भाग-3 : दादी माँ का आशीर्वाद और झूठा दिखावा
सूरज की पहली किरणें पर्दों से होते हुए कमरे में दाखिल हुईं और सीधे सान्वी की आंखों पर पड़ीं। सान्वी जल्दी से उठ कर बैठ गई। कुछ समय के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है। यह उसका छोटा सा, नमी वाला कमरा नहीं है, और न ही बाहर से दूध वाले की साइकिल की घंटी की आवाज़ नहीं आ रही थी। तभी उसकी नजर बिस्तर की दूसरी तरफ गई तभी वह अपने होश में आई और उसे कल रात की बातें याद आई की यह उसके सामने 'तकियों की दीवार' क्यों खड़ी थी, लेकिन बिस्तर की दूसरी तरफ का हिस्सा खाली क्यों था। क्या आर्यन ऑफिस चला गया। क्या वह बहुत देर तक सोती रह गई है।
तभी सान्वी की नजर दीवार की तरफ गई और उसने राहत की सांस ली और दीवार घड़ी की ओर देखा—सुबह के सात बज रहे थे। वह जल्दी से बिस्तर से उतरी। आज उसकी शादी की पहली सुबह थी, वह सुबह जब एक नई दुल्हन के चेहरे पर शर्म और खुशी की लाली होनी चाहिए। लेकिन जब सान्वी ने ड्रेसिंग टेबल के बड़े शीशे में अपना चेहरा देखा, तो उसे वहां सिर्फ़ थकान और आँखों के नीचे काले घेरे दिखाई दिए। उसकी मांग का सिन्दूर अब फैला हुआ था, जो उसके माथे पर किसी सुहाग के निशान के बजाय किसी जख्म जैसा लग रहा था।
तभी हल्की सी आवाज आई पलट कर देखा तो बाथरूम का दरवाजा खुला और आर्यन बाहर आया। वह नहा चुका था और सफेद शर्ट और डार्क ब्लू ट्राउजर में तैयार था। वह आईने के सामने बड़े ध्यान से अपनी कमीज की बटन (कफ़लिंक्स) लगा रहा था और उसने बहुत अच्छी खुशबू वाला परफ्यूम लगाया हुआ था। वह तो बिल्कुल वैसा ही दिख रहा है जैसे मैगजीन के कवर पर कोई हीरो की फोटो होती है एकदम परफेक्ट, जिससे बात करने में भी हिम्मत ना पड़े। जैसे ही उसकी नज़र शीशे के जरिए सान्वी पर पड़ी, सान्वी की धड़कनें तेज़ हो गईं और उसने झटपट अपनी चुनरी ठीक की।
गुड मॉर्निंग, मिसेज राठौर। उम्मीद है कि आपको रात को नींद ठीक से आई होगी," आर्यन ने बिना पीछे मुड़े ही शीशे की तरफ देखते हुए बोला। उसकी आवाज़ एकदम सपाट थी, उसमें कोई भावनाऐं नहीं थी जैसे वह किसी जीवनसाथी से नहीं बल्कि ऑफिस के किसी कर्मचारी से काम की बात कर रहा हो।
तभी उसके पास ही रखें मेज पर एक बैग की तरफ इशारा करते हुए रूखेपन से कहा, "उस बैग में एक साड़ी है। अगले पंद्रह मिनट में तैयार होकर नीचे आ जाना है। इस समय पर दादी माँ पूजा कर होगी। और वह चाहती हैं कि हम सब एक साथ नाश्ता करें, इसलिए देर मत करना।"
तभी सान्वी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। आर्यन की इस बेरुखी ने उसे अंदर तक हिलाकर रख दिया। उसने कांपते हुए होंठों से बस इतना पूछा, "मेरी माँ... वो कैसी हैं?"
आर्यन ने अब सान्वी की तरफ मुड़कर देखा और अपनी हाथों की कलाई में घड़ी पहनते हुए बड़े शांत लहजे में कहा, "ऑपरेशन कामयाब रहा। अभी डॉक्टर उनकी देखभाल कर रहे हैं और उम्मीद है कि शाम तक उन्हें होश आ जाएगा। शहर के सबसे बेहतरीन डॉक्टर वहां मौजूद हैं, इसलिए तुम ज्यादा फालतू की चिंता छोड़ दो। बस तुम अपना अभिनय का हिस्सा पूरा करो।"
माँ के ठीक होने की खबर सुनते ही सान्वी के दिल में सब्र का बांध टूट गया। उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े और उसने एक लंबी, राहत भरी सांस ली मानो दिल पर रखा बरसों पुराना बोझ एक पल में उतर गया हो। उसका मन हुआ कि वो आर्यन को शुक्रिया कहे, लेकिन तभी एहसास हुआ कि आर्यन अचानक उसके बहुत करीब आ गया।
इतना करीब कि सान्वी को उसकी सांसों की गर्माहट महसूस होने लगी। सान्वी का दिल जोर से धड़कने लगा और वो घबराकर दो कदम पीछे हटी, यहाँ तक कि उसकी पीठ दीवार से जा टकराई। कमरे की शांति में उसे अपनी ही धड़कनें साफ सुनाई दे रही थीं।
आर्यन सान्वी के करीब आया और अपना हाथ उसके चेहरे के ठीक बगल में दीवार पर टिका दिया। सान्वी की धड़कनें तेज हो गईं। आर्यन ने उसकी आंखों में सीधे देखते हुए बहुत धीमी लेकिन शांत आवाज में कहा, "सान्वी, एक बात अपने दिमाग में बिठा लो। दादी की तबीयत बहुत नाजुक है, उनका दिल कमजोर है। उन्हें जरा सा भी शक नहीं होना चाहिए कि हमारी यह शादी सिर्फ एक 'सौदा' है।"
उसने सान्वी के चेहरे पर आए डर को नज़रअंदाज़ करते हुए आगे कहा, "उनके सामने तुम्हें ऐसा बर्ताव करना है जैसे तुम दुनिया की सबसे खुश लड़की हो। अगर तुम्हारी आँखों में एक भी आंसू दिखा या तुम्हारे चेहरे पर ज़रा सी भी उदासी नज़र आई... तो याद रखना, तुम्हारे मां के अस्पताल का बिल भरने वाला हाथ उतनी ही जल्दी रुक भी सकता है।"
सान्वी का गला सूख गया था, उसने डरते हुए बस इतना कहा, "मैं... मैं समझ गई।"
आर्यन ने उसे एक आखिरी ठंडी नज़र से देखा और बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया। सान्वी वहीं खड़ी रह गई। उसे महसूस हुआ कि जिस आलीशान घर का लोग सपना देखते हैं, वह असल में उसके लिए एक 'सुनहरा पिंजरा' बन चुका है जहाँ उसकी मुस्कुराहट भी अब उसकी अपनी नहीं रही।
सान्वी ने जल्दी-जल्दी वह गुलाबी चंदेरी सिल्क साड़ी पहनी जो आर्यन ने उसे दी थी। साड़ी का कपड़ा इतना मुलायम और कीमती था कि सान्वी को यकीन था अगर वह साल भर भी जी-तोड़ मेहनत करती, तब भी शायद ऐसी साड़ी पहनना तो छोड़ दो। ऐसी साड़ी को देख पाना भी बड़ी सौभाग्य की बात होती है खरीदने की तो बात बहुत दूर की थी। आईने में देखते हुए उसने कांपते हाथों से अपनी कलाइयों में लाल चूड़ी चढ़ाई और मांग में गहरा सिन्दूर भरा। वह सिन्दूर, जो एक रस्म से ज्यादा अब उसके लिए एक बोझ जैसा था।
तैयार होकर जब वह सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी, तो उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसे अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी ऐसा लग रहा था जैसे वह घर की बहू बनकर नहीं, बल्कि किसी नाटक में अपना अभिनय का प्रदर्शन करने मंच पर जा रही हूं, जहाँ उसे सभी के सामने एक 'खुशहाल पत्नी' का रोल निभाना है। जहां हर कदम पर उसे आर्यन की वह धमकी याद आ रही थी। उसे डर था कि कहीं उसकी आँखों की आंसू की नमी उसकी सच्चाई बयान न कर दे।
नीचे के हॉल में अगरबत्ती और चंदन की मीठी सी खुशबू की महक पूरे हॉल में महसूस हो रही थी, जिससे सभी जगह काफी शांत और भक्तिमय लग रहा था। मंदिर के पास सिर्फ दादी ही नहीं बैठी थीं, बल्कि दादी के साथ घर के बाकी लोग भी बैठे थे। तथा आज सुबह ही उन सभी लोगों को पता चल गया था आर्यन की शादी के बारे में।
आर्यन की बुआ और चाची कोने में बैठकर आपस में दबी हुई धीमी जुबान में कुछ बातें कर रही थीं। उनकी आंखों की नजर में एक अजीब सी परख थी, जैसे कि वह सभी सान्वी को सिर से पैर बड़े गौर से देख रही हों कि वह उनके परिवार में रहने के लायक भी है कि नहीं। इन सभी लोगों के बीच में सावित्री देवी बैठी थीं जो राठौर खानदान की सबसे बड़ी बुजुर्ग थी। उनके चेहरे पर एक आकर्षण का ठहराव था, जिससे देखने पर साफ पता चलता था कि वह घर का हर छोटा-बड़ा फैसला उन्हीं की ईच्छा से होता है।
आर्यन नीचे कालीन पर दादी के पैर के पास बैठा था। सान्वी ने यह देखकर दंग रह गई कि जो आर्यन कमरे में इतना रुखा और सख्त व्यवहार कर रहा था, वह अपनी दादी के सामने बिल्कुल मोम जैसा नरम था। उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी और वह बड़े प्यार से दादी के हाथों को सहला रहा था।
"आ गई मेरी बहू रानी?" दादी ने सान्वी को देखते ही पुकारा। उनकी आवाज़ में इतना अपनापन था कि सान्वी का दिल भर आया। सान्वी ने झुककर उनके पैर छुए, तो दादी ने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा, "सदा सुहागन रहो, खुश रहो बेटा।"
सान्वी को सामने देखकर दादी की आँखों के कोने गीले हो गए। उन्होंने एक गहरी सांस ली और सिसकते हुए बोलीं, "चलो, आज तुझे देखकर मन को बड़ा संतोष मिला। सच कहूं तो मुझे नहीं लगा था कि जीते-जी अपने आर्यन का घर बसते हुए देख पाऊंगी कि नहीं।अब जाकर दिल को सुकून मिला। मेरे आर्यन का परिवार बस गया है, अब मुझे इसकी फिक्र नहीं।"
दादी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंखों के आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए सान्वी को निहारा। फिर शरारत भरी आवाज़ में बोलीं, "अब बस मेरी एक ही इच्छा बची है... जल्दी से इस सूने घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने दो। मेरे ऊपर जाने से पहले, मुझे अपने पड़पोता-पड़पोती का मुँह देखना है और उनके साथ खेलना है।"
दादी ने आर्यन की ओर मुड़कर उसे छेड़ते हुए कहा, "कि आर्यन, बहू तो तू बड़ी सुंदर लाया है! मुझे तो डर था कि पता नहीं कैसी लड़की पसंद करेगा, पर तेरी पसंद तो एकदम खरी निकली।"
दादी की बातें सुनकर आर्यन को अपने समझौते की शादी का ख्याल आया। उसने चुपचाप सान्वी की ओर देखा। सान्वी ने जब आर्यन की नज़रों में अपनी ओर देखा, तो उसे एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई
तभी पास बैठी बुआ जी ने अपनी भौहें सिकोड़ीं और तीखे स्वर में पूछा, "आर्यन, कल रात तुम दोनों चुपचाप घर में घुस आए, किसी को तो कानों-कान खबर का पता नहीं चला और यह कैसी शादी है? न कोई रिश्तेदार, न कोई तैयारी, न ढोल-नगाड़े! इतनी जल्दी क्या थी कि बिना किसी को बताए क्या किसी मंदिर में फेरे ले लिए?"
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। सान्वी के हाथ कांप गए, लेकिन आर्यन के चेहरे पर जरा से भी शिकन तक नहीं आई। उसने सान्वी के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपने करीब खींचते हुए सहजता से कहा, "बुआ जी, सान्वी की माँ की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वे सान्वी को दुल्हन के रूप में घर से विदा होते हुए देखना चाहती थी। हमारे पास शुभ मुहूर्त का लंबा इंतज़ार करने का वक्त नहीं था। और जहाँ तक शादी की शादी तैयारी की बात है, मैं सान्वी को खोना नहीं चाहता था, इसलिए हमने बड़े सिंपल तरीके से शादी करना फैसला किया।"
दादी ने भावुक होकर कहा, "छोड़ो भी विमला, बच्चों ने जो किया सही किया। प्यार में शादी की तैयारी नहीं, जीवन भर साथ मायने रखता है।" उन्होंने पास रखी एक मखमली डिब्बी उठाई और उसमें से सोने के दो भारी कंगन निकाले। "यह हमारे खानदान की पुश्तैनी निशानी है, बहु। आज से इन कंगनों पर तुम्हारा हक है।"
जब दादी ने वह भारी सोना सान्वी की कलाई में पहनाया, तो सान्वी को ऐसा लगा कि वह गहना नहीं, बल्कि किसी जेल की धातु की हथकड़ी जैसा महसूस हुआ। कुछ समय बाद नाश्ते की मेज पर व्यंजनों से भरा हुआ पूरा मेज तैयार था, लेकिन सान्वी के मुंह में एक निवाला भी नहीं निगला जा रहा था। चाची ने चाय का कप रखते हुए पूछा, "वैसे सान्वी, तुम दोनों मिले कैसे? आर्यन ने तो कभी तुम्हारा जिक्र तक भी नहीं किया।"
सान्वी का गला सूख गया। लेकिन आर्यन ने बड़े आराम से मेज के नीचे सान्वी का हाथ पकडा और मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "चाची, हम दोनों एक लाइब्रेरी में मिले थे। यह वहां शांति से अपनी किताबों में खोई थी और मैं जब इसे देखा तो देखता रह गया। इसकी सरलता की सादगी ही इसकी सबसे बड़ी अमीरी है।"
दादी खिलखिला कर हंसीं। "चलो, अच्छा हुआ। सान्वी बेटा, आर्यन थोड़ा सा जिद्दी है, लेकिन दिल का बुरा नहीं है। इसे संभाल लेना।" सान्वी ने नीची नज़रें करके कहा, "जी, मैं पूरी कोशिश करुँगी।"
तभी नौकर ने सूचना दी कि गाड़ी तैयार है। आर्यन खड़ा हुआ और सबके सामने सान्वी के माथे पर एक हल्का सा, दिखावटी चुंबन किया। सान्वी का पूरा शरीर घृणा और मजबूरी से सिहर उठा। "मैं चलता हूँ। शाम को मिलता हूँ, डार्लिंग," आर्यन ने 'डार्लिंग' शब्द पर ज़ोर दिया, जो सान्वी को किसी ताने की तरह लगा।
जब आर्यन चला गया, तो सान्वी को लगा जैसे वह आज़ाद हो गई हों। उसे ऐसा लगा कि जैसे उसके शरीर से एक भारी बोझ उतर गया हो लेकिन तभी दादी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, आज ससुराल में तुम्हारी पहली रसोई है। शगुन के रस्म लिए कुछ मीठा बनाओगी? आर्यन को गाजर का हलवा बहुत पसंद है।"
सान्वी ने एक फीकी मुस्कान दी। उसे याद आया कि उसकी माँ भी गाजर का हलवा बहुत अच्छा बनाती हैं। उसने खुद को समझाया— 'यह सब माँ के लिए है, सान्वी। बस एक साल... फिर यह नाटक खत्म हो जाएगा।' लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि 'राठौर मेंशन' के दरवाजे अंदर आने के लिए जितने आसान थे, बाहर जाने के लिए उतने आसान नहीं है।