The real murderer. in Hindi Detective stories by Jeetendra books and stories PDF | असली कातिल।

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असली कातिल।

बारिश की बूँदें खिड़की के शीशे पर टकरा रही थीं। हर टपाक के साथ कमरे में मौजूद सन्नाटा और गहरा होता जा रहा था।  

राहुल वर्मा अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठा था। टेबल पर आधी पी गई चाय का कप ठंडा हो चुका था। सामने दीवार पर लगी पुरानी घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे सरक रही थीं—रात के दो बजकर सत्रह मिनट।  

उसने फाइल खोली।  
पहली तस्वीर: डॉ. अजय मेहरा। उम्र ५२। कार्डियोलॉजिस्ट। १९ अक्टूबर की रात को अपने क्लिनिक में गोली मारी गई।  
दूसरी तस्वीर: क्लिनिक का दरवाज़ा। बाहर से ताला लगा हुआ। अंदर से कुंडी।  
तीसरी: फर्श पर फैला खून। और खून के बीच में एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा—जिस पर सिर्फ़ तीन अक्षर लिखे थे: “आप”।  

राहुल ने सिगरेट सुलगाई। धुआँ कमरे में फैलने लगा।  
उसकी आँखें तस्वीरों पर टिकी रहीं, लेकिन दिमाग़ कहीं और था।  

पुलिस ने केस को जल्दी बंद कर दिया था।  
आत्महत्या।  
डॉक्टर अजय मेहरा ने खुद को गोली मारी।  
सबूत: बंद कमरा। बंद बंदूक पर उनकी उंगलियों के निशान। कोई जबरदस्ती का कोई निशान नहीं।  

लेकिन राहुल को कुछ और दिख रहा था।  
उस छोटे से कागज़ के टुकड़े पर लिखा “आप”।  
किसने लिखा?  
क्यों लिखा?  
और सबसे बड़ा सवाल—अगर डॉक्टर ने खुद को मारा, तो वो कागज़ क्यों छोड़ा?  

फोन की घंटी बजी।  
राहुल ने रिसीवर उठाया।  

“हैलो?”  
“सर, मैं हूँ... रमेश।”  
“बोलो।”  
“वो लड़की मिल गई। जिसने डॉक्टर को आखिरी बार देखा था। नाम है नेहा शर्मा। अभी अस्पताल के बाहर खड़ी है। रो रही है।”  

राहुल ने सिगरेट बुझाई।  
“मैं आ रहा हूँ।”  

बारिश और तेज़ हो गई थी।  

राहुल अपनी पुरानी मारुति ८०० में बैठा। वाइपर काम नहीं कर रहे थे। फिर भी वह निकल पड़ा।  
सड़कें चमक रही थीं। लालटेन की रोशनी पानी में टूटकर बिखर रही थी।  

अस्पताल के गेट पर नेहा खड़ी थी।  
काले रेनकोट में लिपटी हुई। बाल भीगे हुए। आँखें लाल।  

राहुल कार से उतरा। छाता नहीं था।  
वह सीधा उसके पास गया।  

“नेहा?”  

वह चौंकी।  
“आप... कौन?”  

“राहुल वर्मा। प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर।”  

नेहा ने पीछे देखा, जैसे कोई पीछा कर रहा हो।  
“मुझे... मुझे कुछ नहीं पता।”  

“डॉक्टर अजय ने तुम्हें आखिरी बार देखा था। रात १०:४५ बजे। कैमरे में दिख रही हो।”  

नेहा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।  
“मैं... मैं बस दवा लेने गई थी। मेरी माँ की...”

“माँ की क्या?”  

“कैंसर। स्टेज फोर।”  

राहुल चुप रहा।  
बारिश उसके चेहरे पर गिर रही थी।  

“डॉक्टर अजय तुम्हारी माँ का इलाज कर रहे थे?”  

“हाँ। लेकिन... पैसे नहीं थे। वो... वो कहते थे कि चिंता मत करो। इलाज चलता रहेगा।”  

“और उस रात?”  

नेहा की आवाज़ काँपने लगी।  
“उन्होंने मुझे बुलाया। कहा कि कुछ बात करनी है। मैं गई। क्लिनिक में सिर्फ़ वो थे। उन्होंने मुझे एक लिफाफा दिया। कहा—ये तुम्हारी माँ के इलाज के लिए है। रख लो।”  

“लिफाफे में क्या था?”  

“पैसे। बहुत सारे।”  

राहुल की भौंहें सिकुड़ गईं।  
“और फिर?”  

“फिर वो बोले—अब जाओ। और किसी को मत बताना। मैंने पूछा—क्यों? तो उन्होंने कहा... ‘कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते कि तुम्हारी माँ जिए।’”  

राहुल ने साँस ली।  
“किसी और ने कुछ कहा?”  

नेहा ने सिर हिलाया।  
“नहीं। बस इतना। मैं डर गई। भागकर निकल आई।”  

“और अगली सुबह खबर आई कि डॉक्टर मर गए।”  

नेहा रो पड़ी।  
“मुझे लगता है... मेरी वजह से। अगर मैं न जाती...”  

राहुल ने उसका कंधा थपथपाया।  
“तुम्हारी वजह से नहीं। लेकिन शायद तुम्हें कुछ और दिखा हो। सोचो। कोई छोटी सी बात।”  

नेहा ने आँसू पोंछे।  
“एक बात... जब मैं जा रही थी... बाहर गली में एक कार खड़ी थी। काली। हेडलाइट बंद। लेकिन मैंने देखा... ड्राइवर की तरफ़ से सिगरेट की लाल चमक।”  

राहुल का मन सतर्क हो गया।  

“कार का नंबर?”  

“नहीं... अंधेरा था। लेकिन... नंबर प्लेट पर कुछ लाल रंग था। जैसे स्टिकर।”  

राहुल ने जेब से छोटा नोटपैड निकाला।  
“कुछ और?”  

नेहा ने सिर हिलाया।  
“बस।”  

राहुल ने उसे अपनी विज़िटिंग कार्ड दिया।  
“अगर कुछ याद आए, तो कॉल करना। और सावधान रहना।”  

नेहा चली गई।  
राहुल बारिश में खड़ा रहा।  

उस रात वह सो नहीं सका।  
दिमाग़ में वही सवाल घूम रहे थे।  
अगर आत्महत्या थी, तो वो लिफाफा?  
वो “आप” लिखा कागज़?  
वो काली कार?  

सुबह होते ही वह डॉक्टर अजय के क्लिनिक पहुँचा।  
पुलिस ने सील तोड़ दिया था। अब कोई नहीं था।  

वह अंदर घुसा।  
खून का निशान अब धुल चुका था। लेकिन फर्श पर हल्का सा दाग़ अभी भी था।  

वह उसी जगह बैठ गया जहाँ डॉक्टर की लाश मिली थी।  
आँखें बंद कीं।  

कल्पना की।  
डॉक्टर कुर्सी पर बैठे हैं।  
बंदूक दाहिने हाथ में।  
ट्रिगर दबाया।  
लेकिन इससे पहले... उन्होंने वो कागज़ क्यों फाड़ा?  
क्यों सिर्फ़ “आप” लिखा?  

राहुल ने आँखें खोलीं।  
फर्श पर कुछ चमका।  
वह झुका।  
एक छोटा सा धागा। नीला। बहुत महीन।  

उसने उसे उठाया।  
कपड़े का नहीं। किसी जेब्री का।  
या किसी बैग का।  

उसके मन में एक नाम आया।  
डॉ. अजय की पत्नी—सुधा मेहरा।  
जो उस रात घर पर नहीं थीं।  
कहती थीं—मायके गई थीं।  

लेकिन राहुल को याद आया।  
सुधा मेहरा नीले रंग की हैंडबैग बहुत इस्तेमाल करती थीं।  

वह बाहर निकला।  
बारिश थम चुकी थी।  
आकाश साफ़ था।  
लेकिन उसके मन में बादल छाए हुए थे।  

उसने फ़ोन उठाया।  
रमेश को कॉल किया।  

“रमेश, सुधा मेहरा का पता लगाओ। कहाँ हैं वो आजकल?”  

“सर, वो तो पिछले हफ्ते से गोवा में हैं। रिसॉर्ट में।”  

“अकेली?”  

“नहीं सर। उनके साथ... एक आदमी है। नाम सुनकर लगता है—विक्रम राठौड़।”  

राहुल की साँस रुक गई।  
विक्रम राठौड़।  
वही नाम जो डॉ. अजय की डायरी में बार-बार आता था।  
और जिसका नाम पुलिस ने जानबूझकर रिपोर्ट से हटा दिया था।  

राहुल ने फ़ोन काटा।  
उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।  

अब असली खेल शुरू होने वाला था।  

क्या सुधा सच में मायके गई थीं?  
या वो रात कुछ और थी?  
विक्रम राठौड़ कौन था?  
और वो नीला धागा... क्या वाकई सुधा की हैंडबैग का था?  
या किसी और का?)  


गोवा की हवा में नमकीन गंध थी।  
समंदर की लहरें धीरे-धीरे किनारे को चूम रही थीं।  
राहुल रिसॉर्ट के बाहर एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था।  
सामने काली चश्मा लगाए सुधा मेहरा और विक्रम राठौड़।  
दोनों हँस रहे थे।  
सुधा का हाथ विक्रम के कंधे पर था।  

राहुल ने चाय का घूँट लिया।  
गर्म नहीं थी।  
फिर भी उसने पी।  

उसके पास एक छोटा सा बिनोकुलर था।  
वह देख रहा था।  
सुधा की उँगली में अब भी वही अँगूठी थी—जो डॉ. अजय ने शादी के दिन पहनाई थी।  
लेकिन अब वो अँगूठी बाईं उँगली में नहीं, दाहिने हाथ की छोटी उँगली में थी।  

राहुल ने मन ही मन मुस्कुराया।  
छोटी-छोटी बातें।  
बड़ी कहानी बनाती हैं।  

वह उठा।  
धीरे-धीरे उनके टेबल की तरफ़ बढ़ा।  

“सुधा जी?”  

सुधा चौंकी।  
चश्मा उतारा।  
“आप...?”  

“राहुल वर्मा।”  

विक्रम का चेहरा सख्त हो गया।  
“क्या चाहिए?”  

राहुल ने कुर्सी खींची। बिना पूछे बैठ गया।  
“बात करनी है।”  

सुधा ने नज़रें फेर लीं।  
“मुझे कुछ नहीं कहना।”  

“डॉक्टर अजय की मौत के बारे में?”  

विक्रम ने टेबल पर मुक्का मारा।  
“वो केस बंद हो चुका है। आत्महत्या थी।”  

राहुल ने जेब से वो नीला धागा निकाला।  
उसे टेबल पर रख दिया।  

“ये आपकी हैंडबैग से?”  

सुधा की आँखें फैल गईं।  
वह कुछ बोल नहीं पाई।  

“मैंने क्लिनिक में पाया। उसी रात का। जहाँ अजय मरे।”  

विक्रम उठ खड़ा हुआ।  
“तुम्हें क्या लगता है? हमने मारा है?”  

राहुल शांत रहा।  
“मैंने ऐसा नहीं कहा। लेकिन सवाल हैं।”  

सुधा ने आँसू रोके।  
“मैंने नहीं मारा। मैं... मैं वहाँ नहीं थी।”  

“तो ये धागा?”  

“मैं... मैं दो दिन पहले ही गई थी। अजय से मिलने। हमारा झगड़ा हुआ था।”  

“किस बात पर?”  

सुधा ने गहरी साँस ली।  
“विक्रम की वजह से। अजय को पता चल गया था।”  

राहुल ने विक्रम की तरफ़ देखा।  
विक्रम चुप था।  

“और?”  

“अजय ने कहा—तलाक़ दे दूँगा। लेकिन सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम रहेगी। विक्रम को कुछ नहीं मिलेगा।”  

विक्रम ने दाँत पीसे।  
“वो झूठ बोल रहा था। प्रॉपर्टी तो पहले से मेरे नाम थी।”  

राहुल ने भौंहें चढ़ाईं।  
“कैसे?”  

“अजय ने खुद ट्रांसफर कर दी थी। तीन साल पहले। कैंसर के इलाज के लिए पैसे चाहिए थे। मेरे पास थे। मैंने दिया। बदले में प्रॉपर्टी मेरे नाम।”  

राहुल चुप रहा।  
सब कुछ उलझ रहा था।  

फिर उसने पूछा।  
“तो उस रात तुम दोनों कहाँ थे?”  

सुधा बोली।  
“हम दिल्ली में थे। मेरे मायके। विक्रम मेरे साथ आया था।”  

“प्रूफ?”  

विक्रम ने फोन निकाला।  
कैलेंडर खोला।  
“ये लो। होटल का बिल। उसी रात का।”  

राहुल ने देखा।  
बिल सही था।  
समय सही था।  

तो फिर असली कातिल कौन?  

राहुल उठ खड़ा हुआ।  
“शुक्रिया।”  

वह वापस दिल्ली की ट्रेन पकड़ने निकल पड़ा।  

ट्रेन में उसने डॉ. अजय की डायरी फिर से खोली।  
आखिरी पन्ने पर लिखा था—  

“नेहा की माँ को बचाना है।  
पैसे खत्म हो रहे हैं।  
विक्रम से उधार लिया।  
लेकिन अब वो माँग रहा है।  
सब कुछ।  
मैं थक गया हूँ।  
शायद यही अंत हो।”  

राहुल ने डायरी बंद की।  
उसके मन में एक नया सवाल उठा।  

अगर विक्रम और सुधा निर्दोष थे...  
तो फिर वो काली कार?  
वो “आप” लिखा कागज़?  

ट्रेन दिल्ली पहुँची।  
राहुल सीधा नेहा के घर गया।  

नेहा ने दरवाज़ा खोला।  
उसकी आँखें सूजी हुई थीं।  

“क्या हुआ?”  

राहुल अंदर आया।  
“तुम्हारी माँ कैसी हैं?”  

“वही... अस्पताल में।”  

राहुल ने कमरे में देखा।  
एक छोटी सी तस्वीर टेबल पर।  
नेहा और उसकी माँ।  

फिर उसकी नज़र एक नीली हैंडबैग पर पड़ी।  
वही नीला रंग।  
वही महीन धागा।  

राहुल ने धीरे से पूछा।  
“ये बैग... तुम्हारा है?”  

नेहा घबरा गई।  
“हाँ... क्यों?”  

राहुल ने अपना जेब से निकाला धागा उस बैग से मिलाया।  
एकदम मिल गया।  

नेहा पीछे हट गई।  
“मैं... मैं कुछ नहीं जानती।”  

राहुल ने शांत स्वर में कहा।  
“उस रात तुम क्लिनिक गई थीं।  
डॉक्टर ने तुम्हें पैसे दिए।  
लेकिन वो पैसे सिर्फ़ इलाज के लिए नहीं थे।  
कुछ और था।  
कुछ ऐसा जो डॉक्टर नहीं चाहते थे कि कोई जाने।”  

नेहा रो पड़ी।  
“मैंने नहीं मारा... मैंने बस...”  

“बस क्या?”  

“डॉक्टर ने कहा था—ये पैसे ले जाओ। अपनी माँ को बचा लो। लेकिन एक शर्त।  
मैंने कहा—क्या शर्त?  
तो उन्होंने कहा—मेरी मौत के बाद ये बात किसी को मत बताना।  
मैंने पूछा—कैसी मौत?  
तो उन्होंने हँसकर कहा—जो भी हो।”  

राहुल चुप रहा।  

नेहा आगे बोली।  
“मैं डर गई। सोचा शायद वो मजाक कर रहे हैं।  
लेकिन अगली सुबह... खबर आई।  
मैं समझ नहीं पाई।  
फिर मुझे लगा... अगर मैंने बताया तो लोग कहेंगे मैंने मारा।  
इसलिए चुप रही।”  

राहुल ने पूछा।  
“और वो कागज़? ‘आप’?”  

नेहा ने सिर झुकाया।  
“वो मैंने लिखा था।  
डॉक्टर ने कहा था—अगर मैं मर गया तो ये कागज़ फाड़ देना।  
मैंने फाड़ा।  
लेकिन एक टुकड़ा रह गया।  
मैंने सोचा... कोई नहीं देखेगा।”  

राहुल ने गहरी साँस ली।  

तो असली कातिल... डॉ. अजय खुद थे।  
लेकिन मौत से पहले उन्होंने नेहा को बचाने की आखिरी कोशिश की।  
पैसे दिए।  
ताकि नेहा की माँ जी सके।  

राहुल बाहर निकला।  
आकाश में बादल छंट चुके थे।  
सूरज निकल आया था।  

उसने नेहा से कहा।  
“अब चुप मत रहना।  
अस्पताल में जाओ।  
डॉक्टर को बता दो।  
पैसे हैं। इलाज होगा।”  

नेहा ने आँसू पोछे।  
“और आप?”  

राहुल मुस्कुराया।  
“मैं?  
मैं तो बस... एक पुरानी कुर्सी पर बैठकर चाय पीता रहूँगा।”  

वह चल पड़ा।  
पीछे नेहा की आवाज़ आई।  

“थैंक यू...”  

राहुल रुका नहीं।  
बस धीरे से हाथ हिलाया।  

कभी-कभी असली कातिल कोई और नहीं होता।  
खुद इंसान होता है।  
अपनी मजबूरियों का।  
अपनी जिम्मेदारियों का।  

और कभी-कभी...  
वो कातिल नहीं होता।  
बस... थक जाता है।  

(कहानी समाप्त)