Let's go somewhere far away...! - 5 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 5

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चलो दूर कहीं..! - 5

चलो दूर कहीं... 5

उस प्राणी पर ही प्रतीक्षा का अस्तित्व टिका था,वही इस अंधेरे गुफा से निकलने का एक मात्र सहारा था और उसके एकाएक गायब हो जाने से वह व्याकुल थी, उसने पुरे गुफा को टटोल डाला..चिल्ला चिल्ला कर गला बैठा ली लेकिन कोई फायदा न हुआ..शायद वो यहां था ही नहीं और था भी तो जानबूझकर प्रतीक्षा से छुप रहा था.. वह इस निशब्द सन्नाटे में जरा सी आहट पाती तो उस दिशा में भागती और बैचैन नजरों से इधर उधर देखती.. जब काफी प्रयास के बाद भी वह नहीं मिला तो मायुस होकर वह घुटनों में अपने मुंह को छुपाकर सुबकने लगी.. अब उसे एहसास हो रहा था कि कोई जानवर उसे अपना निवाला बनाए या न बनाए वो खूद भूख प्यास से मर जाएगी.. हे ईश्वर कृपा करो..कोई रास्ता दिखाओ प्रभु..?

वो इस गुफा में कितने दिनों से थी और इस बंद गुफा में  कैसे आई..?वो विचित्र प्राणी कौन था..? उसे कुछ पता न था। उसे शक था कि,'कहीं उसी ने यहां नहीं लाया..? ' उसके मन मेंं अनेकों सवाल उमड़ घुमड़ रहे थे लेकिन किसी का उत्तर उसे मालूम न था..! आखिर वो प्राणी गया तो गया कहां..? वह मुझे इस हाल में छोड़कर नहीं भाग सकता..? वो कोई साधारण प्राणी नहीं है..उसमें कुछ अद्वितीय गुण है वर्ना उसके चाटते ही मेरा  घाव कैसे ठीक हो जाता..?

वह सोच ही रही थी कि उसे लगा किसी ने उसे जाल में जकड़ लिया है और ऊपर की ओर खींच रहा है, उसने भयभीत स्वर में कहा," मुझे ये क्या हो रहा है..? कौन है.. और ये जाल में फंसाकर क्यों खींच रहे हो..? छोड़ो मुझे..!" 

वो चीखती चिल्लाती रही लेकिन उसके कान में जूं तक न रेंगा.. अंततः वह बेहोश हो गई और उसके बाद उसके साथ क्या हुआ उसे कुछ पता नहीं! 

इधर प्रतीक्षा के घर में उसे मरा मानकर उसका श्राद्ध कर्म हो रहा था। घर में मेहमानों का जमावड़ा लगा था, आस पड़ोस और उसके शुभचिंतकों के साथ साथ प्रतीक्षा के सभी दोस्त जुटे थे। सभी के चेहरे पर मातम पसरा था। आंगन में मृत आत्मा की शांति हेतु पुरोहित के द्वारा पिंडदान कराया जा रहा था। उसके सभी दोस्त आपस में हंसी मज़ाक कर रहे थे, उन्हें कोई ग़म न था ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वे यहां मनोरंजन के लिए आए हैं।

कमलनाथ के द्वारा पुरोहित के द्वारा बताए गए विधि अनुसार एक एक कर सभी पिंडों में उल्टे हाथ से जल,दुध एवं अन्य सामग्री डाला जा रहा था और प्रतीक्षा सामने खड़ी देख रही थी, वह चिल्ला रही कि मैं जिंदा हूं.. मेरा पिंड दान मत करो लेकिन जैसे वहां न कोई उसकी बातों को सुन पा रहा था और न ही देख पा रहा था.. और जब कुश के द्वारा पिंड को एक एक कर काटा जाने लगा तो उसे लगा जैसे उसके देह को तीन  भागों में काट कर इस नश्वर संसार से मुक्त किया जा रहा है.. और वह इस जन्म के तीनों ऋणों से मुक्त हो रही है। 

पहला ऋण देव ऋण से मुक्ति जैसे इस प्रकृति से संपर्क टूट रहा है.. पंचतत्व से बना शरीर अग्नि,वायु, पृथ्वी,जल और आकाश से संपर्क टूट रहा है।
दुसरा ऋण ऋषि ऋण से मुक्ति जैसे ज्ञान और विवेक धुमिल होता जा रहा है।
तीसरा ऋण पितृ ऋण से मुक्ति का है जैसे परिवार, परंपरा और सभी रिश्ते नातों से मुक्त हो रही है।

अंतिम पिंड कटते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसे उस अंधेरे गुफा में ऊपर से पटक दिया हो..वह पसीने से तरबतर आंखें फाड़े हांफते हुए इधर-उधर देखकर उस भयानक दृश्य  को ढूंढ रही थी.. लेकिन घुप्प अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वे लोग कौन थे और मेरा पिंड दान क्यों कर रहे थे..? ये कोई सपना था या हकीकत..?

वह उस सपने के बारे में सोच ही रही थी कि उस अंधेरे गुफा की दीवारें नीली रोशनी से जगमगा उठी.. और ऊपर के तरफ से एक बेहद चमकिला रोशनी नीचे की ओर आ रहा था जैसे कोई शक्तिशाली किरणें उन पत्थर के दीवारों को भेदकर नीचे की ओर आ रही हो.. प्रतीक्षा अभी कुछ समझ पाती उससे पहले ही वह तेज रोशनी नीचे की ओर उतरती गई और प्रतीक्षा के सामने एक जलता हुआ प्रकाश पूंज खड़ा था..! डर और दहशत से सिकुड़ी हुई प्रतीक्षा ने जब मिटमिटाते आंखों से उस प्रकाश पुंज से बन रहे आकृति को देखी तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई..!

यह एक विशालकाय जीव था, इसका पीछे का पैर ऊंट जैसा बड़ा था और ये इसी पैर पर सीधा खड़ा था, इसका हाथ लंबा था और अंगुलियों के स्थान पर अंगुठे को छोड़कर चार छोटे छोटे गोले बने थे। कमर से मुंडी तक एक स्प्रिंग की आकृति दिखाई दे रही थी यानी आदमी के पेट और छाती का हिस्सा नहीं था। उसका चेहरा अजीब तरह से सपाट था.. जैसे चिकने पत्थर पर काई जमीं हो..! चेहरे पर न नाक का उभार था और न ही कानों का कोई निशान..मानो जैसे सूंघने और सुनने की इन्द्रियों की उसे कोई जरूरत ही न हो..! चेहरे के ऊपरी हिस्से में दो गोल गोल घुमती हुई आंखें थीं... ये आंखें स्थिर नहीं थी, उनमें एक घूर्णनशील प्रकाश था, जो भौतिक वस्तु को ही नहीं आत्मा के आर पार देखने में सक्षम थी। उसका मुंह चेहरे के निचले हिस्सा में था जिससे वह एक विचित्र प्रकार का आवाज का कंपन कर रहा था। 

कुल मिलाकर प्रतीक्षा को ये समझ आ गया था कि ये विचित्र प्राणी संवेदनशील है और वह उससे कुछ कहना चाहता है लेकिन न वह उसकी भाषा समझ पा रही है और न वो इसकी बात को समझ रहा है...वह धीरे-धीरे प्रतीक्षा के समीप बैठा तो उसकी आंखें से निकलती रोशनी जैसे ही प्रतीक्षा के आंखों से टकराई उसे प्रतीत हुआ जैसे उसके शरीर से कोई पदार्थ निकल कर उसमें समा रही है.. और वो निढाल बैठी बस उसे निहारती रही...! और थोड़ी ही देर बाद उस गुफा में एक भारी आवाज गूंजी,"हाय.. प्रतीक्षा.. मैं अनाह..!

उस आवाज से प्रतीक्षा ऐसे चौंकीं जैसे कोई भूत देख ली हो.. उसने इधर उधर देखते हुए व्याकुल स्वर में बोली," कौन हो तुम.. और तुम मुझे कैसे जानते हो..?

"मैंने बताया तो मैं अनाह हूं..और तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं.. क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगी...?" 

                                                  क्रमशः...