अगला एक हफ्ता किसी धुंधले और खौफनाक सपने जैसा था—रेशम, लेस और बंदूकधारी गार्ड्स के बीच बीता एक ऐसा हफ्ता, जिसने आरंभी शास्त्री की दुनिया की नींव हिला दी थी। शास्त्री निवास विला अब वह सुकून भरा घर नहीं रहा था; वह एक 'स्टेजिंग ग्राउंड' बन चुका था जहाँ किसी कीमती सौदे की प्रदर्शनी लगनी थी। विला की सफेद दीवारें और सुनहरे झूमर अब भी अपनी भव्यता में चमक रहे थे, लेकिन हर दरवाजे पर डार्क सूट पहने खड़े आदमियों ने उस चमक को खौफ के साये में बदल दिया था। उनकी आँखें काले चश्मों के पीछे पत्थर की तरह ठंडी थीं और कानों में लगे ईयरपीस से नीली रोशनी किसी ज़हरीले जुगनू की तरह चमक रही थी। आरंभी को जल्द ही समझ आ गया कि वे उसकी सुरक्षा के लिए नहीं थे, बल्कि यह पक्का करने के लिए थे कि 'डिलीवरी' से पहले इस 'माल' को एक खरोंच तक न आए।
आरंभी अपने रूम के बीचों-बीच एक बेजान बुत की तरह बैठी थी। तीन अनजान औरतें उसके शरीर पर काले रंग के मखमली रेशम के कई गज कपड़े लपेट रही थीं। शास्त्री निवास की सफेदी के बीच आरंभी का वह काला जोड़ा किसी अशुभ ग्रहण की तरह लग रहा था। यह लहंगा चांदी की कढ़ाई का एक बेजोड़ नमूना था, पर आरंभी को यह इतना भारी महसूस हो रहा था जैसे उसे किसी कवच में कैद कर दिया गया हो। उन्होंने उसके बालों में हीरों के गहने जड़े और उसके हाथों-पैरों पर मेहंदी के डार्क पैटर्न उकेरे, जो शास्त्री निवास की तेज़ रोशनी में काले सांपों की तरह रेंगते हुए लग रहे थे।
"आप बहुत सुंदर लग रही हैं, मिस," एक औरत ने फुसफुसाते हुए कहा। "शास्त्री खानदान की आज तक की सबसे अनोखी दुल्हन!"
आरंभी ने आईने में खुद को देखा। उसे वहां कोई दुल्हन नहीं दिखी, बल्कि एक 'जिंदा लाश' नजर आई। उस रेशमी काले रंग ने उसे उसी पल उस अंधेरी गली की याद दिला दी। चांदी के वे धागे उसे सजावट नहीं, बल्कि जंजीरें लग रहे थे।
"हमें अकेला छोड़ दो," दरवाजे से एक भारी और लड़खड़ाती आवाज़ आई।
औरतें सिर झुकाकर फौरन बाहर निकल गईं। आरंभी को पीछे मुड़ने की जरूरत नहीं थी। वह उस महंगी स्कॉच की तीखी महक पहचानती थी जिसे दिग्विजय शास्त्री सुबह से पी रहे थे।
"गाड़ियां आ गई हैं," दिग्विजय ने नज़रें चुराते हुए कहा। "शादी की रस्म शहर के बाहर, पहाड़ों में उसके प्राइवेट एस्टेट पर होगी। वहां सब कुछ ज्यादा... सुरक्षित है।"
"इतनी सिक्योरिटी क्यों, पापा?" आरंभी ने खालीपन से पूछा, उसकी आवाज़ में एक ठंडी धार थी। "अगर आर्यवर्धन सिंह राणा सिर्फ एक बिजनेसमैन है, तो शास्त्री निवास के गार्डन में राइफलों के साथ स्नाइपर्स क्यों खड़े हैं? आप मुझे मंडप में भेज रहे हैं या किसी कसाईखाने की मेज पर मेरा सौदा कर रहे हैं?"
दिग्विजय अपने कीमती कफ़लिंक ठीक करते हुए हिचकिचाए। "आर्यवर्धन के दुश्मन बहुत हैं, आरंभी। कामयाबी के साथ नफरत भी मुफ्त मिलती है। अब चलो, उसे और इंतज़ार कराना ठीक नहीं होगा।"
जब वे सीढ़ियों से नीचे उतरे, तो खन्ना जी वहीं खड़े थे। उनकी आँखों में ममता और बेबसी का मिला-जुला दर्द था। उन्होंने आगे बढ़कर एक छोटा डिब्बा आरंभी की ओर बढ़ाया।
" आपके लिए एक छोटा सा तोहफा, आरंभी बेटा," उन्होंने धीमे से कहा। "इसे अपने पास रखिएगा। यह याद दिलाएगा कि आप हमेशा उससे कहीं ज्यादा हैं जो ये लोग आपको समझ रहे हैं।"
आरंभी ने डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी चांदी की पॉकेट वॉच (जेब घड़ी) थी। जैसे ही आरंभी ने उसका बटन दबाया, उसकी टिक-टिक-टिक की आवाज़ उस आलीशान विला के सन्नाटे में गूँजने लगी। आरंभी ने उस घड़ी को अपने काले लहंगे की तहों में छिपा लिया। उसकी ठंडी धातु का अहसास उसे इस पागलपन भरी दुनिया में थोड़ा होश में रख रहा था।
उस एस्टेट तक पहुँचने में दो घंटे लगे। वह घर खुद कांच और काले स्टील का एक विशाल ढांचा था—किसी चट्टान के किनारे बना एक आधुनिक किला। वहां न कोई उत्सव था, न कोई सजावट। वहां सिर्फ ताकत का ठंडा और कठोर अहसास था। आरंभी को एक होल्डिंग रूम में ले जाया गया। वहां सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी जेब में रखी घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी।
तभी दरवाजे पर हुई दस्तक ने उसे चौंका दिया। एक युवती अंदर आई, जिसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। "मैं काव्या हूँ," उसने कहा। "मैं तुम्हें मंडप तक ले जाने आई हूँ।"
"क्या तुम उसकी बहन हो?" आरंभी ने पूछा।
काव्या ने सिर हिलाया। "हाँ। इस परिवार में तुम्हारा स्वागत है, आरंभी।"
"क... क्या... तुम यहाँ खुश हो?" आरंभी ने बेबाकी से पूछा।
काव्या के होंठों पर एक सर्द मुस्कान आई। "शास्त्री विला की बेटी, यहाँ आने के बाद बाहर निकलने के रास्ते नहीं खोजे जाते। यहाँ सिर्फ रहना सीखा जाता है। मेरी सलाह मानिए—खिड़कियों की तरफ मत देखिएगा।"
काव्या उसे गलियारों की एक भूलभुलैया से होते हुए एक खुले आंगन (Courtyard) में ले गई, जहाँ काले पत्थरों के बीच एक मंडप बनाया गया था। हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित थी और उसका धुआं ग्रे आसमान की ओर ज़हर की तरह उठ रहा था। दिग्विजय शास्त्री वहां खड़े थे, उस विशाल किले के सामने बहुत छोटे और कमज़ोर लग रहे थे।
और वही, अग्निकुंड के पास अपनी पीठ फेरकर खड़ा था वह—आर्यवर्धन सिंह राणा।
उसका लिबास किसी अंधेरे साम्राज्य के राजा जैसा था। आर्यवर्धन ने कठोर काले रेशम की शेरवानी पहनी थी, जो उसकी 6 फीट की ऊंचाई पर परफेक्ट फिट थी। उस पर 'जेट ब्लैक' धागों से बारीक नक्काशी की गई थी। उसके कंधे चौड़े थे और शेरवानी के बटन काले गोमेद (Onyx) पत्थरों के थे, जो आग की रोशनी में अंगारों की तरह दहक रहे थे। उसकी कलाई पर एक चौड़ा प्लैटिनम का बैंड था, जो उसकी निर्दयी ताकत का प्रतीक लग रहा था।
पंडित ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। दिग्विजय ने कांपते हाथों से आरंभी का हाथ उठाया और दूल्हे के हाथ में दे दिया।
आर्यवर्धन का हाथ बड़ा था, और उसकी पकड़ किसी लोहे के शिकंजे जैसी बेमुरव्वत। उसने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया, और उस कत्ल वाली रात के बाद पहली बार, आरंभी ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
जैसे पूरी दुनिया एक पल के लिए रुक गई।
यह वही था। आर्यवर्धन सिंह राणा। वही कातिल। वही शिकारी जिसने उसी बेपरवाही से एक जान ली थी, जिस बेपरवाही से अब उसने आरंभी का हाथ थाम रखा था।