Lal Ishq - 2 in Hindi Drama by jagni b books and stories PDF | लाल इश्क - 2

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लाल इश्क - 2

'शास्त्री निवास' तक का वह रास्ता किसी लो-बजट हॉरर फिल्म के पैनिक अटैक जैसा था। बाहर धुंधली नियॉन लाइट्स और गाड़ियों के जहरीले धुएं का शोर था। आरंभी कंपनी की सेडान की पिछली सीट पर किसी कैदी की तरह बैठी थी। उसकी नज़रें बार-बार 'रियरव्यू मिरर' की डिजिटल स्क्रीन पर लॉक हो जातीं। उसे लग रहा था जैसे कोई काली परछाईं उसका पीछा कर रही है। जब भी कोई स्पोर्ट्स बाइक कान फाड़ देने वाले शोर के साथ पास से गुजरती, आरंभी का सांस लेना मुश्किल हो जाता। उस 'कातिल' का चेहरा उसके दिमाग में एक 4K रिज़ॉल्यूशन की तस्वीर की तरह फ्रीज हो गया था।

जैसे ही उसने विला के अंदर कदम रखा, महंगी सिगार और पुरानी लकड़ी की एक भारी महक ने उसका दम घोंट दिया। वह रईसी की खुशबू कम और 'सड़न' की बू ज्यादा थी। उसके पिता, दिग्विजय शास्त्री, अपनी लाइब्रेरी के आलीशान सेटअप में बैठे थे। हाथ में स्कॉच का गिलास और चेहरे पर वो डरावनी मुस्कान, जिसमें लाचारी और लालच का एक गंदा कॉकटेल घुला था।

"आरंभी, मेरी बच्ची... अंदर आओ," उन्होंने एक मखमली कुर्सी की ओर इशारा किया। "बैठो। हमें तुम्हारे 'फ्यूचर' का डेटा सेट करना है।"

आरंभी बैठी नहीं। वह सीधे मेज के पास जाकर किसी चट्टान की तरह तनकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज़ में एक सर्जिकल ब्लेड जैसी धार थी—ठंडी और जानलेवा।

"फ्यूचर फिलहाल 600 मिलियन के घाटे में 'क्रैश' हो चुका है, डैड! मैंने ऑफिस के सारे लेज़र और डिजिटल रिकॉर्ड्स स्कैन कर लिए हैं। हमारी मिलें नीलाम हो रही हैं और आपके लेनदार बाज़ की तरह हमारे दरवाजे पर मंडरा रहे हैं। आप फ्यूचर की बात कर रहे हैं या अपनी बर्बादी के 'लाइव टेलीकास्ट' की?"

दिग्विजय ने हवा में हाथ हिलाया, जैसे किसी उड़ती मक्खी को भगा रहे हों। "वह सब 'ओल्ड न्यूज़' है। मुझे एक इन्वेस्टर मिल गया है। एक ऐसा 'वेल' जो हमारा सारा कर्ज एक क्लिक में साफ कर देगा। वह इतना कैपिटल पंप कर रहा है कि हम फिर से इस शहर के गॉडफादर होंगे।"

आरंभी की एक भौंह तन गई। उसने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, "बिजनेस की इस शार्क-टैंक वाली दुनिया में कोई 'फ्री लंच' नहीं देता, डैड। हर कोई यहाँ लाशों पर बैठा है। उसने इस डील के बदले आपकी कौन सी कमज़ोरी खरीदी है? कंपनी के मेजॉरिटी शेयर्स... या सीधे मेरी गर्दन पर हाथ रखा है?"

दिग्विजय ने अपनी नज़रें डिजिटल स्क्रीन से हटाकर दीवार पर टंगी स्वर्गीय मां की तस्वीर पर टिका दीं। "उसे तुम चाहिए हो, आरंभी। वह एक 'मैरिज कॉन्ट्रैक्ट' चाहता है।"

कमरे में एक भारी, दम घोंटू सन्नाटा छा गया। आरंभी का चेहरा पूरी तरह निर्विकार हो गया—एकदम 'ब्लैंक स्क्रीन' की तरह। उसने अपनी कुर्सी को पीछे धकेला और सीधे दिग्विजय की आँखों में छेद करते हुए बोली: "तो आपने अपनी बेटी को ही अपना आखिरी 'एसेट' बना दिया? अमेजिंग, डैड! अब आपने यह कंफर्म कर दिया कि आपके लिए मैं एक बेटी नहीं, बल्कि सिर्फ एक 'करेंसी' हूँ जिसे आप जब चाहें बाज़ार में कैश करा सकते हैं।"

"यह बेचना नहीं है!" दिग्विजय दहाड़े। "वह बहुत इन्फ्लुएंशियल आदमी है। पावरफुल है, अमीर है। तुम वहां एक रानी की तरह रहोगी।"

आरंभी ने मेज पर झुकते हुए फुसफुसाकर कहा, "रानी... या एक सजी-धजी कैदी? और क्या नाम है उस 'बायर' का जिसने शास्त्री खानदान की वारिस की बोली लगाई है?"

"उसका नाम आर्यवर्धन सिंह राणा है," दिग्विजय की आवाज में एक अजीब सा खौफ और सम्मान का मिक्सचर था। "वह एक बहुत ही रहस्यमयी और एग्रेसिव प्राइवेट इन्वेस्टर है।"

आर्यवर्धन सिंह राणा... नाम सुनते ही आरंभी के सिस्टम में एक 'ग्लिच' हुआ। दिमाग में उस अंधेरी गली वाला मंजर किसी फ्लैशबैक की तरह कौंध गया। वह शिकारी जैसी चाल... वह जानलेवा अंदाज... और वे पत्थर जैसी ठंडी आंखें। उसकी स्पाइन में एक सिहरन दौड़ गई, पर उसने अपने डर को चेहरे के 'परफेक्ट मास्क' के पीछे दफन कर दिया।

"अगर आपको लगता है कि मैं अपनी बलि देकर आपके डूबे हुए टाइटैनिक को बचा लूंगी, तो आप सही हैं," आरंभी ने क्रूर लहजे में कहा। "लेकिन याद रखिएगा डैड, यह शादी नहीं है। यह आपका और मेरा आखिरी 'ट्रांजैक्शन' है। इसके बाद, दिग्विजय शास्त्री का अपनी बेटी पर कोई कॉपीराइट नहीं रहेगा।"

"वह अगले हफ्ते साइन-ऑफ (शादी) चाहता है," दिग्विजय ने दबी आवाज़ में कहा।

आरंभी ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया, "अगले हफ्ते क्यों? कहिए उसे कल ही आ जाए। जब डील लॉक हो चुकी है, तो तमाशा शुरू करने में देर कैसी?"

उसने दिग्विजय की आँखों में वह डर देख लिया जो शायद उस कातिल के डर से भी बड़ा था। वह बिना पीछे मुड़े अपने रूम की तरफ चल दी। उसे पता था कि वह एक गहरे दलदल में कदम रख रही है, लेकिन अब वह 'क्विट' करने वाली नहीं थी।