(सुबह का वक्त।)
(सुनीति रसोई में खड़ी है। चाय उबल रही है…वो ध्यान में नहीं।)
(चाय उफनकर गिर जाती है।)
सुनीति (खुद से चिड़कर) बोली -
“ध्यान भी नहीं रहता अब…”
(वो गैस बंद कर देती है।)
दिन पर दिन सुनीति का सब्र कम होता जा रहा था।
(कमरे में कौशिक बैठा है। चश्मा लगाए हुए।)
कौशिक बोला -
“सुनीति, आज दवा—”
सुनीति (तेज़ आवाज़ में) बोली -
“बाद में!
अभी मेरे पास टाइम नहीं है।”
(कौशिक चुप हो जाता है।)
(सुनीति को एहसास होता है पर वो कुछ नहीं कहती।)
(रात।)
(कौशिक सो चुका है।)
(सुनीति बाथरूम में बंद।)
(नल खोल देती है ताकि आवाज़ बाहर न जाए।)
(वो दीवार से टिककर बैठ जाती है।)
सुनीति (सिसकते हुए, धीमी आवाज़ में) बोली -
“मैं कुछ भी नहीं कर पा रही…”
“जिस इंसान ने मेरे लिए सब कुछ सहा…”
“मैं उसी को दर्द दे रही हूँ…।”
(आँसू लगातार बह रहे हैं।)
सुनीति बोली -
“मैं कैसी पत्नी हूँ…?”
“न इलाज ढूँढ पा रही हूँ…”
“न उसे चैन से रहने दे रही हूँ…”
(वो अपने मुँह पर हाथ रखकर रोती है।)
(बाथरूम के बाहर…)
(कौशिक खड़ा है। बिना चश्मे के। अदृश्य।)
(वो सब सुन चुका है।)
जिसे वो गुस्सा समझ रहा था… वो बेबसी थी।
(कौशिक दीवार से टिक जाता है।)
कौशिक (मन में) बोला -
“वो मुझसे नहीं…
मेरी हालत से लड़ रही है।”
(सुनीति आँसू पोंछती है।)
(आईना देखती है।)
(खुद को समझाती है।)
सुनीति (खुद से) बोली -
“मज़बूत बनना होगा…”
(वो बाहर आती है।)
(चेहरे पर जबरदस्ती की मुस्कान।)
सुनीति (नॉर्मल बनने की कोशिश में) बोली -
“आप सो जाइए… थक गए होंगे।”
(कौशिक कुछ कहता नहीं।)
(चश्मा पहनता है।)
(दोनों साथ हैं…पर दूरी साफ़ है।)
सुनीति का गुस्सा नफ़रत नहीं था…
वो डर था कि कहीं वो अपने पति को हमेशा के लिए न खो दे।
और कौशिक समझ चुका था—
उसकी खामोशी ही अब उसका सहारा बनेगी।
(रात।)
(कमरे में हल्की पीली रोशनी।)
(कौशिक बिस्तर पर बैठा है। चश्मा पहन रखा है। उसका सिर झुका हुआ है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“फिर से सिर दर्द है ना…”
(कौशिक मना करने के लिए सिर हिलाता है।)
सुनीति (मुस्कराने की कोशिश करते हुए) बोली -
“झूठ मत बोलिए।”
(वो उसके पीछे बैठ जाती है।)
(सुनीति अपनी उँगलियाँ कौशिक के सिर में चला देती है।)
(हल्के-हल्के दबाव।)
दवा नहीं… दर्द को जो सुकून देता था, वो उसके हाथ थे।
(कौशिक की आँखें अपने आप बंद हो जाती हैं।)
कौशिक (धीमी आवाज़ में) बोली -
“बस… अब ठीक है…”
सुनीति बोली -
“थोड़ा और…”
(वो अब उसके कंधे, हाथ…फिर पैर दबाने लगती है।)
(कौशिक कुछ नहीं कहता।)
(कुछ देर बाद…)
(कौशिक गहरी नींद में है।)
(चश्मा टेबल पर रखा है।)
( सुनीति को वो दिख नहीं रहा था पर अहसास था)
(कमरा शांत।)
(सुनीति उसी बिस्तर के कोने पर बैठी है।)
सुनीति (मन में) बोली -
“काश… मैं आपका दर्द खुद ले पाती…”
(वो चुपचाप करवट बदलती है।)
(तकिए में मुँह दबाकर सिसकने लगती है।)
(आँसू रुकते नहीं।)
दिन में वो मज़बूत थी… रात में टूट जाती थी।
(सुनीति धीरे से कौशिक का हाथ पकड़ती है।)
(जैसे डरती हो कि कहीं वो जाग न जाए।)
सुनीति (बहुत धीमी आवाज़ में) बोली -
“मैं हारूँगी नहीं…”
“आपको ठीक करके रहूँगी…”
(कौशिक नींद में हल्का सा उसका हाथ दबा लेता है।)
(सुनीति चौंकती है।)
(फिर हल्की मुस्कान के साथ और ज़ोर से रोने लगती है।)
वो सच्ची लड़की थी…
जो अपने आँसू अपने तक रखती थी… और अपने प्यार को अपने पति की हर साँस में घोल देती थी।
(कमरा अंधेरे में डूबा है। खिड़की से आती हल्की चाँदनी। दीवार घड़ी में रात के 2:47 बज रहे हैं।)
(कौशिक गहरी नींद में है।
सुनीति उसकी तरफ पीठ करके लेटी है।)
(धीरे-धीरे… उसके कंधे हिलने लगते हैं।)
सुनीति (दबी हुई आवाज़ में, तकिये में मुँह दबाकर)
(सिसकियाँ)
“भगवान… मैं थक गई हूँ…”
(वो उठकर बैठ जाती है। आँसू रुक नहीं रहे।)
(सुनीति अपने आँचल से आँखें पोंछती है।)
सुनीति (फुसफुसाकर) बोली -
“दिन भर मुस्कुरा लेती हूँ…ताकि आपको लगे सब ठीक है…”
(वो पीछे मुड़कर खाली बिस्तर को देखती है जिसपे अदृश्य कौशिक सो रहा था—)
सुनीति बोली -
“पर रात…रात मुझसे झूठ नहीं बोल पाती।”
(वो हाथ बढ़ाती है फिर खुद को रोक लेती है।)
सुनीति बोली -
“आपके दर्द का इलाज नहीं ढूँढ पा रही…
और ऊपर से आपको डाँट देती हूँ…”
(आँसू फिर बहने लगते हैं।)
(कौशिक की भौंहें हिलती हैं। वो नींद में करवट बदलता है।)
(अचानक— उसके कानों में सुनीति की सिसकी साफ़ पड़ती है।)
कौशिक (नींद में बड़बड़ाते हुए) बोला -
“सु…नीति…?”
(वो धीरे से आँखें खोलता है। कमरे में हल्की रोशनी है।)
(और… वो देख लेता है।)
(सुनीति ज़मीन पर बैठी है। उसका सिर घुटनों में दबा हुआ। आँचल भीग चुका है।)
(कौशिक सन्न रह जाता है।)
कौशिक (अंदर ही अंदर) बोला -
“ये… ये तो हर रात का दर्द है…”
(उसके हाथ काँपने लगते हैं।)
सुनीति (रोते हुए, बिना देखे) बोली -
“अगर मैं तुम्हें ठीक नहीं कर पाई तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी…”
(कौशिक की आँखों में आँसू भर आते हैं।)
(कौशिक चुपचाप उठता है। चश्मा लगता है। धीरे से सुनीति के पास जाता है।)
(वो उसके सामने बैठ जाता है।)
कौशिक (काँपती आवाज़ में) बोला -
“तुम… हर रात ऐसे रोती हो?”
(सुनीति चौंककर ऊपर देखती है।)
सुनीति बोली -
“क…कौशिक जी?
आप जाग रहे थे?”
(वो जल्दी से आँसू पोंछने लगती है।)
सुनीति बोली -
“नहीं… कुछ नहीं… बस—”
(कौशिक उसे रोक लेता है।)
(कौशिक पहली बार उसके सामने घुटनों पर बैठ जाता है।)
कौशिक बोला -
“मैं बीमार नहीं था, सुनीति…”
(उसकी आवाज़ टूट जाती है।)
कौशिक बोला -
“मैं अंधा था…जो तुम्हारे आँसू नहीं देख पाया।”
(वो सुनीति के हाथ पकड़ लेता है।)
वो बोला -
“तुमने मेरे लिए खुद को हर रात तोड़ा और मैं…”
(वो रो पड़ता है।)
(सुनीति कुछ कह नहीं पाती। कौशिक उसे अपने सीने से लगा लेता है।)
कौशिक (सिसकते हुए) बोला -
“अब नहीं रोओगी अकेले… अब तुम्हारा दर्द भी मेरा है।”
(सुनीति की आँखें बंद हो जाती हैं। पहली बार— उसका रोना शांत होता है।)
उस रात कौशिक ने सुनीति के आँसू देख लिए…और उसी पल
वो सच में ठीक होना शुरू हुआ।
क्योंकि जब कोई किसी का दर्द देख लेता है तो अदृश्यपन
अपने आप खत्म होने लगता है।
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