शक्कर और आंसू
राठौर मेंशन का किचन (रसोई) सान्वी के माता-पिता के घर से भी बड़ा था। रसोई के चारों तरफ चमकती हुई स्टील की मशीनें, बड़े-बड़े ओवन और एक ऐसा फ्रिज जिसमें शायद एक महीने का राशन आ सकता था। सान्वी चौखट पर खड़ी थी, और उसे अंदर पैर रखने में भी झिझक हो रही थी। यह घर की रसोई कम और किसी फाइव स्टार होटल ज्यादा लग रहा था।
किचन के हेड कुक, जिन्हें सब 'महाराज जी' कहते थे, ने सान्वी को देखकर सम्मान से सिर झुकाया।
"नमस्ते बहू रानी। दादी माँ ने बताया कि आज आपकी रसोई की रस्म है। मैंने सारा सामान निकाल दिया गया है। गाजर काटकर रखे हैं, और मावा, ड्राई फ्रूट्स, सब तैयार है। आपको बस..."
अभी महाराज जी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि किचन में 'क्लिक-क्लिक' करती हुई हील्स की आवाज़ गूंजी। सान्वी ने मुड़कर देखा। यह आर्यन की चाची, शीतल राठौर थीं।
शीतल की उम्र 45 के आसपास रही होगी, लेकिन उनके मेकअप और डिज़ाइनर साड़ी ने उनकी उम्र को छिपा दिया था। उनके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान थी, जो आंखों तक नहीं पहुँच रही थी।
"महाराज जी," शीतल ने अपनी नज़र सान्वी पर डाली और फिर कुक की ओर मुड़ीं, "बहू रानी को सब कुछ तैयार करके क्यों दे रहे हो? रस्म का मतलब होता है कि मेहनत करना। आपको मालूम होना चाहिए कि सान्वी जिस... 'बैकग्राउंड' से आती है, वहाँ शायद इतना शुद्ध घी और काजू-बादाम इस्तेमाल करने की आदत न हो। कहीं हलवे की जगह कुछ और न बन जाए।"
सान्वी का चेहरा शर्म से लाल पड़ गया। यह तंज सीधा उसकी गरीबी पर किया गया था। शीतल चाची ने अपनी मीठी आवाज़ में, ज़हर वाले शब्दों ने उसे याद दिला दिया कि उसकी इस घर में क्या औकात है।
सान्वी ने धीमे से गहरी सांस ली और अपनी भावनाओं को काबू में किया। उसने बहुत ही विनम्रता से, लेकिन दृढ़ आत्मविश्वास से जवाब दिया, "चाची जी, स्वाद अमीरी या गरीबी से नहीं, बल्कि नीयत और प्यार से आता है। मेरी माँ कहती हैं कि अगर बनाने वाले का मन साफ़ हो, तो रूखी सूखी रोटी में भी स्वाद आ जाता है।
आप चिंता न करें, मैं कोशिश करुंगी कि आपको शिकायत का कोई भी मौका न मिले।"
शीतल के चेहरे की पहले की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई। उसे जरा सी भी उम्मीद नहीं थी कि यह गरीब घर की सीधी-सादी दिखने वाली लड़की पलटकर जवाब भी दे सकती है। वह अपनी नाक सिकोड़कर कहा, "हम्म
देखते हैं। कि वैसे भी आर्यन को खाने में कोई कमी पसंद नहीं है। अगर स्वाद थोड़ा भी बिगड़ा, तो वह खाना छोड़ देता है।"
यह कहकर वह शान से वहां से चली गईं।
सान्वी ने गैस पर कढ़ाई रखी। जैसे ही उसने अपने हाथ में पलटा लिया, उसे अपनी माँ की याद आ गई। वह अक्सर त्योहारों पर माँ की मदद के लिए गाजर घिसती थी। तब उनके पास डालने के लिए ज़्यादा मेवे (काजू-किशमिश) नहीं होते थे, फिर भी माँ के हाथ के स्वाद की वजह से वह हलवा दुनिया में सबसे अच्छा लगता था।
आज कढ़ाई में घी तो बहुत था, पर मन में एक डर भी था। आंसू की एक बूंद उसकी पलकों पर आ अटकी, जिसे उसने जल्दी से पोंछ लिया। आज उसे रोना नहीं था। आज उसे साबित करना था कि भले ही उसे खरीदा गया हो, पर उसका हुनर बिकाऊ नहीं है।
ऊँची इमारत, कठोर स्वभाव
शहर के दूसरी तरफ, 'राठौर कॉर्प' की 40 मंज़िला इमारत के सबसे ऊपर वाले मीटिंग रूम में बहुत ज़्यादा तनाव था। आर्यन राठौर अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठा था। उसके सामने लंबी मेज पर कंपनी के बड़े अधिकारी (डायरेक्टर्स) बैठे थे। वहाँ का माहौल इतना गंभीर था कि हर कोई बहुत डरा हुआ और बेचैन महसूस कर रहा था।
आर्यन के ठीक सामने मिस्टर खन्ना बैठे थे, जो आर्यन के पिता के समय से कंपनी में थे और आर्यन के सबसे बड़े आलोचक। खन्ना ने अपनी फाइल मेज पर पटकी।
आर्यन के ठीक सामने मिस्टर खन्ना बैठे थे। वे आर्यन के पिता के समय से कंपनी में काम कर रहे थे और आर्यन की हर बात में कमियां निकालते थे। खन्ना ने अपनी फाइल मेज पर पटकी और कहा:
"आर्यन, यह शादी का क्या नाटक है? तुमने कल अचानक बिना किसी को बताए शादी कर ली? बाहर हर तरफ इसी की चर्चा हो रही है। शेयर होल्डर्स जानना चाहते हैं कि वह लड़की कौन है और किस खानदान से है? सच तो यह है कि हमें डर लग रहा है कि तुम्हारी इस शादी की वजह से कंपनी की इज्जत कम हो जाएगी।"
आर्यन ने बहुत शांति से अपनी पेन की निब को देखा, फिर अपनी ठंडी और आंखों की तेज नजरों से खन्ना की ओर देखा।
"मिस्टर खन्ना," आर्यन की आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें इतना दबदबा था कि पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। "दादाजी की वसीयत में यह शर्त थी कि चेयरमैन पद पर बने रहने के लिए मुझे शादी करनी पड़ेगी। मैंने शादी कर ली है। वसीयत में कहीं भी यह नहीं लिखा था कि लड़की चुनने के लिए मुझे आप लोगों की सलाह लेनी होगी।"
खन्ना ने आर्यन की तरफ देखा और चिढ़कर कहा
"लेकिन उस लड़की का बैकग्राउंड क्या है? हमने सुना है कि वह एक साधारण सी.."
"वह मेरी पत्नी है!" आर्यन ने मेज पर हाथ मारते हुए इतनी जोर से कहा कि खन्ना चुप हो गए।
"मिस्टर खन्ना, राठौर ग्रुप का चेयरमैन मैं हूँ। मैंने बोर्ड को अपने निजी फैसलों पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं दिया है। अगर कल तक कंपनी के शेयर थोड़े भी गिरे, तो मैं उन्हें संभाल लूंगा। लेकिन अगर किसी ने मेरी पत्नी के बारे में बेकार की बातें कीं, तो मैं उसे तुरंत कंपनी से निकाल दूँगा। मीटिंग खत्म।"
आर्यन वहाँ से उठा और बाहर निकल गया।
अपने केबिन में कदम रखते ही जैसे उसने चेहरे से वह सख्त मुखौटा उतार फेंका। दरवाजा बंद करते ही उसकी देह की अकड़न ढीली पड़ गई। उसने बेचैनी में अपनी टाई की गांठ खोली और निढाल सा सोफे पर जा गिरा। अपनी उंगलियों से वह अपने माथे की नसों को दबाने लगा।
उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। खन्ना की बातें कड़वी थीं, पर सच थीं दबाव वाकई बहुत गहरा था। उसके दुश्मन, चाहे वो सेठी ग्रुप हो या सिंघानिया, बस इसी ताक में बैठे थे कि आर्यन से एक चूक हो और वे उसे बर्बाद कर दें।
उसने यह शादी सिर्फ अपनी कंपनी और विरासत को बचाने के लिए की थी, लेकिन अब यही फैसला उसके लिए जी का जंजाल बनता जा रहा था। उसे पूरी दुनिया के सामने इस दिखावटी रिश्ते को सच साबित करना था, और यह चुनौती किसी भी बड़ी बिजनेस डील से कहीं ज्यादा मुश्किल और थका देने वाली थी।
खाने की मेज पर परीक्षा
रात के खाने का वक्त हो चुका था। डाइनिंग टेबल पर बर्तनों की हल्की आवाजें सुनाई दे रही थीं। परिवार के सभी लोग एक साथ अपनी अपनी कुर्सियों पर बैठ चुके थे। दादी माँ हमेशा की तरह मेज के सबसे ऊपरी हिस्से पर बैठी थीं। आर्यन भी दफ्तर से वापस चुका था। वह काफी थका हुआ लग रहा था और खामोशी से अपनी कुर्सी पर बैठा मोबाइल देख रहा था।
तभी सान्वी एक बड़े बर्तन में गरम हलवा लेकर आई। उसके हाथों में एक घबराहट थी, जो साफ नजर आ रही थी। सान्वी ने सबसे पहले दादी माँ की कटोरी में हलवा परोसा। जैसे ही दादी ने एक चम्मच हलवा अपने मुँह में रखा, उन्होंने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई, जिसे देखकर सान्वी की जान में जान आई
दादी माँ ने बड़े प्यार से कहा, "अरे वाह! सान्वी बेटा, यह तो बिल्कुल वैसा ही स्वाद है जैसा बरसों पहले मेरी माँ के हाथों में हुआ करता था। बहुत ही लाजवाब हलवा बनाया है तुमने। इसमें सिर्फ शक्कर की मिठास नहीं है, बल्कि तुम्हारे हाथों का जादू और अपनापन भी साफ महसूस हो रहा है।"
दादी की बातें सुनकर सान्वी के चेहरे पर सुकून छा गया और उसकी सारी घबराहट मुस्कान में बदल गई।
इसके बाद सान्वी ने बुआ और चाची की कटोरियों में हलवा डाला। शीतल चाची ने बड़ी बेरुखी से हलवे को देखा और एक छोटा सा चम्मच चखा। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि हलवे में कोई न कोई कमी जरूर निकलेगी, लेकिन जैसे ही स्वाद उनकी जुबान तक पहुँचा, वह दंग रह गईं। हलवा वाकई बहुत स्वाद बना था।
शीतल चाची ने मन मारकर कहा, "हूँ... ठीक ही है। लेकिन घी कुछ ज्यादा ही डाल दिया है, क्या सबका स्वास्थ्य खराब करने का इरादा है?"
बुआ जी ने भी उनकी बातों में हाँ मिलाते हुए कहा, "बात तो सही है, आजकल लोग अपनी सेहत का इतना ख्याल रखते हैं, भला इतना मीठा कौन खाता है?"
उनकी बातें सुनकर सान्वी का मन एकदम उदास हो गया। उसे लगने लगा कि शायद उससे वाकई कोई बड़ी गलती हो गई है।
तभी सन्नाटे को तोड़ते हुए आर्यन ने अपनी खाली कटोरी मेज पर रखी। सबका ध्यान उसकी तरफ खिंचा चला गया। आर्यन ने किसी की तरफ देखा तक नहीं, बस खामोशी से अपनी कटोरी सान्वी की तरफ बढ़ा दी।
सान्वी की धड़कनें तेज हो गईं। उसने कांपते हाथों से आर्यन की कटोरी में हलवा परोसा। जैसे ही आर्यन ने पहला निवाला मुँह में लिया, सान्वी की सांसें मानो अटक सी गईं। वह जानती थी कि आर्यन को खुश करना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।
आर्यन ने एक के बाद एक दो-तीन चम्मच हलवा खाया। उसने सान्वी की ओर देखा तक नहीं, बस अपनी चाची की तरफ नज़रें घुमाईं और बड़े शांत लेकिन सख्त लहजे में कहा, "चाची, जिसे अपनी सेहत की इतनी फिक्र है, वो सलाद खा सकता है। मुझे अपने घर के खाने में घी और स्वाद की कंजूसी बिल्कुल पसंद नहीं है। और रही बात मिठास की... तो चीनी एकदम सही है।"
आर्यन के मुँह से निकले ये शब्द किसी बड़ी तारीफ से कम नहीं थे। सच तो यह था कि उसने सान्वी की बड़ाई नहीं की थी, बल्कि दूसरों की कड़वी बातों को चुप करा दिया था। लेकिन सान्वी के लिए तो इतना ही काफी था। उसके मुरझाए हुए चेहरे पर फिर से रौनक आ गई।
दादी माँ ने गर्व से मुस्कुराते हुए कहा, "देखा विमला, मैंने कहा था न? मेरे पोते को आखिर बहू के हाथ का स्वाद पसंद आ ही गया। अब जाकर मेरे दिल को तसल्ली मिली है।"
आर्यन ने खाना खत्म किया और बिना कुछ और कहे उठकर अपने कमरे में चला गया। सान्वी उसे जाते हुए देखती रही। यह आदमी अजीब था एक पल में दुनिया का सबसे क्रूर इंसान लगता था, और दूसरे ही पल सबके सामने उसका बचाव कर जाता था। क्या यह सब सिर्फ दादी के लिए नाटक था? या उस पत्थर के दिल में कहीं कोई कोना था जो धड़कता था?
दो दुनियाओं के बीच
रात के ग्यारह बज चुके थे। सान्वी ने किचन का काम खत्म किया और अपने कमरे में आई। आर्यन सोफे पर बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था। कमरे में वही सन्नाटा था जो कल रात को था।
सान्वी ने हिम्मत जुटाई।
"वो... मुझे पूछना था कि..."
आर्यन ने स्क्रीन से नज़र हटाए बिना कहा, "तुम्हारी माँ को होश आ गया है। मैंने डॉक्टर से बात की थी। हालत स्थिर है। कल शाम को ड्राइवर तुम्हें हॉस्पिटल ले जाएगा। एक घंटा मिल लेना।"
सान्वी को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। वह यही पूछने वाली थी, लेकिन आर्यन ने उसके पूछने से पहले ही जवाब दे दिया।
"शुक्रिया..." सान्वी ने धीमे स्वर में कहा।
आर्यन रुका। उसने लैपटॉप बंद किया और सान्वी की तरफ देखा।
"शुक्रिया की ज़रूरत नहीं है। यह 'डील' का हिस्सा है। तुम यहाँ अपना काम कर रही हो, मैं वहां अपना काम कर रहा हूँ। इसमें एहसान जैसा कुछ नहीं है।"
उसने फिर से तकियों की वह दीवार बिस्तर पर बना दी थी।
लाइट बंद कर देना," आर्यन ने बस इतना कहा और दूसरी तरफ करवट लेकर लेट गया।
सान्वी बिस्तर के अपने हिस्से पर लेट तो गई, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान तक नहीं था। वह आज हुई एक-एक बात के बारे में सोच रही थी। चाची के वे तीखे ताने, दादी माँ का निस्वार्थ प्यार, और फिर आर्यन का वह रूखा सा बर्ताव, जिसमें अनचाहे ही सही, पर उसका बचाव छिपा था।
आज उसे इस बात का एहसास हो गया था कि उसकी लड़ाई सिर्फ बाहर की दुनिया से नहीं है। इस घर की चारदीवारी के भीतर भी एक जंग चल रही थी खुद की जगह बनाने की और अपने आत्मसम्मान को बचाए रखने की।
कल माँ से मिलने की उम्मीद ने ही उसके मन को बड़ी राहत दी थी। लेकिन साथ ही, उसे यह भी समझ आ गया था कि आर्यन राठौर को समझना इतना आसान नहीं है। वह एक ऐसी अनसुलझी पहेली की तरह है, जिसके कई पन्ने अब भी बंद थे। और न चाहते हुए भी, सान्वी अब उस पहेली का एक अहम हिस्सा बन चुकी थी।
बाहर हवा की रफ्तार तेज हो रही थी, और कमरे के अंदर पसरी वह खामोशी न जाने क्यों किसी शोर की तरह महसूस हो रही थी। सान्वी ने अपनी आँखें मूंद लीं। वह जानती थी कि आने वाला कल अपने साथ एक नई चुनौती लेकर खड़ा है।
लेखक की एक छोटी सी बात:
नमस्ते दोस्तों! उम्मीद है आपको सान्वी और आर्यन की यह अनोखी कहानी पसंद आ रही होगी। इस कहानी के जरिए मैं यह दिखाना चाहता हूँ कि हर इंसान के व्यवहार के पीछे कोई न कोई वजह होती है। आर्यन विलेन नहीं है, बस परिस्थितियों ने उसे ऐसा बना दिया है।
कहानी को अपना प्यार देने के लिए शुक्रिया! अगर आप सान्वी की इस जंग में उसके साथ जुड़ना चाहते हैं, तो मुझे फॉलो जरूर करें ताकि आने वाले रोमांचक अध्यायों का अपडेट आपको सबसे पहले मिले। अगला अध्याय बहुत जल्द!