रात का वह समय था जब नदी के किनारे की हवा भी डर से थम जाती थी। गाँव के बूढ़े कहते थे कि आधी रात के बाद उस घाट पर कदम रखना मौत को बुलाने जैसा है, लेकिन लालच इंसान से सब कुछ करवा देता है। उसी लालच में फँसकर हरि नाव लेकर उस सुनसान घाट पर पहुँच गया, जहाँ से कई मछुआरे कभी लौटकर नहीं आए थे।
घाट के पास पहुँचते ही उसे एक अजीब सन्नाटा महसूस हुआ। पानी बिल्कुल स्थिर था, जैसे उसमें कोई जान ही न हो। दूर किनारे पर टूटी सीढ़ियों के पास कुछ दीपक जल रहे थे, जिनकी लौ हवा के बिना भी काँप रही थी।
हरि ने नाव बाँधी और जाल उठाकर धीरे धीरे पानी में उतरा। जैसे ही उसने जाल फेंका, उसे लगा कि पानी के भीतर कुछ हलचल हुई है। उसने सोचा शायद बड़ी मछलियाँ होंगी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, क्योंकि इतनी मछलियाँ उसे पहले कभी नहीं मिली थीं।
कुछ ही देर में जाल इतना भारी हो गया कि हरि उसे खींच नहीं पा रहा था। उसने पूरी ताकत लगाई और जाल किनारे तक खींच लाया। लेकिन जाल के भीतर मछलियाँ नहीं थीं। उसमें सिर्फ हड्डियाँ थीं, सड़ी हुई मछलियों की हड्डियाँ। हरि का दिल जोर से धड़कने लगा। तभी पीछे से पानी में कुछ गिरने की आवाज आई।
हरि ने धीरे से मुड़कर देखा। नदी के बीचों बीच कुछ खड़ा था। वह इंसान जैसा था, लेकिन उसका शरीर बहुत पतला और काला था। उसकी आँखें हरे रंग की चमक रही थीं, जैसे अंधेरे में दो अंगारे जल रहे हों। उसके लंबे बाल पानी से भीगे हुए थे और उसके हाथ में एक मछली का कंकाल था, जिसे वह धीरे धीरे चबा रहा था। हरि के गले से आवाज ही नहीं निकली।
वह आकृति धीरे धीरे पानी से बाहर आने लगी। उसके कदम जमीन को छू नहीं रहे थे, जैसे वह हवा में तैर रही हो। हरि पीछे हटने लगा, लेकिन उसके पैर काँप रहे थे.
तभी उस प्राणी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और एक भयानक हँसी निकाली, जो पूरे घाट में गूंज उठी। हरि ने भागने की कोशिश की, लेकिन उसका पैर किसी चीज में उलझ गया और वह गिर पड़ा।
जमीन पर गिरते ही उसने देखा कि उसके पैरों के पास एक पुराना कंकाल पड़ा था, जिसके हाथ में जाल था। हरि को अचानक एहसास हुआ कि यह किसी मछुआरे का कंकाल है। तभी पीछे से ठंडी उँगलियों ने उसके कंधे को छू लिया। हरि ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं।
सुबह जब गाँव के लोग घाट पर पहुँचे, तो उन्हें हरि की नाव तो मिली, लेकिन हरि कहीं नहीं था। बस किनारे पर एक जाल पड़ा था, जिसमें कुछ ताजी मछलियाँ फँसी थीं और उनके बीच में एक इंसानी हाथ की हड्डी भी थी।
गाँव के बूढ़े ने जाल को देखते ही कहा कि माछो भूत फिर जाग गया है। वह उन लोगों को नहीं छोड़ता जो लालच में आकर उसकी मछलियाँ छीनने की कोशिश करते हैं। लेकिन असली डर तब शुरू हुआ जब उसी रात गाँव के दूसरे मछुआरे ने अपने घर के बाहर वही जाल देखा, जो हरि का था। और जाल के पास गीली मिट्टी पर दो अजीब पैरों के निशान थे, जो सीधे उसके दरवाजे तक जाते थे।
दरवाजे के पीछे से पानी टपकने की आवाज आ रही थी। दरवाजे के पीछे से पानी टपकने की आवाज और तेज हो गई। मछुआरे रामू की साँसें रुक सी गईं। उसने काँपते हाथों से दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया।
दरवाजा चरमराता हुआ खुला और भीतर से ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया। मिट्टी की फर्श पर गीले पैरों के निशान साफ दिख रहे थे, जो कमरे के अंदर तक जा रहे थे। रामू ने धीरे से भीतर कदम रखा। उसका दिल इतना जोर से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी।
कमरे के कोने में रखा उसका पुराना जाल भीग चुका था, जैसे अभी अभी नदी से निकाला गया हो। तभी उसे महसूस हुआ कि कमरे में वह अकेला नहीं है।अचानक पीछे से पानी टपकने की आवाज उसके बिल्कुल पास आ गई। रामू ने झटके से मुड़कर देखा। वही काला, पतला शरीर उसके सामने खड़ा था। उसकी हरी चमकती आँखें रामू के भीतर तक घुसती जा रही थीं। उसके बालों से पानी टपक रहा था और उसके हाथ में आधी खाई हुई मछली थी।
रामू डर के मारे पीछे हटने लगा। उसने हिम्मत करके पूछा, तुम कौन हो। लेकिन जवाब में बस एक डरावनी हँसी सुनाई दी। वह प्राणी धीरे धीरे रामू के और करीब आने लगा। तभी अचानक उसकी आवाज बदल गई। वह भारी और टूटी हुई आवाज में बोला, मछली मेरी है... जो लेगा, वो रहेगा नहीं।
रामू ने दरवाजे की तरफ भागने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धँस गए थे। तभी उसने देखा कि उस प्राणी का चेहरा बदलने लगा है। उसकी आँखों की चमक और तेज हो गई और उसका चेहरा किसी पहचान वाले जैसा बनने लगा। कुछ ही पलों में रामू की आँखें फटी रह गईं। वह चेहरा हरि का था।
रामू के मुँह से चीख निकल गई। हरि, जो कल तक उसका साथी था, अब उस माछो भूत का हिस्सा बन चुका था। उसका शरीर आधा इंसान और आधा किसी भयानक चीज में बदल गया था। उसने हाथ बढ़ाकर रामू की तरफ इशारा किया, जैसे उसे अपने साथ बुला रहा हो।
अगली सुबह गाँव के लोग फिर उसी घाट पर इकट्ठा हुए। इस बार रामू भी गायब था। उसकी झोपड़ी के अंदर सिर्फ पानी भरा था और दीवारों पर गीले हाथों के निशान बने थे। गाँव के बूढ़े ने भारी आवाज में कहा, अब वो अकेला नहीं रहा। जो भी उसकी मछलियों को छुएगा, वो भी उसका बन जाएगा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ दिनों बाद, गाँव के एक बच्चे ने खेलते खेलते नदी के किनारे एक अजीब चीज देखी। वह एक छोटा सा जाल था, जिसमें ताजी मछलियाँ फँसी थीं। बच्चे ने खुश होकर जाल उठाया और घर की ओर भागा।
जैसे ही उसने जाल को दरवाजे के अंदर रखा, उसके पीछे गीले पैरों के निशान बनने लगे। उसकी माँ ने मुड़कर देखा तो दरवाजे पर तीन परछाइयाँ खड़ी थीं। और उन तीनों की आँखें हरे रंग में चमक रही थीं। उस रात के बाद से गाँव में कोई भी नदी के पास नहीं गया।
लेकिन आज भी, जब आधी रात होती है और नदी के किनारे हवा चलती है, तो पानी के बीच से किसी के हँसने की आवाज सुनाई देती है। और कभी कभी, किनारे पर एक नया जाल मिल जाता है, जिसमें ताजी मछलियाँ होती हैं।
जैसे कोई इंतजार कर रहा हो कि अगला शिकार खुद चलकर उसके पास आए।