एपिसोड 13: बेअसर दौलत और उम्मीद का कतरा
अस्पताल के उस कमरे में मौत का साया गहराता जा रहा था। अज़ीम फर्श पर सुन्न होकर बैठा था, मानों उसका जिस्म तो यहाँ था पर रूह ज़ोया के साथ कहीं दूर जा चुकी थी। ज़ारा की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसने मुड़कर दरवाज़े पर खड़े अपने डैड की तरफ देखा, जिनकी गर्दन आज पहली बार झुकी हुई थी।
"देख लीजिए मिस्टर खन्ना!" ज़ारा की आवाज़ में ज़हर और दर्द का मिला-जुला शोर था। "क्या करेंगे आप अपनी इस बेहिसाब दौलत का? आज आपकी रईसी एक बेटी की साँसें तक नहीं खरीद पा रही। आपकी इस सत्ता ने, आपके इन गार्ड्स और रसूख ने पूरे शहर में छान मारा, पर ज़ोया के लिए खून की एक बोतल तक नहीं ढूँढ पाए। धिक्कार है आपकी ऐसी दौलत पर!"
'खून की बोतल'—इन शब्दों ने अज़ीम के कानों में बिजली की तरह काम किया। वह झटके से खड़ा हुआ और लड़खड़ाते हुए ज़ारा के करीब आया।
"क्या... क्या खून की ज़रूरत है?" अज़ीम की आवाज़ में अचानक एक नई तड़प जागी। "आपने मुझे बताया क्यों नहीं? क्या हुआ है ज़ोया साहिबा को? अगर मेरे खून का एक-एक कतरा भी उन्हें बचा सकता है, तो मैं अभी अपनी नसें काट दूँगी। मुझे बताओ डॉक्टर, क्या मेरा खून काम आएगा?"
डॉक्टर ने मायूसी से सिर हिलाया, "अज़ीम, उनका ब्लड ग्रुप 'ओ नेगेटिव' है, जो बहुत दुर्लभ होता है। हमें डर है कि शायद तुम्हारा ग्रुप..."
"मेरा ग्रुप चेक करो! अभी!" अज़ीम चिल्लाया।
डॉक्टर ने तुरंत अज़ीम का ब्लड सैंपल लिया, पर कुछ ही मिनटों बाद रिपोर्ट फिर वही मायूसी लेकर आई। ग्रुप मैच नहीं हुआ। अज़ीम दीवार से टिक गया, उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। तभी, जैसे धुंधलेपन में उसे एक रोशनी दिखी। उसे याद आया—उसका बचपन का दोस्त, 'कादिर'। अज़ीम को याद था कि एक बार रक्तदान शिविर में कादिर ने बताया था कि उसका खून 'ओ नेगेटिव' है।
अज़ीम की आँखों में चमक लौट आई। उसने झपटकर ज़ारा के हाथ से उसका महंगा फोन माँगा। "मैम! फोन दीजिए! मुझे एक फोन करना है। मेरा एक दोस्त है, उसका खून शायद ज़ोया साहिबा को बचा ले। वह आएगा... वह ज़रूर आएगा!"
ज़ारा ने बिना कुछ सोचे अपना फोन अज़ीम के हाथ में थमा दिया। अज़ीम के कांपते हाथ कादिर का नंबर डायल करने लगे। कमरे में मौजूद हर शख्स की साँसें थम गईं। क्या अज़ीम का वो दोस्त वक्त पर पहुँच पाएगा? क्या एक गरीब की दोस्ती आज खन्ना साम्राज्य की सबसे बड़ी दौलत बनेगी?
अहसान और अहंकार की जंग
एक कोने में अज़ीम पागलों की तरह फोन पर कादिर को अपनी लोकेशन समझा रहा था, "भाई, तू बस पहुँच जा... मेरी ज़ोया की जान खतरे में है, तू बस आ जा!" उसकी आवाज़ में वो गिड़गिड़ाहट थी जो सिर्फ अपनों के लिए निकलती है।
दूसरी तरफ, ज़ारा मिस्टर खन्ना के सामने एक दीवार बनकर खड़ी थी। उसकी आँखों में अपने पिता के लिए अब रत्ती भर भी सम्मान नहीं बचा था। उसने कांपती उंगली से अज़ीम की तरफ इशारा किया और मिस्टर खन्ना की आँखों में झाँका।
"देख लीजिए मिस्टर खन्ना, गौर से देखिए इस इंसान को!" ज़ारा की आवाज़ ठंडी और तीखी थी। "यह वही शख्स है जिसे आपने कीड़े-मकोड़े की तरह कुचलने की कोशिश की। जिसकी दुकान आपने मिट्टी में मिला दी, जिसका वजूद मिटाने के लिए आपने अपनी पूरी ताकत लगा दी। आज वही इंसान आपकी लाडली की जान बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।"
मिस्टर खन्ना खामोश थे, उनकी नज़रें ज़मीन पर गड़ी थीं।
ज़ारा ने कड़वाहट से मुस्कुराते हुए कहा, "अगर अज़ीम उतना ही छोटा और मतलबी होता जितने छोटे आपके विचार हैं, तो आज वह आपको घुटनों के बल बिठाकर अपने जूते चटवाता! वह आपसे कहता कि 'मिस्टर खन्ना, अब अगर मेरी ज़रूरत है, तो रेंगते हुए मेरे पास आओ और अपनी रईसी की भीख माँगो'। वह आपसे अपनी उजड़ी हुई दुकान और अपनी बेइज्जती का हिसाब ले सकता था। लेकिन देखिए... वह अपनी तकलीफ भूलकर आपकी बेटी की साँसों के लिए लड़ रहा है।"
मिस्टर खन्ना ने धीरे से कहा, "ज़ारा, बस करो..."
"क्यों? सच कड़वा लग रहा है?" ज़ारा ने दहाड़ते हुए कहा। "आज आपकी करोड़ों की तिजोरी में ताला लग गया है क्योंकि वहाँ से खून की एक बूंद भी नहीं निकल सकती। आज आप इस गरीब दुकानदार के अहसान के नीचे दब चुके हैं। याद रखिएगा, अगर आज ज़ोया बचती है, तो वह आपकी दौलत की वजह से नहीं, बल्कि उस इंसान की मोहब्बत की वजह से बचेगी जिसे आपने 'सड़क का कचरा' समझा था।"
मिस्टर खन्ना के पास इस ज़हर का कोई तोड़ नहीं था। तभी अस्पताल के गलियारे में तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी। अज़ीम का दोस्त कादिर पसीने से लथपथ वहाँ पहुँच चुका था।
अज़ीम ने दौड़कर कादिर को गले लगा लिया, "तू आ गया भाई! तू आ गया!"