गाँव की सीमा। चारों रात भर चलते रहे। पैरों में छाले थे। साँस टूटी हुई थी। सूरज उग चुका था , जब उन्हें एक छोटा सा गाँव दिखा।
मोहन (थकी आवाज़ में) बोला -
भैया…बस…अब नहीं चल पा रहा…।
कार्तिक रुक गया। संस्कृति अब भी उसकी गोद में थी। पूजा भी लड़खड़ा रही थी। जैसे ही चारों गाँव की पहली गली में घुसे—
लोगों ने उन्हें देख लिया।
एक बूढ़ा आदमी (घबराकर) बोला -
अरे…ठाकुर साहब!
कुछ ही पल में…खबर आग की तरह फैल गई।
रघुवंशी आए हैं…
जहाँ डाँट पड़नी चाहिए थी वहाँ—
लोग सिर झुकाकर खड़े हो गए। औरतें घूँघट में। मर्द नज़रें नीचे।
गाँव का प्रधान (काँपती आवाज़ में) बोला -
ठाकुर साहब…हमसे…कोई भूल हो गई क्या?
कार्तिक हक्का-बक्का हो गया। कार्तिक को समझ नहीं आया
क्या बोले।
कार्तिक (धीरे से) बोला -
नहीं…हमें…बस पानी चाहिए…।
प्रधान और भी घबरा गया।
प्रधान बोला -
पानी…मतलब…ज़रूर कोई बड़ी बात हो गई है…
उसने तुरंत लड़के को भेजा—
सबको बुलाओ!
कुछ ही देर में… पूरे गाँव के लोग चौपाल में इकट्ठा।
औरतों की फुसफुसाहट —
इनके घर में तो हँसना भी गुनाह है…
आज खुद बहू को साथ लाए हैं…
लगता है कोई बहुत बड़ी सज़ा देने आए हैं…।
पूजा का दिल भर आया, पूजा ने आसपास देखा। इतना डर। इतनी दहशत।
पूजा (गुस्से और दर्द से) बोली -
भैया…देख रहे हो?
हमारे नाम से लोग काँपते हैं…।
संस्कृति अब भी कमज़ोर खड़ी थी। उसे लग रहा था सब उन्हें घूर रहे हैं।
एक औरत (डरते हुए) बोली -
ठाकुराइन जी…अगर हमसे कोई गलती हो गई हो तो माफ कर देना…।
संस्कृति का दिल बैठ गया, उसने कार्तिक का हाथ मज़बूती से पकड़ा। कार्तिक को पहली बार समझ आया—
उनका नाम सिर्फ इज़्ज़त नहीं, डर था।
कार्तिक (खुद से) बोला -
हम…राक्षस बन चुके हैं…।
सबको यही लग रहा था—
रघुवंशी आए हैं मतलब ज़रूर कोई गुनाह हो गया…
क्योंकि—
उनके घर में तो प्यार मना था।
प्रधान ने हाथ जोड़ दिए।
प्रधान बोले -
जो सज़ा देनी हो दे दीजिए…बस… हमारे बच्चों को मत छूइए…।
मोहन सन्न रह गया। मोहन की आँखें भर आईं।
मोहन बोला -
हम…सज़ा देने नहीं आए…।
पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
कार्तिक आगे बढ़ा उसने गहरी साँस ली।
कार्तिक (भरी आवाज़ में) बोला -
हम…भागकर आए हैं…।
जैसे बिजली गिरी हो —
भागकर?
लोग हक्का-बक्का रह गए।
फुसफुसाहट शुरू हो गई —
ठाकुर…भागकर?
उनके यहाँ से कौन भागता है?
कार्तिक की आंखों में नमी थी।
कार्तिक बोला -
हम अपने ही घर से भागे हैं…।
एक औरत की धीमी आवाज़ —
लगता है… भगवान ने भी इस घर को छोड़ दिया…।
माहौल बदलता है, डर अब हैरानी में बदल रहा था।
प्रधान (धीरे से) बोला -
तो…आप…यहाँ क्यों आए हैं?
कार्तिक बोला -
क्योंकि…हमें कहीं तो इंसान की तरह जीना है…।
और चारों एक-दूसरे को देखते हैं, एक पल के लिए सब चुप।
हवा में एक सवाल क्या ये गाँव उन्हें शरण देगा?
या रघुवंशी नाम का डर यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ेगा?
चौपाल में चारों चुपचाप बैठे थे। गाँव वाले इंतज़ार में।
कार्तिक (गहरी साँस लेकर) बोला -
अगर हम सब बता दें…तो…क्या आप हमें यहाँ रहने देंगे?
प्रधान ने एक नज़र सब पर डाली फिर बोला—
बेटा…पहले बोलो। सच सुनकर ही फैसला होगा।
कार्तिक ने सब बता दिया
कठोर नियम।
कालकोठरी।
मारपीट।
संस्कृति की बीमारी।
भागने की रात।
सब।
चौपाल में सन्नाटा, कई औरतों की आँखें भर आईं।
एक बूढ़ी अम्मा (आँचल से आँख पोंछते हुए) बोलीं -
हे भगवान… ऐसा घर भी होता है…।
प्रधान की आँखें सख़्त हो गईं।
प्रधान बोला -
जो हुआ…वो पाप था।
तुम लोग भागे नहीं… बचकर आए हो।
प्रधान (ऊँची आवाज़ में) बोला -
आज से ये चारों हमारे मेहमान नहीं—
हमारे अपने हैं!
भीड़ में हलचल हो गई। किसी ने पानी दिया। किसी ने चादर।
लेकिन डर अभी बाकी था
एक आदमी बोला है
पर…अगर रघुवंशी लोग यहाँ आ गए तो?
प्रधान कुछ सोचकर बोला—
तब तक ये लोग हमारे गाँव के हो चुके होंगे।
प्रधान बोला -
नाम…बदलने होंगे।
चेहरा नहीं…किस्मत बदलने के लिए।
नए नाम
कार्तिक — केशव
संस्कृति — सत्यभामा
मोहन — मनमोहन
पूजा — प्रार्थना
पूजा (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
कम से कम…नाम में तो प्रार्थना आ गया…।
पहली बार हल्की हँसी, मोहन मुस्कुरा दिया। संस्कृति ने डरते-डरते
साँस ली।
गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना सा मकान।
प्रधान बोला -
टूटा-फूटा है…पर अपना होगा।
घर का पहला कदम चारों ने अंदर देखा। जाले। धूल। टूटी खिड़की।
पूजा (हँसते हुए, आँखों में नमी लिए) बोली -
हमारा पहला आज़ाद घर…।
मोहन झाड़ू उठा लाया।
कार्तिक नहीं, केशव ने टूटी कुर्सी सीधी की।
पूजा अब प्रार्थना ने जाले हटाए।
संस्कृति अब सत्यभामा ने फर्श पोंछा।
काम के बीच बातें चलीं।
मनमोहन बोला -
भैया…मतलब…केशव भैया…अब तो हँसना मना नहीं है ना?
केशव एक पल चुप रहा, फिर धीरे से बोला—
अब…हँसना ज़िंदगी है।
सत्यभामा की आँखें भर आईं।
सत्यभामा (धीमे से) बोली -
और रोना?
केशव बोला -
अब रोना…कमज़ोरी नहीं। इंसान होना है।
रात हो गई। घर अब भी साधारण था। पर हवा में घुटन नहीं थी।
प्रार्थना ने दीया जलाया
प्रार्थना बोली -
इस घर में…अँधेरा नहीं रहेगा।
मनमोहन हँस पड़ा
मनमोहन बोला -
और इस घर में…अब प्यार मना नहीं है।
केशव और सत्यभामा की नज़रें मिलीं एक पल के लिए।
चुपचाप। पर उस चुप्पी में डर नहीं था। उम्मीद थी।
बाहर आसमान सितारे पहली बार इतने अपने लग रहे थे।
केशव (खुद से) बोला -
आज…हम पैदा हुए हैं।
गाँव में नई ज़िंदगी की शुरुआत—
क्या ये आज़ादी हमेशा रहेगी?
या अतीत की परछाईं फिर उन तक पहुँच जाएगी?