Mera Pyar - 15 in Hindi Love Stories by mamta books and stories PDF | मेरा प्यार - 15

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मेरा प्यार - 15

​​एपिसोड 15: जमीर की कीमत और ज़ारा का न्याय
​अस्पताल के उस गलियारे में एक अजीब सा तनाव फैला हुआ था। नर्सें तेज़ी से ज़ोया के कमरे की ओर जा रही थीं। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर निकले, उनके चेहरे पर थोड़ी राहत थी।
​"खून चढ़ना शुरू हो गया है और शरीर ने उसे स्वीकार (accept) कर लिया है। ज़ोया की नब्ज़ अब पहले से बेहतर है," डॉक्टर ने कहा। "लेकिन, वह पूरी तरह खतरे से बाहर है या नहीं, यह तभी पता चलेगा जब उसे होश आएगा। हमें अगले कुछ घंटों का इंतज़ार करना होगा।"
​अज़ीम ने एक ठंडी साँस ली और दीवार के सहारे टिक गया। उसकी प्रार्थनाएं रंग ला रही थीं। लेकिन तभी मिस्टर खन्ना की आवाज़ ने उस शांति को भंग कर दिया।
​मिस्टर खन्ना ने अपने कोट की जेब से चेकबुक निकाली और कादिर व अज़ीम की तरफ बढ़े। उनकी आँखों में अभी भी वही अहंकार था। "तुम लोगों ने मेरी बेटी के लिए जो किया, उसके लिए शुक्रिया। मैं अहसानमंद रहना पसंद नहीं करता। अज़ीम, तुम्हारी दुकान का जो भी नुकसान हुआ है और कादिर, तुमने जो खून दिया है... उसके बदले मैं तुम दोनों को यह ब्लैंक चेक (Blank Check) दे रहा हूँ। अपनी कीमत भर लो और यहाँ से चले जाओ।"
​अज़ीम और कादिर सन्न रह गए। कादिर की आँखों में अपमान की चमक थी, जबकि अज़ीम का सिर शर्म से झुक गया कि वह कैसे इंसान की बेटी से मोहब्बत कर बैठा।
​तभी ज़ारा, जो अब तक शांत खड़ी थी, एक ज़ख्मी शेरनी की तरह अपने पिता पर झपटी। उसने झटके से उनके हाथ से वह चेकबुक छीनी और उसे हवा में लहराते हुए फाड़कर उनके पैरों में फेंक दिया।
​"बस कीजिए मिस्टर खन्ना! बस कीजिए!" ज़ारा की आवाज़ पूरे अस्पताल में गूँज उठी। "आप अभी भी इसी घमंड में हैं कि आप हर चीज़ खरीद सकते हैं? आप अभी भी इन दोनों को 'दौलत' की पेशकश कर रहे हैं? शर्म आनी चाहिए आपको!"
​मिस्टर खन्ना हक्के-बक्के रह गए, "ज़ारा! मैं तो बस इनकी मदद..."
​"मदद नहीं, आप अपनी साख का सौदा कर रहे हैं!" ज़ारा चिल्लाई। "अगर आप सच में कुछ देना चाहते हैं, तो दौलत बाद में दीजिएगा... पहले इनसे माफी माँगिए! उस ज़ुल्म के लिए जो आपने अज़ीम पर किया, उस बेइज्जती के लिए जो आपने एक निस्वार्थ डोनर (कादिर) की है। मिस्टर खन्ना, घुटनों पर आइए और इनसे माफी माँगिए, वरना आज आप अपनी इस बड़ी बेटी को भी हमेशा के लिए खो देंगे।"
​पूरे गलियारे में सन्नाटा छा गया। मिस्टर खन्ना के गार्ड्स, डॉक्टर और अज़ीम—सब हैरान थे। ज़ारा ने अपने पिता को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया था जहाँ उनकी करोड़ों की रईसी धूल चाट रही थी।
​​ स्वाभिमान की ऊँचाई
​मिस्टर खन्ना पत्थर की मूरत बने खड़े थे। ज़ारा के शब्दों ने उनके अहंकार पर वो चोट की थी कि उनकी ज़ुबान जैसे लकवा मार गई हो। गलियारे में मौजूद हर आँख उन्हें देख रही थी, इंतज़ार कर रही थी कि क्या शहर का सबसे रईस इंसान एक मामूली दुकानदार के सामने घुटने टेकेगा?
​तभी अज़ीम ने धीरे से ज़ारा का हाथ छुआ और उन्हें पीछे हटने का इशारा किया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।
​"नहीं... रहने दीजिए मैडम साहिबा," अज़ीम ने बहुत ही सधे हुए लहजे में कहा। "माफी की बात मत कीजिए। हमें इन सब की आदत नहीं है। हम छोटे लोग हैं, हमें अपनी औकात में रहना ही सुहाता है। माफी माँगने के लिए दिल बड़ा होना चाहिए, सिर्फ़ पैसा नहीं।"
​कादिर ने भी अज़ीम की बात का समर्थन किया और मिस्टर खन्ना की ओर देखते हुए कड़वाहट से कहा, "मैडम, ये आपका और आपके पिता का आपसी मामला है, इसमें हमें मत घसीटिए। हम इतने भी बुरे नहीं हैं कि किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर उसे झुकने पर मजबूर करें। वरना लोग कहेंगे कि हमने खून जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि रईसों को नीचा दिखाने के लिए दिया था।"
​अज़ीम ने अपनी फटी हुई आस्तीन को नीचे किया और ज़ारा की आँखों में देखते हुए बोला, "हमें माफ़ कर दीजिए, पर हमें आपके इन एहसानों के बोझ के नीचे नहीं दबना है। वरना कल को इसकी भी हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी... शायद हमारी जान देकर या फिर हमारा ज़मीर बेचकर। जिसे आपने 'कचरा' समझा था, उसे कचरा ही रहने दीजिए, क्योंकि कचरे की कोई कीमत नहीं होती।"
​इतना कहकर अज़ीम और कादिर मुड़े और बिना पीछे देखे अस्पताल के उस ठंडे गलियारे से बाहर की ओर चल दिए।
​मिस्टर खन्ना ने एक लंबी साँस ली, जैसे उनके सीने से कोई बोझ हटा हो, पर उनकी आँखों में शर्मिंदगी की जगह एक अजीब सी राहत थी कि उन्हें झुकना नहीं पड़ा। लेकिन ज़ारा... ज़ारा की नज़रों में अब अपने पिता के लिए नफरत की इंतहा हो चुकी थी।
​उसने अपने पिता की तरफ देख कर धीमी आवाज़ में कहा, "आज आपने साबित कर दिया कि आप सिर्फ एक अमीर लाश हैं। अज़ीम चला गया, पर वह आपको इतना छोटा कर गया है कि अब आप कभी सिर उठाकर नहीं चल पाएंगे।"