(सुबह का समय। घर में सन्नाटा। कौशिक ऑफिस के लिए निकल चुका है—चश्मा लगाए हुए।)
(सुनीति दरवाज़े के पास खड़ी उसे जाते हुए देखती है। आँखों में डर, मन में बेबसी।)
जब हर रास्ता बंद हो जाए… तब इंसान भगवान के दरवाज़े पर पहुँचता है।
(सुनीति मंदिर के बाहर खड़ी है। नंगे पाँव, हाथ में चुनरी।)
(घंटी की आवाज़ गूँजती है।)
(वो धीरे-धीरे अंदर जाती है और एक कोने में बैठ जाती है।)
(मंदिर में शांति है। धूप की खुशबू। आरती की धीमी आवाज़।)
(सुनीति दोनों हाथ जोड़ती है… पर शब्द नहीं निकलते।)
(कुछ पल बाद—)
सुनीति (सिसकते हुए) बोली -
“भगवान…मैंने आपसे कभी कुछ नहीं माँगा…”
(उसकी आवाज़ काँपती है।)
सुनीति बोली -
“आज माँग रही हूँ…तो भी अपने लिए नहीं।”
(आँसू गिरते हैं।)
सुनीति बोली -
“मेरे पति को ठीक कर दीजिए…
या मुझे इतनी ताक़त दे दीजिए कि मैं उन्हें इस हाल में टूटने न दूँ।”
(सुनीति मंदिर के खंभे से टेक लगाकर बैठ जाती है।)
सुनीति बोली -
“क्या प्यार करना गुनाह था?
क्या साथ निभाना इतना मुश्किल है?”
(वो माथा ज़मीन से लगा देती है।)
सुनीति (रोते हुए) बोली -
“अगर ये मेरी परीक्षा है, तो मैं हार गई हूँ, भगवान…”
(हवा हल्की-सी चलती है। दीपक की लौ काँपती है।)
(सुनीति को लगता है किसी ने उसके सिर पर हाथ रखा है।)
(वो चौंककर ऊपर देखती है—कोई नहीं।)
वो हाथ दिखाई नहीं देता था…पर एहसास बहुत अपना था।
(मंदिर के एक कोने में—कौशिक खड़ा है। बिना चश्मे के। दिखाई नहीं दे रहा।)
(उसकी आँखों में आँसू हैं।)
कौशिक (धीमे से) बोला -
“भगवान…अगर किसी को सज़ा देनी है तो मुझे दो…”
(वो सुनीति की तरफ देखता है।)
कौशिक बोला -
“इसने बहुत सह लिया है।”
(सुनीति खड़ी होती है। दीपक के सामने हाथ जोड़ती है।)
“मुझे चमत्कार नहीं चाहिए… बस इतना चाहिए कि मेरा भरोसा कभी टूटे नहीं।”
(वो आँखें बंद करती है।)
जब विज्ञान हार मान ले… और इंसान टूट जाए…
तब दुआ आख़िरी सहारा बनती है।
और कभी-कभी वही दुआ किस्मत का रुख बदल देती है।
(मंदिर में आरती समाप्त हो चुकी है। भीड़ धीरे-धीरे बाहर जा रही है। सुनीति अब भी वहीं बैठी है—आँखें बंद, हाथ जुड़े।)
(अचानक सामने रखा दीपक तेज़ हवा के बिना भी तेज़ी से जलने लगता है।)
(लौ सीधी ऊपर उठती है—स्थिर, उजली।)
पुजारी (धीमे आश्चर्य से) बोले -
“अजीब है…आज लौ बहुत शांत है।”
(सुनीति आँखें खोलती है। उसकी नज़र सीधे दीपक पर जाती है।)
(उसकी आँखों के सामने लौ के बीच हल्की-सी परछाई बनती है—
एक इंसानी आकृति।)
(सुनीति की साँस रुक जाती है।)
सुनीति (मन में) बोली -
“कौशिक जी…?”
(वो पलक झपकाती है—परछाई गायब।)
(पुजारी सुनीति के पास आता है।)
पुजारी बोले -
“बेटी… भगवान कभी सीधे जवाब नहीं देते।
वो बस रास्ता दिखाते हैं।”
(सुनीति चौंककर उसकी ओर देखती है।)
सुनीति बोली -
“रास्ता…?”
पुजारी (मुस्कुराकर) बोले -
“जो दिखाई नहीं देता वो हमेशा असली नहीं होता…
और जो महसूस हो वही सच होता है।”
(पुजारी मंदिर के अंदर एक पुराने ग्रंथ की ओर इशारा करता है।)
पुजारी बोले -
“ये ग्रंथ बहुत पुराना है।
इसमें शरीर और आत्मा के संतुलन की बातें हैं।”
(सुनीति उसे हाथ में लेती है। कवर पर लिखा है—)
ग्रंथ का नाम (क्लोज़) —
“दृश्य और अदृश्य के बीच”
(सुनीति की आँखों में चमक आ जाती है।)
(सुनीति ग्रंथ को सीने से लगाती है। आँखें बंद करती है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“अगर इलाज शरीर का नहीं… अस्तित्व का है…”
(उसका चेहरा दृढ़ हो जाता है।)
सुनीति बोली -
“तो मुझे डरना नहीं चाहिए।”
(मंदिर की सीढ़ियों पर उतरते वक्त सुनीति को वही परिचित एहसास होता है—किसी का साथ।)
(हल्की गर्म साँसें, कंधे पर स्पर्श।)
कौशिक की आवाज़ (धीमे, भीतर से) बोला -
“तुम अकेली नहीं हो, सुनीति।”
(सुनीति की आँखों से इस बार आँसू नहीं गिरते—मुस्कान आती है।)
(सुनीति मंदिर के बाहर खड़ी है। आसमान साफ है।)
शायद ये चमत्कार नहीं था…शायद ये जवाब भी नहीं था।
ये बस एक इशारा था—
कि रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ।
(रात। कमरा शांत है। टेबल लैम्प की पीली रोशनी में सुनीति वही पुराना ग्रंथ खोलकर बैठी है।)
(कौशिक पास ही है—दिखाई दे रहा है, क्योंकि उसने चश्मा लगाया है, सिर में दर्द है लेकिन बेचैन भी है।)
कुछ सच पढ़े नहीं जाते… समझे जाते हैं।
(सुनीति ग्रंथ पढ़ते-पढ़ते रुक जाती है। उसकी उँगलियाँ काँपने लगती हैं।)
ग्रंथ की पंक्तियाँ (वॉयसओवर) —
“जो मनुष्य अदृश्य हो गया हो,उसे केवल सच्चा प्रेम और पूर्ण बलिदान ही बचा सकता है।”
(सुनीति आगे पढ़ती है।)
ग्रंथ (वॉयसओवर) —
“पर ये बलिदान अदृश्य मनुष्य का नहीं… उसके प्रेम का होगा।”
(सुनीति का चेहरा सफ़ेद पड़ जाता है।)
सुनीति (धीरे से पढ़ते हुए) बोली -
“अदृश्य को दृश्य बनाने के लिए उसके सच्चे प्रेम को अदृश्य होना पड़ेगा…”
(वो रुकती है। साँस तेज़ हो जाती है।)
सुनीति बोली -
“ताकि वो उसकी अदृश्य दुनिया में जाकर उसे वापस ला सके…”
(किताब उसके हाथ से गिर जाती है।)
(कौशिक तुरंत आगे बढ़ता है।)
कौशिक (घबराकर) बोला -
“सुनीति…ये क्या पढ़ लिया तुमने?”
(सुनीति उसकी ओर देखती है, आँखों में आँसू, पर चेहरा शांत।)
सुनीति बोली -
“अब समझ आया…भगवान ने मंदिर में रास्ता क्यों दिखाया था।”
(कौशिक ज़ोर से उसका हाथ पकड़ लेता है।)
कौशिक बोला कि
“नहीं! ये क़ुर्बानी तुम नहीं दोगी।”
सुनीति (मुस्कुराकर, दर्द में) बोली -
“आपने भी तो दी थी, कौशिक…जब आपने खुद पर वो एक्सपेरिमेंट चुना था।”
(कौशिक की आँखें भर आती हैं।)
कौशिक बोला -
“मैं मरने को तैयार था… पर तुम्हें अब खोने को नहीं।”
(सुनीति उसका हाथ थाम लेती है। इस बार पकड़ मज़बूत है।)
सुनीति बोली -
“ये मरना नहीं है…मुझे आपको वापस लाना है।”
(वो उसकी आँखों में देखती है।)
सुनीति बोली -
“अगर कुछ समय के लिए मुझे अदृश्य होना पड़े…तो मुझे मंज़ूर है।”
कौशिक (काँपती आवाज़ में) बोला -
“अगर तुम वापस नहीं आई तो?”
(सुनीति हल्की मुस्कान के साथ उसके माथे पर हाथ रखती है।)
सुनीति बोली -
“तो समझ लेना मेरा प्यार इतना कमज़ोर नहीं था।”
(सुनीति ग्रंथ का आख़िरी पन्ना खोलती है।)
“जो प्रेम डर से बड़ा हो… वही अदृश्य को दृश्य बना सकता है।”
(कमरे में गहरा सन्नाटा।)
इस बार बचाने वाला कौशिक नहीं था…
इस बार प्यार ने खुद को दाँव पर रखा था।
क्या सुनीति बलिदान देगी?
क्या वो कौशिक के लिए अपने शरीर का त्याग कर देगी ?
क्या वो उस दुनिया से वापस आ पाएगी?
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