Shondhokata - The Headless Ghost in Hindi Horror Stories by Vedant Kana books and stories PDF | Shondhokata - The Headless Ghost

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Shondhokata - The Headless Ghost

रात का वह पहर था जब हवा भी जैसे सांस रोककर खड़ी हो जाती है। पुराने रेल की पटरियों के पास बसे उस सुनसान गांव में लोग सूरज ढलते ही अपने दरवाजे बंद कर लेते थे। कहते थे कि आधी रात के बाद यहां कोई चलता है। कोई ऐसा जो इंसान नहीं है। और अगर किसी ने उसे देख लिया तो वह सुबह तक जिंदा नहीं बचता।

मैं उस गांव में पहली बार गया था। मेरे दादा का पुराना घर वहीं था और उनकी मौत के बाद मुझे कुछ कागजात लेने वहां जाना पड़ा। गांव वालों ने मुझे चेतावनी दी थी कि रात होते ही बाहर मत निकलना। खासकर रेलवे लाइन की तरफ तो बिल्कुल नहीं। मैंने उनकी बात पर हंस दिया। मुझे लगा यह सब पुराने जमाने की बेकार की कहानियां हैं।

लेकिन उस रात नींद जैसे मुझसे रूठ गई थी। बाहर से आती ठंडी हवा और दूर कहीं लोहे के रगड़ने की धीमी आवाज मुझे बेचैन कर रही थी। आखिरकार मैं उठकर बाहर निकल आया। आसमान में चांद अधूरा था और उसकी हल्की रोशनी में रेल की पटरियां किसी काले सांप की तरह चमक रही थीं।

मैं धीरे धीरे उन पटरियों की तरफ बढ़ने लगा। हर कदम के साथ वह अजीब सी आवाज और साफ होती जा रही थी। जैसे कोई भारी चीज घसीटते हुए चल रहा हो। मेरा दिल तेज धड़कने लगा लेकिन जिज्ञासा मुझे आगे खींच रही थी।

तभी मैंने उसे देखा।

एक लंबा काला साया पटरियों के बीच खड़ा था। उसका शरीर इंसान जैसा था लेकिन उसकी गर्दन के ऊपर कुछ नहीं था। सिर गायब था। उसके हाथ में कुछ था जो वह अपने सामने पकड़े हुए था। मैं ठिठक गया। मेरी सांस जैसे रुक गई।

धीरे धीरे वह साया मेरी तरफ मुड़ा। उसके हाथ में जो था वह एक कटा हुआ सिर था। उस सिर की आंखें खुली थीं और उनमें हरी चमक थी। और वह सिर मुझे घूर रहा था। जैसे वह देख सकता हो। जैसे वह जिंदा हो।

मेरे पैरों ने जवाब दे दिया। मैं भागना चाहता था लेकिन शरीर हिल नहीं रहा था। तभी वह साया धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगा। उसके कदमों की कोई आवाज नहीं थी। बस उसके शरीर से टपकती किसी गीली चीज की बूंदें पटरियों पर गिर रही थीं।

अचानक वह कटा हुआ सिर हंसा। उसकी हंसी इतनी डरावनी थी कि मेरी रूह कांप उठी। उसने फुसफुसाते हुए कहा, तुमने हमें देख लिया है।

मैंने पूरी ताकत लगाकर खुद को पीछे खींचा और भागने लगा। पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हुई। बस दौड़ता गया। मुझे लग रहा था कि वह मेरे पीछे ही है।

जब मैं अपने दादा के घर पहुंचा तो दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने जोर जोर से खटखटाया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। तभी पीछे से वही ठंडी हवा फिर से चली। मैंने धीरे से पलटकर देखा।

वह साया मेरे बिलकुल पीछे खड़ा था।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और वह कटा हुआ सिर मेरी तरफ कर दिया। उसकी आंखें मेरी आंखों में घुसती चली गईं। अचानक मुझे लगा कि मेरा सिर भारी हो रहा है। जैसे कोई उसे खींच रहा हो।

मैं चीखना चाहता था लेकिन आवाज नहीं निकली। फिर सब अंधेरा हो गया।

सुबह गांव वालों ने मुझे रेलवे लाइन के पास पाया। मेरा शरीर पटरियों के बीच पड़ा था। लेकिन मेरा सिर गायब था।

कहते हैं उस दिन के बाद से उस गांव में दो साये घूमते हैं। एक बिना सिर का और दूसरा जिसके हाथ में दो सिर होते हैं।

और अगर कभी रात के सन्नाटे में आपको पटरियों के पास कोई खड़ा दिखे और उसके हाथ में एक सिर हो जो आपको देख रहा हो, तो समझ लेना कि वह अकेला नहीं है।

क्योंकि शायद अगला सिर उसी के हाथ में आपका हो।