भाग 5: चंद्रनगर की यात्रा
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए आर्यन को लग रहा था जैसे वह समय में पीछे की ओर यात्रा कर रहा हो। शहर की ऊँची इमारतें धीरे-धीरे गाँवों और खेतों में बदल रही थीं। तीन दिन बीत चुके थे दंडाधिकरण की सुनवाई को, और अब उनके पास सिर्फ चार दिन बचे थे।
मृया उसके सामने वाली सीट पर बैठी थी, अब पूरी तरह से दिखाई दे रही थी। माफी के बाद से उसका रूप स्थिर हो गया था, एक साधारण सूती साड़ी में, लंबे बाल बाँधे हुए। पर आम यात्री उसे नहीं देख पा रहे थे। सिर्फ आर्यन ही उसे देख सकता था, और शायद वे लोग भी जिनकी मृत्यु निकट थी।
"तुम ठीक हो?" आर्यन ने पूछा।
मृया ने मुस्कुराकर हाँ में सिर हिलाया। उसकी आवाज़ अब स्पष्ट थी, पर वह कम ही बोलती थी। शायद सदियों की खामोशी की आदत थी, या शायद शब्द अभी भी उसके लिए नए थे।
"चंद्रनगर," उसने धीरे से कहा, नाम को स्वाद लेते हुए। "मैं वहाँ पली-बढ़ी।"
"तुम्हें याद आ रहा है?" आर्यन ने उत्सुकता से पूछा।
"टुकड़े-टुकड़े में," मृया ने कहा। "एक कुँआ। एक आम का पेड़। और... एक लड़का।"
"मेरा परदादा का बेटा?" आर्यन ने पूछा।
मृया की आँखों में दर्द उभर आया। "हाँ। उसका नाम था... विजय।"
आर्यन ने अपनी स्मृति को खंगाला। "मेरे परदादा राजेंद्र वर्मा के तीन बेटे थे। सबसे छोटे का नाम विजय वर्मा था। पर वह बहुत कम उम्र में ही..."
"मर गया," मृया ने पूरा किया, उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मेरे मरने के एक हफ्ते बाद।"
ट्रेन एक सुरंग में दाखिल हुई, और अचानक अंधेरा छा गया। खिड़की में आर्यन की परछाई के पीछे, एक और परछाई दिखाई दी, काल की। सिर्फ एक पल के लिए, फिर गायब हो गई।
"वह हमें देख रहा है," मृया ने फुसफुसाया।
"हाँ," आर्यन ने कहा। "वह हमारी हर गलती का इंतजार कर रहा है।"
ट्रेन सुरंग से बाहर आई, और चंद्रनगर का पहला संकेत दिखाई दिया: "स्वागत है - ऐतिहासिक नगरी चंद्रनगर।"
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वर्मा हवेली शहर के बाहरी इलाके में थी, एक पहाड़ी की तलहटी में। टैक्सी से उतरकर जब आर्यन ने पहली बार उसे देखा, तो उसकी साँस अटक गई।
वह हवेली बिल्कुल वैसी ही थी जैसी उसे अपनी यादों और सपनों में दिखाई देती थी। तीन मंजिला, लाल ईंटों से बनी, मुगल और ब्रिटिश वास्तुकला का मिश्रण। पर अब वह जर्जर हो चुकी थी, खिड़कियाँ टूटी हुईं, बगीचा उजाड़, और मुख्य दरवाजे पर एक मोटा ताला लटका हुआ था।
"यहाँ," मृया ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खिंचाव थी। "मैं यहाँ रहती थी। सेविका के क्वार्टर में, पीछे की ओर।"
वह दरवाजे की ओर बढ़ी, और बिना रुके दरवाजे से होकर अंदर चली गई। आर्यन ने देखा कि ताला अपने आप खुल गया। मृया की उपस्थिति अभी भी कुछ चमत्कार कर सकती थी।
अंदर का दृश्य और भी उदास था। धूल के मोटे परत, टूटी हुई कुर्सियाँ, और सबसे ऊपर से टपकते पानी की आवाज़। पर मृया के लिए, यह सब जीवित था।
"यहाँ," उसने कहा, एक बड़े हॉल की ओर इशारा करते हुए। "यहाँ नृत्य होते थे। तुम्हारे परदादा... राजेंद्र बाबू... वह यहाँ बैठते थे।"
उसने एक कोने की ओर देखा, जहाँ अब सिर्फ एक टूटा हुआ सोफा पड़ा था। "और विजय... वह वहाँ खड़ा होता था। खिड़की के पास। मुझे देखता रहता था।"
"तुम उससे प्यार करती थीं?" आर्यन ने पूछा।
मृया ने हाँ में सिर हिलाया, आँखें नम थीं। "वह मुझसे प्यार करता था। पर उसके पिता... उन्होंने मना कर दिया। मैं निम्न जाति की थी। एक सेविका की बेटी।"
वह पीछे के दरवाज़े की ओर बढ़ी, जो रसोईघर की ओर जाता था। "और यहाँ... यहाँ हुआ था वह।"
रसोईघर अंधेरा और नम था। एक कोने में पुराना चूल्हा अभी भी खड़ा था।
"उस दिन मेरा जन्मदिन था," मृया ने कहा, उसकी आवाज़ अब लगभग फुसफुसाहट में थी। "विजय ने मुझे एक गुलाब दिया। लाल गुलाब। वह कहता था कि मेरे गाल गुलाब जैसे लाल हो जाते हैं जब मैं शर्माती हूँ।"
उसने एक टूटी हुई खिड़की की ओर देखा। "उसने वह गुलाब यहीं दिया था। और फिर... राजेंद्र बाबू आए। उनके हाथ में एक गिलास था। दूध, उन्होंने कहा। बर्थडे का तोहफा।"
आर्यन का दिल जोर से धड़क रहा था। "और तुमने पी लिया।"
"हाँ," मृया ने कहा, आँसू अब स्वतंत्र रूप से बह रहे थे। "मैंने पी लिया। वह मीठा था। बहुत मीठा। और फिर... दर्द। भयानक दर्द। मैं यहीं गिर गई।"
उसने फर्श की ओर देखा। आर्यन ने भी देखा, वहाँ अभी भी एक धब्बा था। भूरा, पुराना। शायद खून का, या शायद कुछ और का।
"विजय ने मुझे पाया," मृया ने कहा। "वह रो रहा था। चिल्ला रहा था। उसने अपने पिता से पूछा क्यों। और राजेंद्र बाबू ने कहा... 'तुम्हारी नस्ल को शुद्ध रखना मेरी जिम्मेदारी है।'"
आर्यन ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया। उसे घृणा महसूस हुई ,अपने खून से, अपने परिवार से।
"मैं मरी," मृया ने कहा। "और फिर... मैं उठी। पर अब मैं मैत्रेयी नहीं थी। मैं मृया थी। एक छाया। एक दूत। और मुझे एक आदेश मिला, सौ वर्ष तक आत्माएँ ले जाना। बिना याद के। बिना पहचान के।"
तभी, एक आवाज़ गूंजी। "और उन सौ वर्षों में, तुमने मेरी दादी की आत्मा ली थी।"
दोनों ने पलटकर देखा। दरवाज़े पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था, लाठी टेके हुए। उसकी उम्र अस्सी के आसपास होगी, और उसके चेहरे पर आर्यन से मिलती-जुलती रेखाएँ थीं।
"मैं हूँ देवेंद्र वर्मा," बूढ़े ने कहा। "राजेंद्र वर्मा के पोते। और तुम... तुम आर्यन हो न? मेरे भतीजे अनिल के बेटे?"
आर्यन ने हाँ में सिर हिलाया। "आप... आप यहाँ रहते हैं?"
"इसी गाँव में रहता हूँ," देवेंद्र ने कहा। "इस हवेली की देखभाल करता हूँ। पर आज पहली बार है कि ताला अपने आप खुला।"
उसकी नजर मृया पर पड़ी, और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। "और तुम... तुम वही हो न? वह लड़की जिसकी कहानी मेरी दादी ने सुनाई थी।"
मृया ने हाँ में सिर हिलाया।
देवेंद्र ने लाठी छोड़ दी, और धीरे-धीरे मृया के सामने घुटनों के बल बैठ गया। "मेरी दादी... विजय की पत्नी... वह हमेशा कहती थी कि इस घर पर एक शाप है। उसने मुझे तुम्हारी कहानी सुनाई थी। और कहा था कि एक दिन, तुम लौटोगी। माफी के लिए।"
आर्यन हैरान था। "आपको पता था?"
"हम सभी को पता था," देवेंद्र ने कहा, अब रोते हुए। "पर हम चुप रहे। शर्म के मारे। डर के मारे। हमारे परिवार ने एक बेकसूर लड़की की हत्या की थी। और उसके बाद से... कोई भी इस घर में सुखी नहीं रहा।"
उसने मृया के पैर छुए। "मैं माफी माँगता हूँ। मेरे परिवार की तरफ से। मेरे दादा की तरफ से। उसने जो किया, वह अमानवीय था।"
मृया ने बूढ़े आदमी को उठाया। "तुम्हारा कोई दोष नहीं। तुमने तो माफी माँगी है। और आर्यन ने भी।"
"पर यह काफी नहीं है," देवेंद्र ने कहा। "एक औपचारिक माफी चाहिए। पूरे परिवार की तरफ से। एक संस्कार।"
"संस्कार?" आर्यन ने पूछा।
"हाँ," देवेंद्र ने कहा। "कल रात। पूर्णिमा है। हम एक शांति संस्कार करेंगे। मैं सभी वर्मा परिवार के सदस्यों को बुलाऊँगा जो अभी भी इस इलाके में हैं। और हम औपचारिक रूप से मृया से माफी माँगेंगे।"
मृया की आँखों में आशा की एक नई चमक आ गई। "इससे मेरा शाप पूरी तरह टूट जाएगा?"
"शायद," देवेंद्र ने कहा। "पर एक और चीज़ चाहिए होगी। विजय की आत्मा की माफी।"
"विजय की?" आर्यन ने पूछा। "वह तो मर चुका है।"
"उसकी आत्मा अभी भी भटक रही है," देवेंद्र ने कहा। "मेरी दादी कहती थी कि वह इस हवेली में ही फँसा हुआ है। अपनी प्रेमिका की मृत्यु का दोषी खुद को मानता है।"
मृया ने एक हाथ अपने मुँह पर रख लिया। "वह यहाँ है?"
"हाँ," देवेंद्र ने कहा। "और अगर हमें असली शांति चाहिए, तो उसे भी मुक्त करना होगा।"
तभी, हवा में एक ठंडी लहर दौड़ गई। खिड़की से एक छाया गुजरी, और दूर से एक आवाज़ आई, एक युवक की आवाज़, दर्द से भरी हुई।
"मैत्रेयी... माफ कर दो..."
मृया ने आँखें बंद कर लीं। "वह है। विजय है।"
और आर्यन ने महसूस किया कि उनकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई थी। सच्चाई का केवल एक हिस्सा ही सामने आया था।
अब उन्हें एक और आत्मा को मुक्त करना था।
और सबसे बड़ी चुनौती तो अभी आनी थी, कल रात का संस्कार, जहाँ न सिर्फ मृया का भविष्य, बल्कि पूरे वर्मा परिवार का भाग्य दाँव पर लगा था।
और ऊपर से, काल और उसकी परिषद उन पर नजर रखे हुए थी, यह देखने के लिए कि क्या यह माफी वास्तव में इतनी शक्तिशाली है कि सदियों के शाप को तोड़ सके।