आजकल विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है। उसने चाँद पर बसने के रास्ते खोज लिए हैं। इंसान ने ऐसी मशीनें बना ली हैं जो पलक झपकते ही सारा काम कर देती हैं। लेकिन भारतीय पति के दिमाग को समझना आज भी दुनिया का सबसे कठिन काम बना हुआ है। इसी गंभीर समस्या को सुलझाने के लिए बाजार में एक नया चमत्कार आया है।
इसका नाम पति परमेश्वर ऐप रखा गया है। यह एप्लीकेशन उन पत्नियों के लिए बनाई गई है जो पति के बदलते मिजाज से परेशान रहती हैं। तकनीक के इस युग में अब पत्नी को अपना दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। बस अपने फोन में यह ऐप डाउनलोड कीजिए और अपने वैवाहिक जीवन को स्वर्ग बना लीजिए।
इस ऐप का विज्ञापन बड़ा ही लुभावना है। इसमें दावा किया गया है कि यह पति के चेहरे के भावों को पढ़ लेता है। अगर पति का चेहरा लाल है तो ऐप तुरंत बता देगा कि गुस्सा किस वजह से है। क्या वह ऑफिस की डाँट है या घर में बनी लौकी की सब्जी का असर है।
शहर के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में गजानन अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहते हैं। गजानन जी का मिजाज गर्मियों की दोपहर जैसा अनिश्चित है। कब लू चलने लगे और कब आंधी आ जाए कोई नहीं जानता। सुशीला बेचारी पूरे दिन इसी उलझन में रहती थी कि आज खाने में क्या बनेगा और कब उनकी डाँट पड़ेगी।
एक दिन सुशीला ने अपनी सहेली के कहने पर यह ऐप अपने मोबाइल में डाल लिया। ऐप शुरू होते ही उसने कुछ बुनियादी सवाल पूछे। क्या आपका पति बात बात पर चिढ़ जाता है। क्या उन्हें अपनी तारीफ सुनना पसंद है। सुशीला ने खुशी खुशी सभी सवालों के जवाब दे दिए। उसे लगा कि अब उसकी जिंदगी संवर जाएगी।
अगले दिन सुबह गजानन जी सोकर उठे। उनके माथे पर हल्की सी शिकन थी। सुशीला ने तुरंत अपना फोन उनके चेहरे के सामने किया। ऐप ने चेहरा स्कैन किया और एक संदेश भेजा। पतिदेव का मूड अभी मध्यम स्तर पर खराब है। उन्हें तुरंत अदरक वाली कड़क चाय की जरूरत है।
सुशीला तुरंत रसोई की तरफ भागी। उसने ऐसी चाय बनाई कि गजानन जी के चेहरे पर चमक आ गई। सुशीला को लगा कि यह तकनीक तो कमाल की है। उसने भगवान को धन्यवाद दिया कि अब उसे हर बात पर डाँट नहीं सुननी पड़ेगी। उसे लगा कि अब घर में शांति बनी रहेगी।
दोपहर में गजानन जी ऑफिस से लौटे। उनका चेहरा लटका हुआ था। सुशीला ने फिर से ऐप का सहारा लिया। ऐप ने बताया कि आज ऑफिस में बॉस ने उन्हें खरी खोटी सुनाई है। इस समय उनसे कोई भी सवाल पूछना खतरनाक हो सकता है। उन्हें चुपचाप ठंडा पानी और सिर दर्द की गोली दे दीजिए।
सुशीला ने वैसा ही किया जैसा मशीन ने कहा था। गजानन जी चुपचाप सो गए और कोई बवाल नहीं हुआ। सुशीला को लगा कि उसने पति को काबू करने का मंत्र पा लिया है। लेकिन वह यह भूल गई कि यह ऐप पति को नहीं बल्कि उसे काबू कर रहा था। वह धीरे धीरे मशीन की गुलाम बन रही थी।
शाम को गजानन जी उठे और सोफे पर बैठ गए। सुशीला ने ऐप खोला तो उसमें एक नया फीचर दिखा। इसका नाम था ईगो बूस्टर मोड। इस मोड में पत्नी को पति की झूठी तारीफ करनी होती है। ताकि पति को लगे कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर और बुद्धिमान इंसान है।
सुशीला ने बोलना शुरू किया। उसने कहा कि आप जैसा समझदार इंसान मैंने आज तक नहीं देखा। आपकी ऑफिस वाली समस्या तो बस आपकी काबिलियत से जलने वालों की साजिश है। गजानन जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्हें लगा कि सुशीला कितनी समझदार हो गई है।
लेकिन इस ऐप की असलियत कुछ और ही थी। यह दरअसल पुरुष प्रधान समाज का एक डिजिटल अवतार था। यह स्त्री को यह सिखा रहा था कि उसे अपनी इच्छाएं कैसे मारनी हैं। उसे पति की हर जायज और नाजायज बात को कैसे चुपचाप स्वीकार करना है। यह तकनीक के नाम पर गुलामी का नया तरीका था।
कुछ दिनों बाद सुशीला को महसूस हुआ कि वह एक रोबोट बन गई है। वह अब वही बोलती थी जो ऐप उसे बताता था। उसकी अपनी कोई राय नहीं बची थी। उसे कब हँसना है और कब चुप रहना है यह एक सॉफ्टवेयर तय कर रहा था। उसके व्यक्तित्व पर तकनीक का कब्जा हो गया था।
एक दिन गजानन जी बहुत गुस्से में घर आए। उन्होंने बिना बात के सुशीला पर चिल्लाना शुरू कर दिया। सुशीला ने तुरंत ऐप चेक किया। ऐप ने सुझाव दिया कि पति परमेश्वर हैं। वे जो भी कहें उसे बिना तर्क के मान लेना चाहिए। इस समय आपको उनके पैर दबाने चाहिए और माफी मांगनी चाहिए।
सुशीला को पहली बार बहुत गुस्सा आया। उसने सोचा कि गलती गजानन की है तो वह माफी क्यों मांगे। उसने ऐप की बात अनसुनी कर दी। गजानन जी और भी ज्यादा भड़क गए। उन्होंने कहा कि आजकल तुम्हारा ध्यान कहीं और ही रहता है। तुम अब पहले जैसी सेवाभावी पत्नी नहीं रही।
सुशीला ने मोबाइल उठाया और ऐप को अनइंस्टॉल करने का सोचा। तभी ऐप से एक नोटिफिकेशन आया। यदि आप इस ऐप को हटाती हैं तो आपके पति का गुस्सा बढ़ सकता है। इससे आपके वैवाहिक जीवन में दरार आ सकती है। यह एक तरह की डिजिटल धमकी थी जो उसे डरा रही थी।
समाज ने स्त्री को दबाने के लिए अब सिलिकॉन चिप का सहारा ले लिया है। पहले जो काम धर्म ग्रंथ करते थे अब वह मोबाइल ऐप कर रहा है। पति परमेश्वर की धारणा को अब सॉफ्टवेयर अपडेट मिल गया है।
सुशीला ने गौर किया कि इस ऐप में पत्नी के मूड का कोई विकल्प नहीं था। क्या पति के लिए कोई ऐसा ऐप नहीं बना जो पत्नी की थकान समझ सके। क्या ऐसा कोई सेंसर नहीं है जो यह बता सके कि रसोई में काम करते हुए सुशीला की कमर में दर्द है।
दरअसल यह समाज की वही पुरानी सड़ी गली सोच थी। जिसमें स्त्री का काम सिर्फ पुरुष की सेवा करना है। चाहे वह पुराने जमाने की अनपढ़ स्त्री हो या आज की पढ़ी लिखी कामकाजी महिला। तकनीक उसे बस नए तरीके से चुप रहना सिखा रही थी। यह स्त्री विमर्श का सबसे दुखद पहलू था।
गजानन जी को ऐप की आदत हो गई थी। वे चाहते थे कि सुशीला हमेशा उसी के हिसाब से चले। एक दिन ऐप ने सुशीला को निर्देश दिया कि आज पति को अपनी पसंद का खाना खिलाने के बजाय उनकी पसंद का बनाओ। भले ही तुम्हें वह पसंद न हो। सुशीला ने मोबाइल जमीन पर पटक दिया।
मोबाइल का शीशा टूट गया और ऐप हमेशा के लिए बंद हो गया। गजानन जी हैरान रह गए। उन्होंने पूछा कि तुमने यह क्या किया। सुशीला ने शांति से जवाब दिया कि अब मैं मशीन के हिसाब से नहीं जिऊंगी। मैं एक इंसान हूँ और मेरी अपनी भी कुछ भावनाएं और इच्छाएं हैं।
गजानन जी को लगा कि सुशीला बागी हो गई है। उन्होंने समाज और परंपरा का हवाला देना शुरू किया। उन्होंने कहा कि पति की खुशी में ही पत्नी का सुख होता है। सुशीला ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह सुख नहीं बल्कि एक तरफा समझौता है। अब से इस घर में बराबरी की बात होगी।
उस दिन के बाद से घर का माहौल बदल गया। सुशीला ने ऐप की बैसाखी छोड़ दी थी। वह अब गजानन जी की गलत बातों का विरोध करने लगी थी। शुरुआत में गजानन जी को बहुत बुरा लगा। उन्हें लगा कि उनका परमेश्वर वाला दर्जा छीना जा रहा है। वे अपनी पुरानी सत्ता खोने के डर से कांप रहे थे।
लेकिन धीरे धीरे उन्हें भी समझ आने लगा। उन्होंने महसूस किया कि सुशीला का अपना एक अस्तित्व है। वह कोई ऐप नहीं है जिसे वे जब चाहे अपने हिसाब से चला सकें। रिश्तों में सम्मान और समझदारी की जरूरत होती है न कि किसी गाइडेंस ऐप की। असल जिंदगी एल्गोरिदम से नहीं चलती।
यह कहानी उन सभी महिलाओं की है जो किसी न किसी रूप में इस अदृश्य ऐप को अपने दिमाग में डाउनलोड किए हुए हैं। समाज हर पल उन्हें बताता है कि पति के मूड के हिसाब से कैसे ढलना है। उन्हें सिखाया जाता है कि उनकी अपनी पसंद का कोई महत्व नहीं है।
हम चाँद पर पहुँच गए हैं पर हमारी सोच अब भी वहीं अटकी है। स्त्री को आज भी एक वस्तु की तरह देखा जाता है जिसका रिमोट कंट्रोल पुरुष के हाथ में होना चाहिए। तकनीक बस इस कंट्रोल को और मजबूत कर रही है।
पति परमेश्वर ऐप का विज्ञापन अब भी टीवी पर आता है। लेकिन सुशीला जैसी स्त्रियाँ अब उसे देखकर हँसती हैं। वे जान गई हैं कि असली आजादी किसी सॉफ्टवेयर में नहीं बल्कि खुद के स्वाभिमान में है। उन्होंने अब खुद को पहचानना शुरू कर दिया है। यह एक नई शुरुआत है।
गजानन जी ने भी अब अपनी आदतों में सुधार किया है। अब वे ऑफिस का गुस्सा घर पर नहीं निकालते। वे जानते हैं कि सुशीला अब कोई रोबोट नहीं है। अब उनके घर में संवाद होता है न कि केवल निर्देश दिए जाते हैं। रिश्तों की कड़वाहट धीरे धीरे कम होने लगी है।
समाज में अब भी ऐसे बहुत से गजानन हैं जो इस ऐप की तलाश में हैं। वे चाहते हैं कि कोई ऐसी जादुई मशीन मिल जाए जो उनकी पत्नी को उनकी दासी बना दे। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि गुलामी के रिश्ते कभी लंबे नहीं चलते। प्रेम और बराबरी ही सुख की चाबी है।
तकनीक का विकास तब सफल माना जाएगा जब वह इंसान को और भी ज्यादा मानवीय बनाए। अगर वह हमें पुरानी बेड़ियों में और भी कसकर जकड़ ले तो वह विकास नहीं बल्कि पतन है। पति परमेश्वर ऐप इसी पतन का एक उदाहरण था जिसे सुशीला ने समय रहते पहचान लिया।
स्त्री विमर्श केवल किताबों और भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे रोजमर्रा की जिंदगी और हमारे व्यवहार में उतरना होगा। जब तक हम स्त्री को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे तब तक समाज की तरक्की अधूरी रहेगी। असली बदलाव घर की चौखट से शुरू होता है।
इस देश में पति परमेश्वर है और पत्नी उसकी भक्त। लेकिन अब भक्त ने भी अपनी आँखें खोल ली हैं। उसे समझ आ गया है कि भक्ति और गुलामी के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है।
सुशीला ने उस रेखा को पहचान लिया और पार कर लिया। अब वह अपने जीवन की एप्लीकेशन खुद चलाती है। उसे किसी बाहरी ऐप की जरूरत नहीं है। उसका आत्मविश्वास ही अब उसका सबसे बड़ा सेंसर है जो उसे सही और गलत की पहचान कराता है।
गजानन जी भी अब सुशीला के साथ किचन में हाथ बंटाते हैं। उन्हें अब ऐप की जरूरत नहीं पड़ती यह जानने के लिए कि सुशीला थक गई है। वे उसकी आंखों में थकान देख लेते हैं। यही वह मानवीय तकनीक है जिसकी जरूरत आज हर घर को है।
यह कहानी बस एक चेतावनी है। तकनीक के जाल में फँसने से पहले अपनी इंसानियत को पहचानिए। मशीनों को अपना मालिक मत बनाइए। खासकर उन मशीनों को जो आपको अपनी जड़ों और अधिकारों से दूर ले जाती हों। जीवन का सार आपसी सम्मान में छिपा है।
पति परमेश्वर ऐप जैसे विचार हमारे पिछड़ेपन की निशानी हैं। इन्हें जितनी जल्दी डिलीट कर दिया जाए उतना ही बेहतर होगा। सुशीला ने यह कर दिखाया है। अब बारी समाज की है कि वह अपनी सोच को अपडेट करे। ताकि आने वाली पीढ़ियों को ऐसे किसी ऐप की जरूरत न पड़े।
इस तरह सुशीला और गजानन का जीवन अब एक नई पटरी पर लौट आया है। जहाँ कोई परमेश्वर नहीं है और कोई भक्त नहीं है। बस दो इंसान हैं जो एक साथ मिलकर जिंदगी का सफर तय कर रहे हैं। बिना किसी डिजिटल गाइडेंस के और बिना किसी डर के।
समाज की सड़ी गली मान्यताओं पर सुशीला की यह जीत हर उस स्त्री की जीत है जो अपनी पहचान की तलाश में है। व्यंग्य का उद्देश्य भी यही है कि वह हमें अपनी कमियों को दिखा सके। पति परमेश्वर ऐप हमारे समय का सबसे बड़ा और कड़वा व्यंग्य है।
सुशीला ने अब अपना पुराना टूटा हुआ मोबाइल फेंक दिया है। उसने नया फोन लिया है जिसमें कोई फालतू ऐप नहीं है। वह अब अपनी मर्जी की मालिक है। गजानन जी भी उसके इस नए अवतार के साथ खुश रहना सीख गए हैं। यही असल स्त्री विमर्श है।
अंत में यही संदेश है कि तकनीक का प्रयोग जीवन को सरल बनाने के लिए होना चाहिए। किसी को दबाने या नियंत्रित करने के लिए नहीं। पति और पत्नी के बीच का रिश्ता विश्वास और बराबरी का होना चाहिए। तभी वह रिश्ता सच में सुखदायक और सफल हो सकता है।
सुशीला की रसोई से अब फिर से वही खुशबू आती है जो उसके दिल को भी पसंद है। गजानन जी भी अब खाने की तारीफ दिल से करते हैं। बिना किसी ईगो बूस्टर मोड के। जिंदगी अब एप्लीकेशन के बिना ज्यादा खूबसूरत और असली लगने लगी है।
यह कहानी यहाँ समाप्त होती है पर असल संघर्ष जारी है। समाज में मौजूद मानसिक ऐप को हटाना अभी बाकी है। उम्मीद है कि सुशीला की तरह हर स्त्री अपने जीवन का कंट्रोल अपने हाथ में लेगी। और हर पुरुष बराबरी के महत्व को समझेगा।
इंसान ने रोबोट बना लिए हैं पर उसे खुद रोबोट बनने से बचना होगा। अपनी संवेदनाओं और विवेक को जिंदा रखना ही आज की सबसे बड़ी चुनौती है। पति परमेश्वर ऐप जैसे विचार भविष्य में केवल एक बुरे मजाक की तरह याद किए जाएंगे।
सुशीला और गजानन अब हर शाम साथ बैठते हैं और बिना किसी ऐप के एक दूसरे की बातें सुनते हैं। उनकी मुस्कान अब असली है और उनका घर अब सच में एक घर बन गया है। जहाँ किसी की सत्ता नहीं बल्कि सबका प्यार और सम्मान बसता है।