Sode ka Sindoor - 2 in Hindi Drama by Anil singh books and stories PDF | सौदे का सिन्दूर - भाग 2

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सौदे का सिन्दूर - भाग 2

संगमरमर की ठंडक 


राठौर मेंशन का वह विशालकाय लोहे का द्वार किसी भूखे अजगर के जबड़ों की तरह धीरे-धीरे खुला। मूसलाधार बारिश के बूंदो को चीरती हुई काली मर्सिडीज ने धीरे से भव्य परिसर में प्रवेश किया। वहां एक अजीब-सी 'जानलेवा खामोशी' दिख रही थी, जिसे केवल विंडस्क्रीन पर चलते वाइपरों की रगड़ और आसमान में गूंजती बादलों की गर्जना ही चुनौती दे पा रही थी।

पिछली सीट के कोने में बैठी सान्वी की सांसें अटकी हुई थीं। उसकी बनारसी साड़ी का भीगा हुआ पल्लू उसके शरीर में एक अजीब सीहरन पैदा कर रहा था। यह ठंड बाहर के वातावरण का नहीं, बल्कि उस अनजाने डर का खौफ था जो उसके सीने में बैठ चुका था। बाहर गिरती हुई  हर बूंद उसे आने वाले कल की अनिश्चितता का एहसास करा रही थी।
गाड़ी घर के पोर्च में नीचे आकर रूकी। ड्राइवर ने जल्दी से उतरकर गाड़ी से काला छाता निकाल कर ताना और पिछला दरवाजा जल्दी से झटके से खोला।
पर वह दरवाजा सान्वी के तरफ का नहीं खुला बल्कि आर्यन की तरफ का खुला।
आर्यन उतरा। उसने अपने कोट को ठीक किया और बिना पीछे मुड़े या सान्वी का इंतज़ार किए, घर के मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गया। सान्वी कुछ पल के लिए असमंजस में पड़ गई। क्या उसे उतरना चाहिए? या कोई उसे लेने आएगा?
उसने अपने आप को समझाया— 'सान्वी, अब तुम इस घर की मेहमान नहीं हो, और न ही यह कोई परीकथा है जहाँ राजकुमार हाथ बढ़ाकर तुम्हें उतारेगा। यह कागजों का सौदा है, और सौदे में सम्मान नहीं होता।'
उसने भारी मन से दरवाजा खोला। ठंडी हवा के एक लहर ने उसके चेहरे को स्पर्श किया। उसने अपना लहंगा और भींगे हुऐ पल्लू को संभालते हुए गाड़ी से नीचे कदम रखा। बारिश की बुंदे छत के किनारे से होकर उसके कंधों में पड़ी साड़ी को गीला कर रही थीं। वह जल्दी से लड़खड़ाते कदमों से उस आलीशान महल की सीढ़ियाँ की ओर जाने  लगी, जहाँ पर आर्यन पहले ही अंदर जा चुका था।
दृश्य 1: सूना स्वागत
अंदर की ओर कदम रखते ही सान्वी की आँखें फटी रह गईं। यह घर नहीं था, यह पत्थरों का एक विशाल संग्रहालय था। छत इतनी ऊँची थी कि गर्दन दुख जाए, और फर्श इटालियन मार्बल का था जो शीशे की तरह चमक रहा था। बीच में एक विशाल झूमर लगा था, जिसकी हजारों क्रिस्टल लाइट्स किसी की भी आँखों को चकाचौंध करने के लिए काफी थीं।
लेकिन इतनी रोशनी होने के बावजूद, वहाँ अंधेरा सा महसूस हो रहा था।
सान्वी ने फिल्मों में देखा था कि जब घर में नई बहू कदम रखती है, तो जोर-जोर से ढोल बजते हैं, सिर पर फूलों की वर्षा होती है, और घर की औरतें आरती की थाली लेकर बहू के लिए खड़ी होती हैं। उसने अनजाने में अपनी नजरें चारों ओर घुमाईं।
वहाँ कोई नहीं था।न कोई रिश्तेदार, न कोई हंसी-ठिठोली, न कलश गिराने की रस्म। न किसी प्रकार की चहल कदमी 
सिर्फ दूर खड़ी एक अधेड़ उम्र की महिला थी, जिसने सफेद और ग्रे रंग की हाउसकीपिंग यूनिफॉर्म पहनी थी, हाथों को बांधे खड़ी थी। उसके चेहरे पर सख्त अनुशासन था।
आर्यन छत की सीढ़ियों के पास खड़ा था, अपनी शेरवानी के बटन खोलते हुए। उसने उस महिला की ओर इशारा किया।
"कावेरी, इन मैडम को मेरे कमरे तक ले जाओ। और हाँ, ध्यान रहे, कि दादी माँ को सुबह तक पता नहीं चलना चाहिए कि हम लोग आ गए हैं। उनकी तबीयत ठीक नहीं है, मैं नहीं चाहता कि उनकी नींद खराब हो।"
उसने सान्वी की तरफ एक नजर देखे बिना ही हवा में आदेश दिया, जैसे वह किसी समान को सही जगह रखने का निर्देश दे रहा हो।
कावेरी ने सान्वी की ओर देखा और एक रूखी सी नमस्ते की। "आइए मैम।"
सान्वी ने सूखे गले से उसने हिम्मत करके पूछा, "क्या... कोई गृह-प्रवेश की रस्म नहीं होगी?"
आर्यन, जो सीढ़ियां चढ़ने ही वाला था, रुक गया। उसने मुड़कर सान्वी की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन और होठों पर एक कड़वी मुस्कान थी।
"रस्में तो शादियों में निभाई जाती हैं, सान्वी। और जैसा कि नताशा ने तुम्हें बताया होगा... कि यह एक 'समझौता' है। इस घर में मेरी पत्नी होने का नाटक सिर्फ दुनिया के सामने करना है, इन चार दीवारों के अंदर ऐसा कुछ नहीं करना। अपने कमरे में जाओ।"
फिर वह तेजी से सीढ़ियां चढ़ गया, उसके जूतों की 'ठक-ठक' उस सन्नाटे में गूंजती रही। सान्वी खड़ी हुई अपनी ही जगह पर जमी रही, यह अपमान का कड़वा घूँट पीती हुई।
  
दृश्य 2:अजनबियों का कमरा
कावेरी ने उसे दूसरी मंजिल पर ले गई और वह पर एक विशाल डबल-डोर दरवाजे के सामने खड़ी हो गई।
"यह आर्यन सर का रूम है। आज से यह आपका भी रूम है।"
दरवाजा खुला। सान्वी ने अंदर कदम रखा और एक बार फिर हैरान रह गई। कमरा किसी फाइव स्टार होटल के सुइट से भी बड़ा था। गहरे भूरे और ग्रे रंग की दीवारों पर मॉडर्न आर्ट की पेंटिंग्स लगी थीं। कमरे के बीचों-बीच एक विशाल 'किंग साइज' बेड था। कमरे का तापमान इतना ठंडा था कि सान्वी की कंपकंपी छूट गई।
कावेरी ने दरवाजा बंद करके चली गई। अब वह उस कमरे में अकेली थी और उस व्यक्ति के साथ, जो अब कागजों पर उसका पति था।
आर्यन वॉशरुम से बाहर निकला। उसने अपनी शेरवानी उतार के पास में रखे टेबल में रख दिया और अब अपने कपड़े चेंज करके वह एक सिंपल ब्लैक टी-शर्ट और पजामा में था। वह अपने हाथ तौलिए से सिर पोंछ रहा था। उसने सान्वी की ओर देखा, जो अभी भी दरवाजे के पास अपनी दुल्हन की साड़ी और गहनों के बोझ से लदी खड़ी थी। वह बारिश में भीगने की वजह से उसका शरीर कांप रहा था।
आर्यन ड्रेसिंग टेबल की ओर गया और हाथ की कलाई से घड़ी उतारकर रखते हुए शीशे में सान्वी की और देखकर बात की।
"वहाँ दूर दरवाजे पर मूर्ति बनकर खड़े रहने की ज़रुरत नहीं है। उस तरफ ड्रेसिंग रूम है, वहां तुम्हारे लिए कपड़े रख दिए गए हैं। जाकर बदल लो। मुझे गीले कपड़ों से अपना सोफा खराब करने का शौक नहीं है।"
सान्वी ने अपने हाथों की मुट्ठी को जोर से भींची। उसकी आंखों में आंसू आने को बेताब थे, लेकिन उसने उन्हें रोक लिया। वह चुपचाप ड्रेसिंग रूम की ओर बढ़ी।
वहाँ उसके नाप के कई सारे डिज़ाइनर कपड़े टंगे थे—महंगे नाइटवियर, साड़ियाँ, सूट्स। सब कुछ नया, सब कुछ महंगा। लेकिन सान्वी ने उनमें से सबसे साधारण सूती कुर्ता और पजामा चुना। वह उस मखमली कैद में खुद को जितना हो सके, साधारण रखना चाहती थी।
जब उसने अपने गहने उतारे—गले का हार, कान के झुमके, भारी कंगन—तो उसे लगा जैसे वह कोई जंजीर उतार रही है। लेकिन जब उसकी नजर अपनी मांग पर पड़ी, जहाँ गहरा लाल सिन्दूर अभी भी चमक रहा था, तो उसका हाथ अपने आप रुक गया। यह एक ऐसा दाग था जिसे वह पानी से नहीं धो सकती थी।
दृश्य 3: तकियों की दीवार
जब सान्वी कपड़े बदलकर बाहर आई, तो आर्यन बिस्तर के एक किनारे पर बैठकर लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। कमरे में सिर्फ कीबोर्ड की 'कट-कट' की आवाज़ थी।
सान्वी अनमने ढंग से कमरे के बीच में खड़ी हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए। क्या वह सोफे पर सोये? या फर्श पर?
आर्यन ने बिना सर उठाए कहा, "बिस्तर पर सो जाओ।"
सान्वी चौंक गई। "जी?"
आर्यन ने लैपटॉप बंद किया और उसे साइड टेबल पर रखा। उसने एक लंबी सांस ली और सान्वी की आँखों में सीधे देखा।
"देखो सान्वी, मेरे पास इतना फालतू वक्त नहीं है और ना ही मुझे शौक लगा है कि मैं रोज सुबह नौकरों को सफाई दूं कि मेरी पत्नी सोफे पर क्यों सो रही थी। अगर दादी माँ या किसी भी स्टाफ ने तुम्हें सोफे पर सोते देख लिया, तो मेरे लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। और मुझे अपनी लाइफ में ड्रामा पसंद नहीं है।"
सान्वी ने कुछ नहीं बोली। वह धीरे-धीरे, डरते हुए बिस्तर के दूसरे कोने की ओर बढ़ी। वह गद्दा इतना नरम था कि उसे लगा वह उसमें धंस जाएगी।
जैसे ही वह बिस्तर पर बैठी, आर्यन ने पास पड़े दो बड़े तकिए (Pillows) उठाए।
उसने उन तकियों को बिस्तर के ठीक बीचों-बीच, एक दीवार की तरह खड़ा कर दिया।
"यह..." आर्यन ने उन तकियों पर हाथ फेरते हुए कहा, "...यह हमारा 'बॉर्डर' है। इस लाइन के उस पार तुम हो, और इस पार मैं। न तुम इधर आओगी, न मैं उधर आऊंगा। इस कमरे के बाहर हम 'पति-पत्नी' हैं, लेकिन इस कमरे के अंदर हम सिर्फ दो अजनबी हैं जिन्हें मजबूरी में एक छत के नीचे रहना पड़ रहा है।"
उसने लाइट बंद कर दी, सिर्फ एक बेडसाइड लैंप जल रहा था जिसकी मद्धम रोशनी उन दोनों के बीच खड़ी 'तकियों की दीवार' पर पड़ रही थी।
"गुड नाइट," आर्यन ने रूखेपन से कहा और करवट लेकर सो गया। उसकी पीठ सान्वी की तरफ थी।
सान्वी उस विशाल बिस्तर के एक छोटे से कोने में सिमट गई। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, खिड़कियों के शीशों पर पानी की बूंदें किसी के आंसुओं की तरह बह रही थीं। उसने अपनी माँ के बारे में सोचा, जो अस्पताल के ठंडे बिस्तर पर होंगी। कम से कम उनकी जान बच गई—यही सोचकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
लेकिन नींद कोसों दूर थी। उसके ठीक बगल में, बस एक तकिए की दूरी पर, वह आदमी सो रहा था जिसने उसकी दुनिया खरीद ली थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि सान्वी को आर्यन की सांसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी, जो उसे बार-बार याद दिला रही थी कि अब उसकी ज़िंदगी उसकी अपनी नहीं रही।
यह उसकी सुहागरात थी—बिना फूलों के, बिना प्यार के, और बिना किसी उम्मीद के। बस अंधेरा, ठंडक और एक दीवार।