Invisible Drink - 12 in Hindi Spiritual Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 12

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अदृश्य पीया - 12

(कमरे में हल्की नीली रोशनी। खिड़की के बाहर भोर होने को है।)

(सुनीति कौशिक की बाहों में है। उसकी साँसें अब शांत हैं, लेकिन आँखें खुली हुई।)


कुछ आँसू दूसरों के लिए होते हैं… और कुछ आँसू खुद के लिए रोने का साहस देते हैं।

(कौशिक की पकड़ ढीली पड़ती है। वो थककर सो चुका है।)

(सुनीति धीरे से खुद को अलग करती है।)

(वो खिड़की के पास जाकर बैठ जाती है। सामने उगता सूरज, लेकिन उसकी आँखों में अंधेरा।)


सुनीति (अपने आप से, फुसफुसाकर) बोली - 

“मैं मजबूत बनने की कोशिश मे खुद को कब भूल गई… पता ही नहीं चला।”


(उसकी आँखें भर आती हैं, लेकिन इस बार वो आँसू नहीं रोकती।)

(सुनीति दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लेती है।)


सुनीति (रोते हुए) बोली - 

“मुझे डर लगता है…”


(आवाज़ काँपती है।)


“डर लगता है कि अगर मैं टूट गई तो आपको कौन संभालेगा?”


(वो गहरी साँस लेती है।)


“मैं हर किसी के लिए मजबूत बनी रही…लेकिन आज मैं थक गई हूँ।”


(आँसू ज़मीन पर टपकते हैं।)

(सुनीति अपनी छाती पर हाथ रखती है।)


सुनीति बोली - 

“मुझे भी दर्द होता है…मुझे भी सहारे की ज़रूरत है…”


(वो हल्की-सी हँसी हँसती है, आँसुओं के बीच।)


सुनीति बोली - 

“ये बात मैंने आज तक खुद से भी नहीं कही थी।”


(अचानक उसे अपने कंधे पर हल्का-सा स्पर्श महसूस होता है।)

(वो पलटकर देखती है—)


(कौशिक खड़ा है। आँखों में नींद है, पर साथ में चश्मा भी। पर नज़रें पूरी तरह जागी हुई।)


कौशिक (धीरे से) बोला - 

“आज पहली बार तुम अपने लिए रो रही हो…”


(सुनीति कुछ नहीं कहती। बस रोते हुए उसके सीने से लग जाती है।)

(कौशिक उसके बालों में हाथ फेरता है।)


कौशिक बोला - 

“अब हम दोनों एक-दूसरे को बचाएँगे…”


(वो उसके माथे पर हल्का सा किस करता है।)


कौशिक बोला कि 

“तुम सिर्फ़ मेरी ताकत नहीं हो,

सुनीति… तुम मेरी ज़िम्मेदारी भी हो।”


(सुनीति की सिसकियाँ धीरे-धीरे थम जाती हैं।)


उस दिन सुनीति ने पहली बार खुद के लिए रोना सीखा…

और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।

क्योंकि जो इंसान अपने दर्द को स्वीकार कर ले वही किसी और का दर्द सच में समझ सकता है।

सुनीति फिर से नींद में चली गई।


(1 घंटे बाद कमरे में सुबह की धूप फैल रही है। खिड़की से आती रोशनी सुनीति के चेहरे पर पड़ती है।)

(सुनीति की आँख खुलती है। वो देखती है—कौशिक सामने कुर्सी पर बैठा है, चश्मा हाथ में लिए, उसे ध्यान से देख रहा है। सुनीति आश्चर्यचकित की वो बिना चश्मे के दिख रहे हैं। )


सुनीति (घबराकर) बोली - 

“आप… यहाँ क्यों बैठे हैं? आप फिर से गायब तो नहीं—”


कौशिक (मुस्कुराकर, दृढ़ आवाज़ में) बोला - 

“नहीं सुनीति। अब नहीं छुपूँगा।”


(कौशिक उठकर उसके सामने खड़ा हो जाता है। वो साफ दिख रहा है, लेकिन उसकी आवाज़ में सच्चाई है।)


कौशिक बोला - 

“मैंने तुम्हें हर रात चुपचाप रोते देखा है।”


(सुनीति चौंक जाती है।)


सुनीति बोली - 

“आप… देख रहे थे?”


कौशिक (धीरे से) बोला - 

“देख रहा था…पर बोल नहीं पा रहा था।”


(वो उसकी आँखों में देखता है।)


कौशिक बोला - 

“आज वादा करता हूँ—

चाहे मैं दिखूँ या नहीं,

मैं तुम्हारे सामने रहूँगा।

अब तुम्हें अकेले सब कुछ सहने नहीं दूँगा।”


(सुनीति बिस्तर पर बैठ जाती है। आवाज़ भारी है।)


सुनीति बोली - 

“मैं हर दिन इलाज ढूँढती रही…

कभी लैब, कभी फॉर्मूला, 

कभी खुद को दोष देती रही…”


(वो उसकी तरफ देखती है।)


सुनीति बोली - 

“पर सच कहूँ… मैं डरती थी कि अगर इलाज नहीं मिला तो आपको खो दूँगी।”


(कौशिक उसका हाथ थाम लेता है।)


कौशिक बोला - 

“और मैं डरता था कि मेरी वजह से तुम टूट जाओगी।”


(दोनों हाथों में हाथ डाले बैठे हैं।)


कौशिक बोला - 

“इलाज ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है तुम्हारा साथ।”


सुनीति (आँखों में आँसू, हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 

“तो अब हम क्या करेंगे?”


कौशिक बोला - 

“अब हम एक-दूसरे को ठीक करेंगे।”


(वो उसके माथे से माथा लगा देता है।)


कौशिक बोला - 

“तुम मेरी पत्नी हो, मेरी डॉक्टर नहीं।”


(सुनीति हँस पड़ती है, बहुत दिनों बाद।)


सुनीति बोली - 

“और आप मेरे पेशेंट नहीं… मेरे पति हैं।”


(दोनों हँसते हैं। कमरे में हल्कापन भर जाता है।)


कभी-कभी इलाज से पहले साथ चाहिए होता है।

क्योंकि जो रिश्ता दर्द में भी साथ खड़ा रहे—

वही हर बीमारी की सबसे बड़ी दवा होता है।


(रात। कमरा शांत है। सुनीति सो रही है, उसके चेहरे पर थकान के निशान।)


(कौशिक खिड़की के पास खड़ा है। चश्मा टेबल पर रखा है। वो दिखाई दे रहा है… पर बेचैन है।)

कुछ राज़ इलाज से नहीं हिम्मत से बताए जाते हैं।

(कौशिक सुनीति को देखता है। उसकी आँखों में अपराधबोध।)


कौशिक (अपने आप से) बोला - 

“अब और नहीं छुपा सकता....

अगर सच नहीं बताया तो ये रिश्ता अधूरा रह जाएगा।”


(वो गहरी साँस लेता है।)

(सुनीति करवट बदलती है। आँख खुल जाती है।)


सुनीति (धीमे स्वर में) बोली - 

“आप सोए नहीं?”


(कौशिक पलटकर देखता है। उसकी आँखों में कुछ टूटा हुआ।)


कौशिक बोला - 

“सुनीति… मुझे तुमसे ....कुछ कहना है।”


(सुनीति उठकर बैठ जाती है। गंभीर हो जाती है।)

(कौशिक बिस्तर के किनारे बैठ जाता है। नज़रें झुकी हुई।)


कौशिक बोला - 

“जब मैं उस लैब में था…मैं सिर्फ़ शिकार नहीं था।”


(सुनीति चौंकती है।)


सुनीति बोली - 

“मतलब?”


कौशिक (दर्द में) बोला - 

“मैंने वो एक्सपेरिमेंट खुद के ऊपर करने की इजाज़त दी थी।”


(कमरे में सन्नाटा।)


सुनीति (हैरानी से) बोली - 

“क्या…?

आप पागल हो गए थे?”


कौशिक (आवाज़ काँपती हुई) बोला - 

“नहीं…मैं टूट चुका था।”


(वो आँखें बंद कर लेता है।)


कौशिक बोला - 

“माँ–पापा के जाने के बाद मेरे पास खोने को कुछ नहीं था।”


(उसकी आवाज़ भारी हो जाती है।)


कौशिक बोला - 

“मुझे लगा अगर मेरा शरीर किसी काम आ जाए तो शायद ज़िंदगी का मतलब मिल जाए।”


(सुनीति की आँखों में आँसू भर आते हैं।)


कौशिक बोला - 

“जब एक्सपेरिमेंट गलत हुआ और मैं अदृश्य हुआ… 

वो experiment मुझपर किया गया। मैं राजी था। क्योंकि मुझसे झूठ बोला गया था कि मुझे antidote दे दिया जाएगा।

पर मुझे antidote नहीं दिया।

फिर भी  मुझे डर नहीं लगा। क्योंकि कोई life में था ही नहीं।”


(वो सुनीति की ओर देखता है।)


कौशिक बोला - 

“डर तब लगा जब तुम मेरी ज़िंदगी में आई।”


सुनीति (धीरे से) बोली - 

“क्यों?”


कौशिक बोला - 

“क्योंकि अब मैं तुमसे दूरी नहीं चाहता था।”


(कौशिक का हाथ काँपता है।)


कौशिक बोला - 

“मुझे डर था कि अगर तुम जान गई कि मैंने खुद ये सब चुना था…

तो तुम मुझसे नफ़रत करोगी।”


(सुनीति कुछ पल चुप रहती है।)

(सुनीति धीरे से उसका चेहरा पकड़ती है।)


सुनीति (आँखों में आँसू, पर आवाज़ मज़बूत होकर) बोली - 

“नफ़रत नहीं…”


(वो उसके माथे को अपने माथे से लगाती है।)


सुनीति बोली - 

“मुझे आप पर और ज़्यादा प्यार आ रहा है।”


(कौशिक चौंकता है।)


सुनीति बोली - 

“क्योंकि जो इंसान खुद को दाँव पर लगा दे… वो डरपोक नहीं बहुत बहादुर होता है।

हां माना कि आपने गलत किया। पर उसमें सारी गलती आपकी नहीं थी। 

वो लोग अपने वादे से मुकर गए। जिसकी वजह से आप ऐसे बन गए।”


(कौशिक की आँखों से पहली बार आँसू गिरते

हैं।)


कौशिक (टूटकर) बोला - 

“धन्यवाद…ये सच मैंने किसी को नहीं बताया था।”


(सुनीति उसे गले लगा लेती है।)


सुनीति बोली - 

“अब ये बोझ सिर्फ़ आपका नहीं… हमारा है।”


जब सच प्यार के सामने घुटने टेक देता है—

तब रिश्ते और गहरे हो जाते हैं।