Unnecessary love. in Hindi Motivational Stories by Jeetendra books and stories PDF | बेवजह की महोब्बत।

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बेवजह की महोब्बत।

 का समय था। शहर की पुरानी गलियों में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। सड़क किनारे लगे पीपल के पेड़ की पत्तियाँ सरसराकर जैसे किसी अनकही कहानी की गवाही दे रही थीं। उसी शहर के एक छोटे से कमरे में, दीवार से टिककर बैठा आरव अपनी डायरी के आखिरी पन्ने पर कुछ लिख रहा था।

“मुझे नहीं पता कि यह महोब्बत थी या सिर्फ़ एक आदत। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि इसी बेवजह की महोब्बत ने मुझे बिखरकर फिर से बनना सिखाया।”

लिखते हुए उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर आई। आँखों के किनारों में नमी थी, मगर उस नमी में अब दर्द कम और स्वीकार ज़्यादा था। क्योंकि आरव की कहानी किसी आम कहानी जैसी नहीं थी। यह कहानी थी एक ऐसे लड़के की, जिसने किसी को बिना वजह चाहा, बिना वजह खोया, और फिर उसी टूटे हुए दिल से अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत लिखी।

आरव एक छोटे कस्बे का रहने वाला था। पिता स्कूल में क्लर्क थे और माँ घर चलाती थीं। घर में बड़ा अमीरपन नहीं था, लेकिन एक-दूसरे के लिए सच्चा अपनापन था। आरव बचपन से ही चुप, संवेदनशील और थोड़ा सपने देखने वाला लड़का था। उसे किताबें पसंद थीं, बारिश पसंद थी, खाली सड़कें पसंद थीं और सबसे ज़्यादा पसंद थी लोगों की आँखों में छिपी कहानियाँ पढ़ना।

कॉलेज के दूसरे साल में उसने पहली बार उसे देखा था। उसका नाम था सिया।

सिया कॉलेज की उन लड़कियों में थी जो एक कमरे में आते ही माहौल बदल देती थीं। वह बहुत शोर नहीं मचाती थी, लेकिन उसकी मौजूदगी में एक अलग तरह की रोशनी थी। बोलने का ढंग, आँखों में आत्मविश्वास, और चेहरे पर शांति। वह हमेशा अपनी नोटबुक में कुछ न कुछ लिखती रहती थी। कभी कविता, कभी विचार, कभी अपने सपने।

आरव ने उसे पहली बार लाइब्रेरी में देखा। वह खिड़की के पास बैठी थी, धूप उसकी किताब पर गिर रही थी। वह कुछ पढ़ते हुए बीच बीच में पन्ने पर उँगली रखकर सोचती, फिर हल्की सी मुस्कान के साथ अगली पंक्ति पढ़ने लगती। आरव को पता ही नहीं चला कि कब उसकी नज़रें किताब से हटकर सिया पर टिक गईं।

वह कोई फिल्मी पल नहीं था। न तेज़ संगीत बजा था, न हवा ने कोई इशारा किया था। बस एक साधारण सा क्षण था। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ सबसे साधारण क्षण से शुरू होता है।

उस दिन के बाद आरव ने सिया को कई बार देखा। कभी कैंटीन में, कभी सीढ़ियों पर, कभी ग्राउंड में, कभी लाइब्रेरी के कोने में। फिर एक दिन उसकी किस्मत ने उसे बोलने का मौका दे ही दिया। कॉलेज में एनुअल फंक्शन की तैयारी चल रही थी और आरव को पोस्टर बनाने की जिम्मेदारी मिली थी। सिया भी उसी टीम में थी।

“तुम रंगों का इस्तेमाल बहुत अच्छा करते हो,” सिया ने उसके बनाए पोस्टर को देखते हुए कहा था।

आरव पहली बार उसके इतने पास खड़ा था। उसे अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।

“मैं... बस कोशिश करता हूँ,” उसने हकलाते हुए कहा।

सिया मुस्कुरा दी थी। “कोशिश अच्छी है। और कोशिश से ही अच्छा बनता है।”

वही एक वाक्य आरव के भीतर कहीं उतर गया। उसे नहीं पता था कि यह तारीफ़ थी, सामान्य बातचीत थी या बस एक औपचारिक बात। लेकिन उसके भीतर कुछ खिल उठा। उस दिन के बाद आरव ने सिया से बातें बढ़ाने की कोशिश की। कभी किताबों पर, कभी सपनों पर, कभी जिंदगी की उलझनों पर। धीरे धीरे दोनों में एक अपनापन बनने लगा।

लेकिन सिया के सपने बहुत बड़े थे। वह पढ़ाई में तेज़ थी, आत्मनिर्भर थी और अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट थी। उसका लक्ष्य था प्रतियोगी परीक्षा पास करना और अपने परिवार का सहारा बनना। वह अपनी माँ के त्याग को बहुत अच्छी तरह समझती थी। उसके पिता बीमारी की वजह से काम नहीं कर पाते थे। घर की जिम्मेदारी सिया के कंधों पर थी, और वह उस जिम्मेदारी को बोझ नहीं, ज़िम्मेदारी समझती थी।

आरव, इसके उलट, अभी भी खुद को खोज रहा था। उसने अभी तक तय नहीं किया था कि उसे करना क्या है। वह बस दिन काट रहा था, छोटे मोटे काम करता, कॉलेज जाता, और सिया को दूर से देखते हुए अपने मन में एक नई दुनिया बसाता रहता।

उसे धीरे धीरे समझ आने लगा था कि वह सिया से प्यार करने लगा है। यह प्यार किसी माँग से नहीं, किसी उम्मीद से नहीं, किसी वादे से नहीं था। यह एक अजीब सी खामोशी जैसा प्यार था। ऐसा प्यार जो किसी से कुछ चाहता नहीं, बस उसके मुस्कुराते रहने की कामना करता है। आरव को यह भी पता था कि शायद सिया उसे वैसा महसूस नहीं करती। फिर भी उसका दिल नहीं माना।

एक दिन उसने हिम्मत करके अपने दोस्त इमरान से कहा, “यार, लगता है मैं उसे पसंद करने लगा हूँ।”

इमरान ने उसे देखा और हँसते हुए बोला, “भाई, पसंद करना और महोब्बत करना अलग बात है। और लगने से बात थोड़ी नहीं होती।”

आरव चुप रहा।

इमरान ने फिर नरम आवाज़ में कहा, “अगर वह तुम्हें नहीं चाहती तो भी तू अपनी कदर कम मत करना। प्यार कोई परीक्षा नहीं है जिसमें फेल होने पर इंसान खत्म हो जाता है।”

आरव के दिल पर ये बात लग गई। मगर लगने का मतलब समझना आसान नहीं था। क्योंकि जब दिल किसी पर टिक जाता है, तब दिमाग की बातें देर से समझ आती हैं।

समय बीतता गया। सिया की तैयारी तेज़ हो गई। आरव उसकी मदद करता, उसके लिए नोट्स ढूँढता, कॉलेज की लाइब्रेरी में जगह बचाकर रखता, और जब वह थक जाती तो बस इतना कहता, “कुछ देर आराम कर लो। फिर पढ़ना।”

सिया मुस्कुराकर कह देती, “तुम बहुत अच्छे हो, आरव।”

और यही वाक्य आरव के लिए कभी उम्मीद बन जाता, कभी दर्द। क्योंकि वह “अच्छे हो” से आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन वह यह भी जानता था कि किसी लड़की की इज़्ज़त उसकी सहमति के बिना प्यार में नहीं बदली जा सकती।

फिर एक शाम, बारिश हो रही थी। कैंटीन की खिड़की से बूंदें टकरा रही थीं। सिया किताब बंद करके बोली, “आरव, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”

आरव का दिल ज़ोर से धड़का। उसे लगा शायद आज सब कुछ बदल जाएगा।

सिया ने गहरी साँस ली और कहा, “मैं जानती हूँ तुम मुझे पसंद करते हो।”

आरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वह कुछ बोल नहीं पाया।

सिया ने धीरे से कहा, “मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती हूँ। तुम बहुत नेक इंसान हो। लेकिन मैं अभी अपने लक्ष्य से अलग कुछ नहीं सोच सकती। और सच कहूँ तो मैं तुम्हें दोस्त की तरह बहुत मानती हूँ, उससे ज़्यादा नहीं।”

यह सुनकर आरव के भीतर कुछ टूटा। कोई शोर नहीं हुआ। कोई तमाशा नहीं हुआ। बस दिल के भीतर एक दरार पड़ी, और उसमें चुप्पी भर गई।

उसने बहुत धीमे से कहा, “कोई बात नहीं।”

लेकिन “कोई बात नहीं” कहना और सचमुच कोई बात न होना, दोनों अलग होते हैं।

उस रात आरव कमरे में बहुत देर तक बैठा रहा। खिड़की से बाहर बारिश गिर रही थी। उसकी डायरी खुली थी, मगर कलम रुक गई थी। मन में हजारों सवाल थे। क्या वह बेवकूफ था? क्या उसकी महोब्बत व्यर्थ थी? क्या किसी को इस तरह चाहना ही उसकी सबसे बड़ी गलती थी?

दो दिन तक वह कॉलेज नहीं गया। फोन बंद रहा। खाना कम हो गया। माँ को लगा वह बीमार है, पर असल में वह भीतर से बीमार था। एक अजीब उदासी ने उसे घेर लिया था। वह सोचता रहा कि अगर प्यार का अंत यही है, तो लोग प्यार करते ही क्यों हैं।

तीसरे दिन इमरान उसके घर आया। उसने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, “अब बहुत हुआ। तू किसी इंसान से हारा नहीं है। तू अपने ही डर से हार रहा है।”

आरव ने सूखी आवाज़ में कहा, “जिसे इतना चाहा, उसने मुझे सिर्फ़ दोस्त कहा।”

इमरान कमरे में आया और उसके सामने बैठ गया। “और? क्या दोस्त होना छोटा दर्जा है? सुन आरव, तुमने उससे प्यार किया, यह तुम्हारी मजबूरी नहीं, तुम्हारी खूबी थी। गलती तब होती जब तुम उसके इनकार के बाद खुद को तोड़ लेते और अपनी पूरी ज़िंदगी वहीं दफना देते। प्यार अगर सच्चा है तो वह इंसान को संवारता है, नहीं तोड़ता।”

आरव चुप रहा।

इमरान ने आगे कहा, “तूने अभी तक खुद के लिए क्या किया है? दूसरों के लिए, उसके लिए, सबके लिए सोच लिया। अब एक बार अपने लिए सोच।”

वह रात आरव के लिए एक मोड़ बन गई। पहली बार उसने खुद को साफ़ शब्दों में देखा। एक ऐसा लड़का जो दूसरों के लिए जी रहा था, लेकिन अपने लिए कुछ नहीं कर रहा था। एक ऐसा लड़का जिसके पास प्रतिभा थी, संवेदना थी, धैर्य था, मगर दिशा नहीं थी।

अगली सुबह उसने पुराने कागज़ निकाले। किताबें खोलीं। उसने तय किया कि अब वह अपनी ज़िंदगी को बहाने के सहारे नहीं छोड़ सकता। उसे समझ आ गया था कि अगर दिल टूट भी जाए, तो हाथ काम करना बंद नहीं कर सकते। अगर प्यार अधूरा रह जाए, तो सपने भी अधूरे नहीं रहने चाहिए।

आरव ने तय किया कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी करेगा। यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। वह पहले भी सोचता था, पर अब उसके भीतर एक आग थी। वह सिया को भूलने के लिए नहीं, बल्कि खुद को बनाने के लिए पढ़ना चाहता था। क्योंकि उसे लगा कि अगर महोब्बत ने उसे दर्द दिया है, तो वह दर्द भी किसी काम का होना चाहिए। उसे अपनी कमजोरी नहीं, अपनी ताकत बनाना था।

शुरुआत आसान नहीं थी। सुबह जल्दी उठना, मन लगाकर पढ़ना, नोट्स बनाना, पुराने विषयों को दोबारा पकड़ना, यह सब उसके लिए नया नहीं था, लेकिन अब यह सब और भी अर्थपूर्ण था। पहले वह बस दिन बिताता था, अब वह हर घंटे को कमाता था।

कभी कभी सिया कॉलेज में दिख जाती। वह अपना लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही थी। आरव उसे देखकर पहले जैसा टूटता नहीं था। अब वह मन ही मन कहता, “जाओ, तुम अपना सपना पूरा करो। मैं भी अपना बनाऊँगा।”

उसने कॉलेज के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। शाम को वह छोटे बच्चों को गणित और अंग्रेज़ी पढ़ाता। शुरुआत में सिर्फ़ दो बच्चे थे। फिर चार हुए। फिर दस। धीरे धीरे लोग उसे जानने लगे। आरव की पढ़ाने की शैली साधारण थी, लेकिन उसमें एक सच्चाई थी। वह बच्चों को रटवाता नहीं था, समझाता था। वह कहता, “जो चीज़ समझ आ जाए, वह डर नहीं बनती।”

उसका यही वाक्य बच्चों के साथ साथ उसके अपने जीवन पर भी लागू हो रहा था। जो दर्द समझ आ जाए, वह भी डर नहीं बनता।

समय धीरे धीरे उसका साथी बन गया। छह महीने बीते। फिर एक साल। आरव पहले से ज़्यादा अनुशासित हो चुका था। अब वह हर सुबह दौड़ने जाता, फिर पढ़ाई करता, फिर बच्चों को पढ़ाता। उसकी दुनिया फैलने लगी। उसके भीतर आत्मविश्वास आने लगा। जो लड़का कभी किसी के एक संदेश के इंतज़ार में पूरा दिन बिता देता था, अब वह अपने लक्ष्य के लिए घंटों किताबों में डूबा रहता।

इसी दौरान उसके घर की आर्थिक हालत थोड़ी कठिन हो गई। पिता की नौकरी में देरी होने लगी। घर में तनाव बढ़ गया। पर इस बार आरव टूटने के बजाय खड़ा हुआ। उसने ट्यूशन की कमाई घर में दी, माँ के लिए दवा ली, पिता का बोझ हल्का किया। माँ ने जब पहली बार उसके हाथ से पैसे लिए, तो उसकी आँखों में गर्व के आँसू थे।

“मेरा बेटा बड़ा हो गया है,” माँ ने काँपती आवाज़ में कहा।

आरव मुस्कुराया। उसे लगा जैसे सारा जीवन उसी एक वाक्य के लिए जी रहा था।

इधर सिया भी अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ गई थी। उसने अपनी परीक्षा पास कर ली थी। वह शहर से बाहर ट्रेनिंग के लिए चली गई। जाते समय उसने आरव को एक छोटा सा संदेश भेजा था।

“तुम बहुत अच्छे दोस्त रहे। तुम्हारी वजह से कई मुश्किल दिन आसान हुए। अपनी ज़िंदगी को कभी कम मत समझना।”

आरव ने वह संदेश कई बार पढ़ा, फिर उसे बंद करके मुस्कुरा दिया। अब उस मुस्कान में शिकायत नहीं थी। अब उसमें सम्मान था। उसने पहली बार समझा कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में प्रेम बनकर नहीं, सीख बनकर आते हैं। और सीख कभी बेकार नहीं जाती।

दो साल बीत गए। आरव ने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। कई बार असफलता मिली। कई बार कम नंबर आए। कई बार लगा कि मेहनत बेकार जा रही है। लेकिन अब वह पहले वाला आरव नहीं था जो हारकर चुप बैठ जाए। अब वह जानता था कि असफलता अंत नहीं, अभ्यास है।

एक परीक्षा में वह मामूली अंतर से रह गया। पहले होता तो वह खुद को दोष देता, टूट जाता। लेकिन उस दिन उसने सिर्फ़ इतना कहा, “मैं अभी तैयार नहीं हूँ, लेकिन मैं हार नहीं मानूँगा।”

और यही वह क्षण था जब उसकी असली जीत शुरू हुई।

तीन साल बाद, एक दिन सुबह उसके मोबाइल पर कॉल आया। आवाज़ थी, “आरव कुमार?”

“जी।”

“आपका चयन हो गया है।”

कुछ पल के लिए उसे समझ ही नहीं आया। फिर शब्दों का अर्थ उसके भीतर उतरने लगा। उसने फोन हाथ में पकड़े रखा और ज़मीन पर बैठ गया। आँखें भर आईं। यह खुशी की नहीं, संघर्ष के पूरे होने की नमी थी।

माँ दौड़कर आईं। पिता ने अख़बार किनारे रखा। इमरान झूम उठा।

“बोल, अब कौन कहता है कि बेवजह का प्यार बेकार होता है?” इमरान चिल्लाया।

आरव हँसा। पहली बार खुलकर, दिल से, पूरे मन से।

उसकी ट्रेनिंग के बाद जब वह एक अच्छे पद पर पहुँचा, तब उसने सबसे पहले अपने गाँव के पास एक छोटी लाइब्रेरी और पढ़ाई केंद्र खोला। उसका सपना सिर्फ़ अपनी जिंदगी सुधारना नहीं था, बल्कि उन बच्चों तक रोशनी पहुँचाना था जिनके पास संसाधन कम थे, लेकिन सपने बहुत थे। उसने वहाँ एक बोर्ड लगवाया।

“यहाँ हर मेहनत को जगह मिलेगी।”

लाइब्रेरी के उद्घाटन वाले दिन बहुत लोग आए। बच्चों ने तालियाँ बजाईं। माता पिता ने आशीर्वाद दिया। आरव मंच पर खड़ा होकर बोला, “मैंने यह सफर किसी जीत के लिए शुरू नहीं किया था। मैंने इसे अपने टूटे हुए दिल से शुरू किया था। मुझे लगा था कि बेवजह की महोब्बत ने मुझे कमजोर कर दिया, लेकिन असल में उसी ने मुझे समझाया कि किसी एक इंसान से उम्मीद रखकर जीवन नहीं रुकता। अगर कोई आपको नहीं चुनता, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अनचुने हैं। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि आपकी कहानी अभी कहीं और लिखी जानी बाकी है।”

हॉल में खामोशी छा गई। कई आँखें नम थीं।

आरव ने आगे कहा, “मैंने एक लड़की को चाहा। उसने मुझे नहीं चाहा। यह उसका अधिकार था। और मेरा अधिकार था कि मैं अपने दर्द को अपनी मंज़िल का ईंधन बनाऊँ। आज मैं जो भी हूँ, उसमें उस महोब्बत का भी हिस्सा है, जो कभी पूरी नहीं हुई। इसलिए मैं अब कह सकता हूँ कि बेवजह की महोब्बत भी बेकार नहीं होती। वह इंसान को अंदर से बदल देती है। और अगर इंसान बदल जाए, तो उसकी दुनिया बदल जाती है।”

उस दिन आरव ने पहली बार अपने दिल का सबसे गहरा सच सबके सामने रखा। और सच यह था कि वह सिया को भूल नहीं पाया था, लेकिन अब उसकी याद दर्द नहीं थी। वह याद एक अध्याय थी। एक ऐसा अध्याय जिसने उसे गिराया भी, संभाला भी, और बनाया भी।

कार्यक्रम के बाद जब वह बाहर आया, तो उसे सामने सिया खड़ी मिली। बहुत साल बाद। समय ने उसके चेहरे को और परिपक्व कर दिया था। आँखों में वही चमक थी, मगर अब उसमें जीवन की थकान भी थी।

“मैंने तुम्हारे बारे में सुना,” सिया ने मुस्कुराकर कहा। “बहुत अच्छा लगा।”

आरव ने शांति से कहा, “धन्यवाद। तुम कैसी हो?”

“अच्छी हूँ। और... खुश हूँ कि तुमने वह कर दिखाया जो तुम हमेशा कर सकते थे।”

आरव ने हल्की हँसी के साथ कहा, “शायद मुझे खुद पर देर से भरोसा हुआ।”

सिया ने थोड़ा रुककर कहा, “आरव, उस समय मैंने तुम्हें ठुकराया था, लेकिन तुम्हारी सच्चाई हमेशा याद रही। तुमने कभी मुझे दोष नहीं दिया। शायद यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत थी।”

आरव ने उसकी आँखों में देखा। अब उसके भीतर कोई तूफ़ान नहीं उठा। न कोई उम्मीद, न कोई अधूरापन। बस शांत स्वीकार।

“तुम सही थीं,” उसने कहा। “तुम्हारे पास अपना रास्ता था, मेरे पास अपना। अच्छा हुआ जो दोनों ने अपने रास्ते चुने।”

सिया की आँखों में चमक और सम्मान दोनों थे। वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तुम सच में बहुत बदल गए हो।”

आरव ने मुस्कराते हुए कहा, “नहीं, मैं बदल नहीं गया। मैं बस वापस मिल गया हूँ।”

सिया ने सिर हिलाया और धीरे से विदा ली। वह चली गई। इस बार आरव के दिल में कोई भारीपन नहीं था। क्योंकि यह मुलाकात किसी नई कहानी की शुरुआत नहीं थी। यह सिर्फ़ उस पुरानी कहानी का शांत अंत था, जिसने उसे एक नया जीवन दिया था।

रात को आरव अपने कमरे में लौटा। उसने वही पुरानी डायरी खोली, जिसके पहले पन्ने पर उसने दर्द में डूबे शब्द लिखे थे। अब वह आखिरी पन्ने पर बैठकर कुछ और लिखना चाहता था।

“बेवजह की महोब्बत ने मुझे सिखाया कि हर चाहत का जवाब मिलना ज़रूरी नहीं। हर दिल किसी और दिल से नहीं जुड़ता। लेकिन हर टूटा दिल अगर सही दिशा मिले, तो वह किसी पर्वत की तरह मजबूत बन सकता है। मैंने जिसे चाहा, वह मेरी नहीं हुई। लेकिन उसी न मिलने ने मुझे मेरा सबसे सच्चा रूप दिया। अब मैं समझ गया हूँ कि कभी कभी मोहब्बत का काम साथ पाना नहीं, साथ चलने की ताकत देना होता है।”

उसने कलम रखी, खिड़की खोली। बाहर चाँद चमक रहा था। हवा पहले से ज़्यादा साफ़ लग रही थी। भीतर अब कोई खालीपन नहीं था। वहाँ एक ऐसा इंसान था, जो अपने दर्द से भागा नहीं, बल्कि उसे सीढ़ी बना गया था।

और शायद यही ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत जीत थी।

कि कोई आपको छोड़ दे, फिर भी आप खुद को न छोड़ें।
कि कोई आपकी महोब्बत न समझे, फिर भी आप अपनी कद्र समझ जाएँ।
और कि बेवजह की महोब्बत भी कभी कभी इंसान को वह वजह दे देती है, जिसके सहारे वह अपनी पूरी दुनिया बदल देता है।