वहीं हवेली जो हमेशा कब्र जैसी खामोश रहती थी—
आज चीख़ रही थी। नौकरों की लाइन लगी है ।
आँगन में सभी नौकर-नौकरानियाँ सिर झुकाए खड़े थे।
सास (गुस्से में) बोली -
किसकी वजह से वो चारों भागे?!
बोलो! किसने मदद की?!
कोई जवाब नहीं सिर्फ डर।
सास बोली -
तुम!
एक बूढ़े माली की तरफ़ इशारा करते हुए बोली -
तुम्हारी वजह से सब हुआ!
माली (काँपते हुए) बोला -
मालकिन…मैंने तो…कुछ भी…
माली के थप्पड़ पड़ा — छन्न!
सास बोली -
चुप!
सास बोली -
आज से तुम…और तुम…और तुम…
तीन लोगों की तरफ़ उँगली करके बोली -
इस हवेली में नौकरी नहीं करोगे!
एक नौकरानी फूट-फूट कर रो पड़ी।
नौकरानी बोली -
मालकिन…हमारे छोटे छोटे बच्चे हैं…
सास बोली -
तो उन बच्चों को सिखाओ—
नियम तोड़ने का अंजाम क्या होता है!
हवेली में डर कई नौकर अंदर ही अंदर काँप रहे थे।
बड़े कमरे में कार्तिक के माँ-बाप आमने-सामने बैठे थे।
सास (गुस्से से) बोली -
ये सब कार्तिक की वजह से हुआ।
ससुर (ठंडे स्वर में) बोले -
नहीं… उस लड़की की वजह से।
सास बोली -
संस्कृति…उसने सब बिगाड़ दिया।
ससुर बोले -
अगर उसे शुरू में ही सीधे रास्ते पर रखा होता—
तो ये नौबत नहीं आती।
ज़रा भी पछतावा नहीं, ना आँखों में अफ़सोस। ना आवाज़ में दर्द।
सिर्फ़ गुस्सा कि उनकी “इज़्ज़त” को ठेस पहुँची।
सास (दाँत पीसते हुए) बोली -
वो जहाँ भी हों—
मैं उन्हें ढूँढ निकालूँगी।
ससुर बोले -
और वापस लाएँगे।
सास बोली -
नहीं…
ठंडी मुस्कान लिए बोली -
वापस नहीं घसीट कर लाएंगे।
हवेली फिर से खामोश, पर अब वो खामोशी मौत से भी ज़्यादा भयानक थी। कालकोठरी के बाहर वो दीया अब भी पड़ा था। बुझा हुआ। सास ने एक नज़र डाली
सास बोली -
कमज़ोरी यही होती है—
जो घर छोड़कर भाग जाए।
उसे नहीं पता था…कि कमज़ोरी घर में रहकर ज़ुल्म सहना होता है।
नया घर — कुछ दिन बाद
छोटा सा मकान पर हवा खुली थी। खिड़की से धूप अंदर आती थी।
और सबसे बड़ी बात यहाँ कोई नियम नहीं था जो साँस लेने से रोक दे। रसोई से पहली बार खिलखिलाहट की आवाज़ आ रही थी।
प्रार्थना (कढ़ाही चलाते हुए) बोली -
अरे सत्यभामा भाभी…नमक ज़्यादा हो गया!
सत्यभामा (मुस्कुराते हुए) बोले -
कोई बात नहीं ननद जी…पानी डाल देंगे।
ज़िंदगी में भी थोड़ा नमक-तेज़ चल ही जाता है।
दोनों हँस पड़ीं, वो हँसी जो सालों से रघुवंशी हवेली में मरी पड़ी थी।
चारों फ़र्श पर चटाई बिछाकर बैठे। साधारण दाल-चावल।
पर स्वाद में सुकून।
मनमोहन बोला -
भैया…मतलब केशव भैया…होटल का खाना अब पसंद नहीं आएगा।
केशव (हँसकर) बोला -
अब घर का खाना और घर की हँसी यही लग्ज़री है।
खाने के बाद प्रार्थना कॉपी-किताब लेकर बैठ गई।
प्रार्थना बोली -
भाभी…ये वाला सवाल समझ नहीं आ रहा…।
सत्यभामा उसके पास बैठ गई।
सत्यभामा बोली -
देखिए ननद जी…ऐसे करते हैं…।
वो प्यार से समझाने लगी।
प्रार्थना (खुश होकर) बोली -
भाभी! आप सच में सबसे अच्छी भाभी हो!
सत्यभामा की आँखें भर आईं पर इस बार वो आँसू खुशी के थे।
काम का नया तरीका
तीनों केशव, सत्यभामा, मनमोहन ने Work From Home
ले लिया था।
छोटा सा कमरा = ऑफिस
एक मेज़। तीन लैपटॉप।
मनमोहन (मजाक में) बोला -
सर…लंच ब्रेक मिलेगा?
केशव (सख़्त बॉस बनने की एक्टिंग करते हुए) बोला -
नहीं!
यहाँ प्यार तो चलता है… पर बहाने नहीं।
तीनों हँस पड़े, काम भी, चैन भी कभी वीडियो कॉल मीटिंग।
कभी कीबोर्ड की आवाज़। कभी प्रार्थना की चाय की आवाज़—
प्रार्थना (दरवाज़े से) बोली -
चाय!
सत्यभामा बोली -
आप दुनिया के सबसे अच्छे ऑफिस बॉय हो।
मनमोहन बोला -
और भाभी मैं?
सत्यभामा बोली -
देवर जी ! आप सबसे शोर करने वाले एम्प्लॉयी।
काम खत्म होने के बाद चारों घर के बाहर चबूतरे पर बैठते।
केशव (आसमान देखते हुए) बोला -
पता है…डर लगता है—
ये खुशी कहीं सपना न हो।
सत्यभामा धीरे से उसका हाथ थाम लेती।
सत्यभामा बोली -
अगर सपना है भी…तो पहली बार हम दोनों एक ही सपना देख रहे हैं।
केशव कुछ नहीं बोला। बस उसका हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया। पहली बार… ज़िंदगी ज़िंदगी जैसी लग रही थी।
सुबह की धूप घर के आँगन में धूप बिखरी थी। सत्यभामा कपड़े सुखा रही थी। केशव पास ही पौधों को पानी दे रहा था।
नज़रें टकराईं एक पल के लिए। दोनों झेंप गए।
प्रार्थना (पीछे से, शरारती आवाज़ में) बोला -
ओहो…आज तो मौसम बड़ा रोमांटिक लग रहा है!
मनमोहन (हँसते हुए) बोला -
लगता है आज ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ेगी!
सत्यभामा (शर्माकर) बोली -
आप दोनों बहुत बोलते हो!
केशव (गंभीर बनने की कोशिश करते हुए) बोला -
और तुम दोनों बहुत फालतू बोलने लगे हो।
घर के अंदर प्रार्थना चाय लेकर आई।
प्रार्थना बोली -
भाभी…भैया…मतलब केशव भैया… एक कप कम बनाई है।
मनमोहन बोला -
क्यों?
आज दो लोग एक कप में पीने वाले हैं क्या?
केशव बोला -
मनमोहन!
सत्यभामा हँस पड़ी। वो हँसी केशव के दिल में कुछ और ही कर गई।
दोपहर में प्रार्थना कॉपी लेकर बैठी।
प्रार्थना बोली -
भाभी…मुझे समझ नहीं आ रहा…।
सत्यभामा उसके पास बैठ गई। केशव भी वहीं लैपटॉप लेकर बैठ गया।
मनमोहन (आँख मारते हुए) बोला -
वाह… स्टडी टेबल या हनीमून स्पॉट?
सत्यभामा बोली -
देवर जी!
केशव (धीरे से) बोला -
तुम ध्यान दो… ये लाइन ऐसे…
उनकी उँगलियाँ कॉपी पर एक साथ छू गईं। एक पल की ख़ामोशी दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए। प्रार्थना जानबूझकर खाँसते लगी।
मनमोहन बोला -
लगता है यहाँ ऑक्सीजन कम हो गई है!
शाम को चारों छत पर बैठे थे।
मनमोहन बोला -
भैया…मतलब केशव भैया…आपको पता है—
भाभी आज फिर आपका मग धोकर लाई हैं।
केशव बोला -
तो?
मनमोहन बोला -
मतलब…मारे मग तो हम खुद ही धुलते हैं!
सत्यभामा (हँसते हुए) बोली -
आप दोनों बच्चे हो क्या!
प्रार्थना बोली -
पर भाभी…आप तो बिलकुल नई-नई दुल्हन हो।
केशव खामोश हो गया। सत्यभामा भी। हवा में कुछ बदल गया।
केशव ने धीरे से पूछा—
अगर मैं फिर से वही सख़्त इंसान बन जाऊँ…तो?
सत्यभामा उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दी।
सत्यभामा बोली -
तो मैं फिर से आपको हँसना सिखा दूँगी।
मनमोहन (ताली बजाते हुए) बोला -
वाह! क्या डायलॉग है!
प्रार्थना बोली -
अब तो शादी की री-रीसेप्शन पार्टी बनती है!
केशव (झेंपते हुए) बोला -
तुम दोनों बहुत खतरनाक हो।
चारों की हँसी निकल गई। लंबे समय बाद घर फिर से घर लग रहा था।
और कहीं दूर… हवेली में नफ़रत अब भी ज़िंदा थी।
क्या ये सुकून लंबा चलेगा?
या रघुवंशी हवेली की परछाईं फिर उन तक पहुँचने वाली है?
क्या रघुवंशी परिवार उन्हें ढूँढ पाएगा?
गाँव की ये शांति कब तक रहेगी?
क्या ये नज़दीकियाँ और गहरी होंगी?
अतीत फिर बीच में आ खड़ा होगा?
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