भाग 7: परीक्षा एक, भय का सामना
पूर्णिमा की रात के बाद का पहला दिन चंद्रनगर में एक अजीब सी शांति लेकर आया था। वर्मा हवेली अब खाली नहीं लग रही थी, तीन आत्माएँ और एक रहस्यमय बंधन उसे जीवित कर रहे थे।
आर्यन हवेली के बरामदे में बैठा अपनी कलाई के निशान को देख रहा था। मृया का हाथ अब और स्पष्ट था, जैसे कोई जीवित चीज़ उसकी त्वचा के नीचे धड़क रही हो। विजय की वापसी ने सब कुछ बदल दिया था, अब यह दो नहीं, तीन आत्माओं की कहानी थी।
"तुम सोच रहे हो कि यह सब क्यों?" मृया की आवाज़ ने उसे चौंकाया।
वह बरामदे के दूसरे छोर से आ रही थी, विजय उसके साथ था। विजय की आत्मा अब पहले से ज्यादा स्थिर थी, मृया के साथ रहने से उसे ताकत मिल रही थी।
"हाँ," आर्यन ने कहा। "क्यों हमें इन परीक्षाओं से गुजरना पड़ रहा है? क्या सिर्फ माफी काफी नहीं थी?"
विजय बैठ गया, उसकी आँखों में वही पुराना दर्द था। "शायद इसलिए क्योंकि हमारा बंधन... सामान्य से परे है। मैं मर चुका था। मृया एक दूत बन चुकी थी। और तुम... तुम मर नहीं सकते। यह प्रकृति के नियमों को चुनौती है।"
तभी, हवा में वही ठंडक वापस आई। पर इस बार यह अलग थी, यह भेदक नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म सिहरन थी, जैसे कोई दरवाज़ा खुल रहा हो।
सामने की दीवार पर एक प्रकाशमान पोर्टल दिखाई दिया। उसमें से एक आवाज़ आई, पर यह काल की नहीं थी, यह एक महिला की आवाज़ थी, मधुर पर दृढ़।
"पहली परीक्षा का समय आ गया है। भय का सामना।"
मृया ने आर्यन का हाथ थाम लिया। "हम साथ हैं।"
विजय ने दूसरी तरफ से उसका हाथ थामा। "हमेशा।"
पोर्टल चमका, और तीनों को अंदर खींच लिया।
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जब आर्यन की आँखें खुलीं, तो वह एक ऐसी जगह था जिसे वह बहुत अच्छी तरह जानता था, एम्स का ऑपरेशन थियेटर। पर कुछ गलत था।
वह ऑपरेशन टेबल पर लेटा हुआ था, लेकिन मरीज़ नहीं, डॉक्टर की तरह। उसके हाथ में स्केलपेल था। और टेबल पर जो मरीज़ लेटा था... वह मृया थी।
"नहीं!" आर्यन चिल्लाया, पर उसकी आवाज़ कमरे में गूंजी नहीं।
उसने अपने हाथों को देखा, वे अपने आप हिल रहे थे। स्केलपेल मृया के सीने की ओर बढ़ रहा था। आर्यन ने रोकने की कोशिश की, पर उसका शरीर उसके नियंत्रण में नहीं था।
"यह तुम्हारा सबसे बड़ा डर है," एक आवाज़ गूंजी। "कि तुम उसे चोट पहुँचाओगे। कि तुम्हारे हाथों से उसकी मृत्यु होगी।"
मृया की आँखें खुलीं। वह डरी हुई नहीं थी, वह शांत थी। "आर्यन," उसने कहा। "मुझ पर विश्वास करो।"
"मैं नहीं कर सकता!" आर्यन चिल्लाया। "मैं तुम्हें मार दूँगा!"
"तो फिर मत करो," मृया ने कहा। "रुक जाओ।"
"मैं रुक नहीं सकता! मेरा शरीर..."
"तुम्हारा शरीर नहीं, तुम्हारा मन है जो नियंत्रण कर रहा है," मृया ने कहा। "तुम्हारा डर। डर को जाने दो।"
स्केलपेल अब मृया की त्वचा को छू रहा था। एक बूँद खून निकल आया।
आर्यन ने आँखें बंद कर लीं। उसने गहरी साँस ली। यह सच नहीं है। यह एक परीक्षा है। मेरा डर ही मेरा दुश्मन है।
उसने अपने मन में मृया की तस्वीर बनाई, हवेली की छत पर, चाँदनी में मुस्कुराती हुई। अस्पताल की छत पर, उसकी जान बचाती हुई। बरगद के पेड़ के नीचे, उसके लिए लड़ती हुई।
और धीरे-धीरे, उसके हाथ रुकने लगे।
स्केलपेल जमीन पर गिर गया।
आर्यन की आँखें खुलीं। वह अब ऑपरेशन थियेटर में नहीं था। वह एक छोटे से कमरे में था, और सामने... विजय था।
पर यह विजय नहीं था जिसे वह जानता था। यह विजय का डर था।
विजय की दुनिया अलग थी। वह वर्मा हवेली की रसोई में था, पर समय 1923 में वापस चला गया था।
उसके सामने उसके पिता, राजेंद्र वर्मा खड़े थे, हाथ में एक गिलास लिए हुए।
"पियो, बेटा," राजेंद्र ने कहा। "यह दवा है। तुम बीमार हो।"
विजय पीछे हट गया। "नहीं। तुमने मैत्रेयी को यही कहा था। और फिर तुमने उसे मार डाला।"
"वह एक भूल थी," राजेंद्र ने कहा, उसकी आवाज़ में एक खतरनाक मिठास थी। "पर तुम... तुम मेरे बेटे हो। मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।"
"तुम पहले ही पहुँचा चुके हो," विजय ने कहा, आँसू उसकी आँखों में थे। "तुमने मेरी ज़िंदगी ले ली। मेरा प्यार ले लिया। अब क्या बचा है?"
"तुम्हारी आत्मा," राजेंद्र ने कहा। "वह अभी भी यहाँ है। और अगर तुम यह दवा पी लोगे, तो तुम्हें शांति मिल जाएगी। तुम मैत्रेयी से मिल जाओगे।"
विजय ने गिलास की ओर देखा। उसमें एक दूधिया तरल था, बिल्कुल वैसा ही जैसा उस रात था।
"यह झूठ है," विजय ने कहा। "तुम मुझे फिर से मारोगे।"
"मरना ही तो एकमात्र रास्ता है उससे मिलने का," राजेंद्र ने कहा। "क्या तुम उससे इतना प्यार नहीं करते कि उसके लिए मर सको?"
विजय का दिल तेजी से धड़क रहा था। यह वही डर था जिसने उसे सौ साल तक जकड़े रखा, क्या वह कायर है? क्या उसने मैत्रेयी को बचाने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की?
तभी, उसे एक आवाज़ सुनाई दी। मृया की आवाज़।
"विजय, मैं यहाँ हूँ। मैं जीवित हूँ। तुम्हें मरने की जरूरत नहीं है।"
"पर कैसे?" विजय ने पूछा।
"हमारा प्यार ही हमें जीवित रखता है," मृया की आवाज़ ने कहा। "तुम्हारा डर नहीं, तुम्हारा साहस। उस गिलास को फेंक दो।"
विजय ने गिलास की ओर देखा। उसके पिता की आँखों में वही पागलपन था जो उस रात था।
"नहीं," विजय ने कहा, दृढ़ता से। "मैं नहीं पीऊँगा। न इस जन्म में, न किसी और में।"
उसने गिलास को ज़ोर से फेंक दिया। वह दीवार से टकराया और टूट गया।
राजेंद्र की आकृति धुंधली पड़ने लगी। "तुम हार जाओगे, बेटा। डर ही एकमात्र सच है।"
"नहीं," विजय ने कहा। "प्यार सच है। और मैं उसके लिए लड़ूँगा।"
और वह कमरे से बाहर निकल आया।
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मृया की परीक्षा सबसे अलग थी। वह उसी जगह थी जहाँ से सब शुरू हुआ था, वर्मा हवेली का बगीचा, पर वह अकेली नहीं थी।
उसके सामने सैकड़ों आत्माएँ खड़ी थीं, वे सभी आत्माएँ जिन्हें उसने सौ साल में ले जाया था। बच्चे, बूढ़े, मर्द, औरतें... सभी की आँखों में एक ही सवाल था।
"तुमने हमें ले लिया," एक बच्चे की आत्मा बोली। "क्यों?"
"तुम हमारी मौत हो," एक बूढ़े आदमी ने कहा।
"तुमने हमें हमारे परिवारों से छीन लिया," एक युवती रोती हुई बोली।
मृया पीछे हट गई। यह उसका सबसे बड़ा डर था, कि वह एक खलनायक है। एक हत्यारा। सौ साल तक उसने यही सोचा था कि वह एक अभिशाप है।
"मैं... मैंने सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया," उसने कहा, उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"कर्तव्य?" एक आत्मा चिल्लाई। "हमारी जान लेना कोई कर्तव्य नहीं है! वह हत्या है!"
"नहीं!" मृया ने कहा, अब रोते हुए। "मैंने तुम्हें शांति दी। मैंने तुम्हें अगले जन्म तक पहुँचाया।"
"पर हम नहीं जाना चाहते थे!" सैकड़ों आवाज़ें एक साथ बोलीं।
मृया ने अपने कान बंद कर लिए। वह गिर गई, उसका शरीर काँप रहा था। यह डर उससे बड़ा था। यह सच उससे बड़ा था।
तभी, उसे दो हाथों का एहसास हुआ। एक उसके दाएं, एक बाएं।
आर्यन और विजय उसके साथ खड़े थे।
"तुम अकेली नहीं हो," आर्यन ने कहा।
"और तुम बुरी नहीं हो," विजय ने कहा।
मृया ने उनकी ओर देखा, आँसू उसकी आँखों में थे। "पर देखो... मैंने इतने लोगों को..."
"तुम उन्हें एक यात्रा पर ले गई," आर्यन ने कहा। "एक यात्रा जो हर किसी को करनी होती है। तुम उनकी मृत्यु नहीं हो, तुम उनकी मार्गदर्शक हो।"
विजय ने मृया का हाथ थामा। "और अगर तुम बुरी होतीं, तो तुम मुझे नहीं बचातीं। तुम आर्यन को नहीं बचातीं।"
मृया ने सैकड़ों आत्माओं की ओर देखा। उसने अपना हाथ उठाया, और उससे वही नीली रोशनी निकली जो आत्माओं को ले जाती थी।
"माफ़ करना," उसने कहा। "अगर मैंने तुम्हें दुख दिया है। पर यह मेरा कर्तव्य था। और अब... अब मैं समझती हूँ कि कर्तव्य और करुणा एक साथ चल सकते हैं।"
रोशनी ने सभी आत्माओं को छुआ। और एक-एक करके, वे मुस्कुराने लगीं। उनके चेहरों से डर गायब हो गया। शांति आ गई।
और फिर वे गायब हो गईं।
तीनों फिर से वर्मा हवेली के बरामदे में थे। सूरज अब ऊँचा हो चुका था।
"पहली परीक्षा पूरी हुई," वही महिला की आवाज़ फिर से आई।
सामने की हवा काँपी, और एक आकृति प्रकट हुई। यह काल नहीं थी, यह एक महिला थी, सफेद वस्त्रों में, उसके चेहरे पर एक दयालु मुस्कान थी।
"मैं हूँ काली," उसने कहा। "परिषद की एकमात्र महिला सदस्य। और मैं तुम्हारी परीक्षाओं की न्यायाधीश हूँ।"
"काली?" आर्यन ने पूछा।
"हाँ," उसने कहा। "काल का विपरीत। जहाँ काल विध्वंस है, वहीं मैं संरक्षण हूँ। जहाँ वह अंत है, वहीं मैं नवीन आरंभ हूँ।"
उसने तीनों की ओर देखा। "तुमने पहली परीक्षा पास कर ली है। तुमने अपने डर का सामना किया। पर यह सिर्फ शुरुआत है।"
"कल होगी दूसरी परीक्षा," काली ने कहा। "विश्वासघात का सामना। तैयार रहना।"
और वह गायब हो गई।
आर्यन, मृया और विजय एक-दूसरे की ओर देखे। उन्हें पता था कि अगली परीक्षा और कठिन होगी।
पर उन्हें यह भी पता था कि वे अकेले नहीं थे।
और कभी-कभी, एक साथ होना ही सबसे बड़ी ताकत होती है।
भले ही तुम मर चुके हो, या मर नहीं सकते, या मृत्यु की दूत हो।