनों को अंदर खींच लिया, और इस बार वे एक साथ गए।
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तीनों खुद को एक विशाल हॉल में पाए। हॉल का फर्श शीशे का बना हुआ था, और नीचे अनंत गहराई दिख रही थी। हॉल के बीच में तीन कुर्सियाँ थीं, और हर कुर्सी के सामने एक टेबल पर एक वस्तु रखी हुई थी।
काली हॉल के एक छोर पर खड़ी थी, और उसके साथ वह सुनहरी आँखों वाला युवक भी था।
"मैं हूँ सुवर्ण," युवक ने खुद को पहली बार पेश किया। "परिषद का तीसरा सदस्य। मैं मूल्यों का रक्षक हूँ, हर चीज़ की कीमत, हर बलिदान का मूल्य।"
काली ने आगे बढ़कर कहा: "आज की परीक्षा सीधी है। हर एक के सामने एक वस्तु है। तुम्हें उसे त्यागना होगा।"
आर्यन ने अपनी टेबल की ओर देखा। उस पर एक पुरानी घड़ी रखी थी, उसकी घड़ी, ओमेगा सीमास्टर, जो उसके पिता की थी।
मृया की टेबल पर एक लाल गुलाब रखा था, वही गुलाब जो विजय ने उसे दिया था।
विजय की टेबल पर एक पुरानी तस्वीर थी, मृया (मैत्रेयी) की तस्वीर, जो उसने छुपा कर रखी थी।
"ये वस्तुएँ तुम्हारी सबसे कीमती यादों से जुड़ी हैं," सुवर्ण ने कहा। "इन्हें त्यागो, और परीक्षा पास करो।"
"पर क्यों?" मृया ने पूछा। "हमें इन्हें क्यों त्यागना है?"
"क्योंकि त्याग ही सच्ची शक्ति है," काली ने कहा। "जो तुम छोड़ सकते हो, वही तुम्हें नियंत्रित नहीं कर सकता हे।"
आर्यन ने घड़ी को उठाया। यह उसके पिता की एकमात्र निशानी थी। उसके मरने के बाद, यह घड़ी ही थी जिसने उसे आगे बढ़ने की ताकत दी थी।
"इसे त्यागने का मतलब है अपने पिता को त्यागना," आर्यन ने कहा।
"नहीं," सुवर्ण ने कहा। "इसका मतलब है यादों के मोह को त्यागना। तुम्हारे पिता तुम्हारे दिल में हैं, इस घड़ी में नहीं।"
मृया ने गुलाब को छुआ। इसकी पंखुड़ियाँ अभी भी ताजी थीं, जैसे अभी-अभी तोड़ा गया हो। यह गुलाब उसके और विजय के प्यार का प्रतीक था। सौ साल पुराना प्यार।
"इसे त्यागने का मतलब है हमारे प्यार को त्यागना," मृया ने कहा।
"नहीं," काली ने कहा। "इसका मतलब है प्यार के प्रतीक के मोह को त्यागना। प्यार तुम्हारे दिल में है, इस गुलाब में नहीं।"
विजय ने तस्वीर को देखा। इसमें मैत्रेयी मुस्कुरा रही थी, बगीचे में खड़ी हुई। यह तस्वीर उसने खुद खींची थी, चोरी छिपे। उसकी मृत्यु के बाद, यह तस्वीर उसकी एकमात्र संगति थी।
"इसे त्यागने का मतलब है उसकी याद को त्यागना," विजय ने कहा।
"नहीं," सुवर्ण ने कहा। "इसका मतलब है याद के सहारे के मोह को त्यागना। वह तुम्हारी यादों में है, इस तस्वीर में नहीं।"
तीनों चुपचाप खड़े रहे। हॉल में सन्नाटा छा गया।
"तुम्हें एक घंटा है," काली ने कहा। "समय समाप्त होने से पहले निर्णय लो।"
और दोनों गायब हो गए।
आर्यन ने घड़ी को अपने हाथ में लिया। उसे याद आया कि कैसे उसके पिता ने यह घड़ी उसे दी थी, उसके मेडिकल कॉलेज में दाखिले के दिन।
"हर सेकंड कीमती है, बेटा," उसके पिता ने कहा था। "इसे बर्बाद मत करना।"
पर क्या घड़ी के बिना समय की कीमत कम हो जाएगी? क्या यादों के बिना प्यार कम हो जाएगा?
उसने मृया और विजय की ओर देखा। वे भी संघर्ष कर रहे थे।
"क्या हम सच में यह कर पाएँगे?" मृया ने पूछा, आँसू उसकी आँखों में थे।
विजय ने तस्वीर को अपने दिल से लगा लिया। "मैं नहीं जानता। सौ साल से यह तस्वीर मेरे साथ है।"
आर्यन ने गहरी साँस ली। "शायद... शायद यह त्याग का सही अर्थ नहीं है।"
"क्या मतलब?" मृया ने पूछा।
"हमें वस्तुएँ त्यागनी हैं," आर्यन ने कहा। "पर क्या वस्तुएँ ही सब कुछ हैं? क्या हम इन वस्तुओं के बिना अपनी यादें, अपना प्यार नहीं रख सकते?"
विजय ने सोचा। "शायद... शायद त्याग का मतलब है विश्वास करना। विश्वास करना कि हमारी यादें हमारे दिलों में सुरक्षित हैं। चाहे वस्तुएँ रहें या न रहें।"
मृया ने गुलाब को सूँघा। "पर यह इतना सुंदर है। इतना कीमती।"
"और हमेशा रहेगा," आर्यन ने कहा। "तुम्हारी याद में। तुम्हारे दिल में।"
तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। और तभी, आर्यन के दिमाग में एक विचार आया।
"रुको," उसने कहा। "हमें वस्तुएँ त्यागनी हैं, पर किसको? हम इन्हें किसको देंगे?"
हॉल में सन्नाटा था। कोई जवाब नहीं आया।
"शायद... हमें एक-दूसरे को देना चाहिए," विजय ने कहा।
"क्या मतलब?" मृया ने पूछा।
विजय ने मृया की ओर देखा। "मैं तुम्हें अपनी तस्वीर देता हूँ। तुम मुझे तुम्हारा गुलाब दो। और आर्यन... तुम हम दोनों को तुम्हारी घड़ी दो।"
आर्यन ने समझा। "और इस तरह, हम वस्तुएँ त्याग देंगे, पर उनका मूल्य नहीं। हम उन्हें एक-दूसरे को देकर उनका मूल्य बढ़ा देंगे।"
"पर क्या यह त्याग माना जाएगा?" मृया ने चिंतित होकर पूछा।
"आज़माते हैं," आर्यन ने कहा।
विजय ने अपनी तस्वीर मृया को दी। "यह लो। अब यह तुम्हारी है।"
मृया ने गुलाब विजय को दिया। "और यह तुम्हारा।"
आर्यन ने घड़ी दोनों के सामने रखी। "और यह हम सभी की।"
और तभी, एक चमत्कार हुआ।
घड़ी की सुइयाँ उलटी घूमने लगीं। गुलाब चमकने लगा। तस्वीर से एक रोशनी निकली।
तीनों वस्तुएँ हवा में उठ गईं, और एक दूसरे के चारों ओर घूमने लगीं। फिर वे आपस में मिल गईं, और एक नई वस्तु बन गईं, एक छोटी सी संदूकची, जिस पर तीनों के निशान थे।
संदूकची जमीन पर गिरी, और खुल गई। अंदर से तीन चीज़ें निकलीं:
1. आर्यन के लिए एक नई घड़ी, जिस पर मृया और विजय के निशान थे।
2. मृया के लिए एक सोने का गुलाब, जो हमेशा ताजा रहेगा।
3. विजय के लिए एक लॉकेट, जिसमें मृया की तस्वीर थी।
काली और सुवर्ण फिर से प्रकट हुए। काली की आँखों में आश्चर्य था, सुवर्ण के चेहरे पर मुस्कान।
"तुमने... त्याग नहीं किया," सुवर्ण ने कहा। "तुमने बदल दिया। रूपांतरित कर दिया।"
"हमने मोह त्याग दिया," आर्यन ने कहा। "वस्तुओं का मोह। पर हमने उनका मूल्य नहीं त्यागा। हमने उसे बाँट दिया।"
काली मुस्कुराई। "यह त्याग से भी बड़ा है। यह... उदारता है। दान है। और यह तीसरी परीक्षा पास करने के लिए पर्याप्त है।"
"पर चौथी परीक्षा?" मृया ने पूछा।
"कल," सुवर्ण ने कहा। "सच्चाई का सामना। और मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ, यह सबसे कठिन होगी। क्योंकि कभी-कभी सच्चाई वह नहीं होती जो तुम सोचते हो।"
और वे गायब हो गए।
तीनों नई वस्तुएँ लेकर खड़े रहे। उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा।
"हमने पार कर लिया," विजय ने कहा।
"पर कल..." मृया ने कहा।
"कल का सोचेंगे कल," आर्यन ने कहा। "आज... आज हम जीत गए।"
और तीनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।
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रात को, जब सब सो रहे थे (या सोने का प्रयास कर रहे थे), हवेली के बरामदे में एक छाया फिर से प्रकट हुई।
यह सुवर्ण था। वह अकेला था।
उसने आर्यन के कमरे की ओर देखा, फिर मृया की ओर, फिर विजय की ओर। उसकी सुनहरी आँखें चमक रही थीं।
"तुम सच में खास हो," उसने फुसफुसाया। "पर क्या तुम सच्चाई का सामना कर पाओगे? क्या तुम जान पाओगे कि तुम्हारा बंधन सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है?"
उसने अपना हाथ उठाया, और हवा में एक दृश्य बनाया। इसमें आर्यन, मृया और विजय थे, पर वे और थे, पुराने कपड़े, पुराने चेहरे, पर एक ही आँखें।
"तुम हमेशा से एक साथ रहे हो," सुवर्ण ने कहा, खुद से बात करते हुए। "हर जन्म में। और हर बार, तुम्हें अलग कर दिया गया।"
दृश्य बदला। अब एक प्राचीन युग था। आर्यन एक योद्धा था, मृया एक पुजारिन, विजय एक कवि।
"पहला जन्म," सुवर्ण ने कहा। "तुम तीनों मिले, और तुम्हें मार दिया गया।"
दृश्य फिर बदला। मध्ययुग। आर्यन एक डॉक्टर, मृया एक नर्स, विजय एक दवा विक्रेता।
"दूसरा जन्म। फिर मिले। फिर अलग किए गए।"
दृश्य फिर बदला। ब्रिटिश काल। आर्यन एक स्वतंत्रता सेनानी, मृया उसकी सहयोगी, विजय एक शहीद।
"तीसरा जन्म। फिर वही कहानी।"
और अब... यह जन्म।
"क्या यह संयोग है?" सुवर्ण ने पूछा, खुद से। "या कोई योजना? कोई शाप? या... कोई परीक्षा?"
उसने दृश्य मिटा दिया। "कल। कल तुम्हें सच्चाई पता चलेगी। और तब... तुम्हें चुनाव करना होगा।"
और वह गायब हो गया, एक सुनहरी धूल छोड़कर जो हवा में घुल गई।
पर उसकी बातें हवा में लटकी रहीं, एक चेतावनी की तरह।
सच्चाई।
शायद सबसे बड़ा डर सच्चाई नहीं होती।
शायद सबसे बड़ा डर यह होता है कि सच्चाई वह न हो जो तुम चाहते हो।
और कल, आर्यन, मृया और विजय को यह सच्चाई सामने आनी ही थी।
चाहे वे तैयार हों या न हों।