चलो दूर कहीं... 4
एक पल के लिए प्रतीक्षा को उस विचित्र जीव को देखकर ऐसा लगा मानो वह कोई दैत्य हो..न कभी उसका किसी दैत्य से सामना हुआ था और न ही इस प्रकार के किसी जीव की स्मृति थी, फिर भी वह अपने अवचेतन के स्मृति से अनुमान कर रही थी । उसके माथे से निकलते तेज नारंगी रोशनी के कारण उसका आंख चौंधिया रहा था जिससे वह उसका चेहरा साफ साफ देख नहीं पा रही थी। लेकिन उसका डील डौल बड़ा अजीब था...लंबे लंबे ऊंट जैसे पीछे के पैर थे, और जानवर के जैसे आगे के दो पैर पर वह खड़ा था..जब वह इधर-उधर अपने मुंडी को घुमाता तो माथे से निकल रहा प्रकाश पुंज भी टार्च की तरह इधर-उधर घूम रहा था।
प्रतीक्षा नीचे बैठी हुई डर से थरथर कांप रही थी, और जैसे ही उस तेज प्रकाश से उसके आंखों का संपर्क टूटा तो उसके चेहरे की झलक दिखाई दिया..उसका चेहरा सपाट था, दो छेद में गोल गोल आंखें माथे पर थी..और दोनों आंखों के बीच एक तीसरे नेत्र से ये तीव्र नारंगी रोशनी निकल रही थी। नाक कान का पता नहीं लेकिन मुंह जानवर जैसा नीचे की ओर प्रतीत हो रहा था। बदन पर न कोई वस्त्र था और न ही कोई आवरण..! उसके चेतन और अवचेतन स्मृति में ऐसे विचित्र जीव का कोई स्मरण नहीं था।
उसे समझ आ गया था कि अब मौत निश्चित है..न इस गुफा से बाहर जाने का कोई रास्ता है,न सामने साक्षात खड़े मौत से बचने का कोई उपाय..?और न ये राक्षस मुझे बख्स़ने वाला है..तो क्यों न संघर्ष करके ही मरुं ..? उसके मन से मौत का भय दूर होते ही उसकी थरथराहट थम गईं, घबराहट जैसे छू-मंतर हो गया, उसने मन ही मन उससे मुकाबला करने का दृढ़ निश्चय किया और उस पर नजरें टिकाए सधे कदमों से धीरे-धीरे उसके ओर बढ़ी.. जैसे ही वह उसके करीब पहुंचती वह छिटककर दूर चला जाता.. उसके व्यवहार से प्रतीक्षा को विश्वास हो चला था कि ये मुझसे डर रहा है और इसलिए दूर भाग रहा है। अगर ये आक्रामक होता तो अबतक मुझपर हमला कर दिया होता..! प्रतीक्षा जब उसके करीब जाने और उसे पकड़ने में नाकाम रही तो रोते हुए बोली, " रुको.. मैं तुम्हें कोई हानी नहीं पहुंचाऊंगी.. मैं सिर्फ तुमसे दोस्ती करना चाहती हूं..!"
वो प्रतीक्षा के बातों को कितना समझा ये कहना मुश्किल है शायद उसके हाथ जोड़ने, माफ़ी मांगने और रोते, गिड़गिड़ाते देखकर उसे कुछ समझ आया हो.. तेज नारंगी रोशनी धीरे-धीरे कम होते होते बुझ गया..! रोशनी बुझते ही फिर पहले के तरह वहां घुप्प अंधेरा छा गया.. उस घुप्प अंधेरे में कुछ ही पल बीता था कि प्रतीक्षा को एहसास हुआ कि कोई उसका हाथ पकड़ रहा है.. वो हाथ बर्फ के समान ठंडा था। उस खुरदरे हथेली के स्पर्श से उसे समझ आ गया था कि ये वही है इसलिए वह जानबूझकर शांत रही और उसके अगले स्टेप का इंतजार कर ही रही थी कि उसे लगा जैसे वह उसे अपने बाहों में समेट रहा है...!
प्रतीक्षा ने कसमसाते हुए कहा, "छोड़ो ये क्या कर रहे हो..? मुझे पता है तुम बहुत सुंदर हो और मुझे कोई हानी नहीं पहुंचाओगे.. छोड़ो मुझे.. छोड़ो..! " कहते कहते वह अपने हाथों से उसके बदन को टटोल रही थी कि उसका बदन पुरा ठंडा था और लोहे के समान मजबूत प्रतीत हो रहा था, चेहरा पर हाथ गया तो सपाट चेहरे में कोई क्रीम जैसा चिपचिपा पदार्थ लगा था, उसके बदन से अनानास के जैसा गंध निकल रहा था...ये गंध बहुत खुशबूदार था और मन को प्रफुल्लित कर रहा था। इधर उधर टटोलते टटोलते अनायास उसके गले में बंधा लाकेट उसके हाथ आया तो वह उस लाकेट को खींचना चाही लेकिन खींच न सकी.. जैसे ये लॉकेट किसी जंजीर के सहारे उसके गले से बंधी थी...!परंतु इसका परिणाम ये हुआ कि उस लाकेट को खींचने से उस घुप्प अंधेरे गुफा में ऊपर के तरफ से प्रकाश की किरणें प्रवेश करने लगी थी... प्रतीक्षा के लिए ये किसी जादू से कम न था, उसे अब यहां से बाहर निकलने का सुराग हाथ लग गया था। लेकिन गुफा के जिस ऊपरी भाग से प्रकाश की किरणें अंदर आ रही थी वहां तक बिना किसी सहायता के पहुंचना नामुमकिन था।
वह उसे पकड़ा हुआ था और उसके बदन को ऐसे छू रहा था जैसे कुछ अनुमान कर रहा हो.. समझ रहा हो..!प्रतीक्षा सिर्फ उसे घूर रही थी और उसके सपाट चेहरे के दो छेद से कंचा के समान गोल गोल आंखें 360° घुम रही थी, उसके लिए ये अजूबा था.. वह सोच रही थी ऐसा कैसे हो सकता है? पृथ्वी पर ऐसा कोई जीव नहीं है जिसकी आंखें ऐसे चारों ओर घुमती हो.. कहीं ये कोई भूत तो नहीं..?
भूत का ख्याल आते ही वह उससे हटने की कोशिश की तो वह उसे और कसकर पकड़ना चाहा तो उसका पंजे का नाखून उसके नाजुक मुलायम और गोरे बदन के चमड़ी में धंस गया... नाखून धंसते ही वो दर्द से बिलबिला उठी और खून की धारा फूट पड़ी... उसने बहते खून को बड़े ध्यान से देखा फिर अचानक बहते खून के पास अपना मुंह लाया और जीभ से चाटकर खून पीने लगा.. उसका जीभ से चाटना इतना सुखद था कि वो दर्द भूल गई..लगा जैसे कोई बर्फ से सेंक रहा है..वह आंखें बंद किए इन सुखद पलों का आनंद लेती रही और देखते ही देखते उसका जलन समाप्त हो गया तो वह आंखें खोली और जहां से खून बह रहा था उस स्थान को देखी तो देखती रह गई.. वहां घाव का नामोनिशान न था।
फिर क्या था वह एक एक कर पुराने घावों में उसका नाखून चुभाती रही और वो चाटकर घाव को ठीक करता रहा.. अब प्रतीक्षा को उससे डर नहीं लग रहा था, उसे समझ आ गया था कि ये भी मेरा साथ चाहता है.. लेकिन समस्या ये थी कि वो न कुछ बोल पा रहा था और न ही प्रतीक्षा की बात को समझ रहा था.. लेकिन इस विरान और नैराश्य परिस्थिति में एक वहीं सहारा था और धीरे-धीरे अब उसका साथ भा रहा था। ऊपर के छेद से जबतक गुफा के अंदर प्रकाश आता रहा वह प्रतीक्षा से चिपका बैठा रहा.. और जैसे ही प्रकाश का आना बंद हुआ वह गधे की सिंग की तरह कहां गायब हुआ कुछ पता ही चला.. प्रतीक्षा उस अंधेरे गुफा में अपने एकमात्र सहारा को ढूंढ़ती रही..
क्रमशः...