Peace proposal by Shri Krishna in the royal court of Hastinapur! in Hindi Short Stories by Prithvi Nokwal books and stories PDF | श्री कृष्ण द्वार हस्तिनापुर की राजसभा में शांति प्रस्ताव!

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श्री कृष्ण द्वार हस्तिनापुर की राजसभा में शांति प्रस्ताव!

श्रीकृष्ण द्वारा शांति प्रस्ताव संवाद
(महाभारत प्रसंग पर आधारित विस्तृत संवाद)
हस्तिनापुर की राजसभा सजी हुई थी। विशाल स्तंभों से सुसज्जित उस सभा में कौरवों और पांडवों के बीच चल रहे तनाव की छाया स्पष्ट दिखाई दे रही थी। धृतराष्ट्र सिंहासन पर विराजमान थे, उनके पास भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, विदुर और अन्य सभासद बैठे थे। दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि गर्व से भरे हुए सभा में उपस्थित थे। उसी समय द्वारपाल ने सूचना दी—
“द्वार पर द्वारकाधीश श्रीकृष्ण पधारे हैं।”
सभा में हलचल मच गई। श्रीकृष्ण शांत मुखमुद्रा के साथ सभा में प्रवेश करते हैं। सभी उनका सम्मान करते हैं, किन्तु दुर्योधन अहंकारवश अपने स्थान पर ही बैठा रहता है।
श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र को प्रणाम किया और सभा के मध्य खड़े होकर बोले—
“हे कुरुवंश के महाराज धृतराष्ट्र! मैं आज यहाँ पांडवों का दूत बनकर उपस्थित हुआ हूँ। मेरा उद्देश्य युद्ध को टालना और शांति स्थापित करना है। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं, वह केवल विनाश का मार्ग खोलता है।”
धृतराष्ट्र ने गंभीर स्वर में कहा—
“माधव, आप सर्वज्ञ हैं। आप जो उचित समझें, वह कहें। मेरा हृदय भी इस युद्ध से व्यथित है।”
तब श्रीकृष्ण ने सभा को संबोधित करते हुए कहा—
“हे सभासदों! पांडवों ने सदैव धर्म का पालन किया है। उन्होंने छल और कपट का सहारा नहीं लिया। जुए में राज्य हार जाने के बाद भी उन्होंने तेरह वर्षों का वनवास सहन किया। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की। अब वे केवल अपना उचित अधिकार माँग रहे हैं।”
भीष्म पितामह ने सहमति में सिर हिलाया—
“वासुदेव सत्य कह रहे हैं। पांडवों ने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।”
श्रीकृष्ण आगे बोले—
“दुर्योधन! मैं तुमसे पूछता हूँ—क्या तुम्हें अपने ही भाइयों के साथ न्याय नहीं करना चाहिए? वे तुम्हारे शत्रु नहीं, तुम्हारे ही रक्त से उत्पन्न हैं। यदि राज्य का विभाजन ही समस्या है, तो आधा राज्य दे दो। यदि यह भी कठिन प्रतीत हो, तो केवल पाँच ग्राम दे दो—अवन्ती, वाराणाव्रत, वृकप्रस्थ, हस्तिनापुर के समीप कोई छोटा क्षेत्र। वे वहाँ शांति से जीवन व्यतीत कर लेंगे।”
सभा में सन्नाटा छा गया। सभी की दृष्टि दुर्योधन पर टिक गई।
दुर्योधन क्रोध से बोला—
“माधव! मैं सुई की नोक के बराबर भूमि भी पांडवों को नहीं दूँगा। राज्य मेरा है, और मैं इसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ूँगा। यदि युद्ध ही इसका समाधान है, तो युद्ध होगा।”
श्रीकृष्ण ने शांत किंतु गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“दुर्योधन, तुम्हारा यह अहंकार ही तुम्हारे पतन का कारण बनेगा। तुम अधर्म के मार्ग पर चल रहे हो। याद रखो, जहाँ धर्म होता है, वहीं विजय होती है। पांडवों के साथ न्याय करना ही तुम्हारा कल्याण है।”
शकुनि ने व्यंग्य करते हुए कहा—
“हे वासुदेव! राजनीति में धर्म की बातें व्यर्थ हैं। शक्ति ही सर्वोपरि है।”
तब श्रीकृष्ण ने दृढ़ स्वर में कहा—
“शक्ति का अर्थ अत्याचार नहीं होता, मामा शकुनि। सच्ची शक्ति संयम और न्याय में है। अधर्म की विजय क्षणिक होती है, परंतु धर्म की विजय शाश्वत होती है।”
विदुर ने समर्थन करते हुए कहा—
“महाराज, श्रीकृष्ण सत्य कह रहे हैं। यदि आज भी आप उचित निर्णय लें, तो यह विनाश टल सकता है।”
धृतराष्ट्र व्याकुल होकर बोले—
“दुर्योधन! मेरी बात मानो। पांडवों से शत्रुता छोड़ दो। मैं नहीं चाहता कि कुरुवंश का नाश हो।”
किन्तु दुर्योधन हँस पड़ा—
“पिताश्री! भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। हमारे पास विशाल सेना है, भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महान योद्धा हमारे साथ हैं। पांडव हमारा क्या बिगाड़ लेंगे?”
श्रीकृष्ण ने दुर्योधन की ओर गहरी दृष्टि से देखा और बोले—
“तुम्हें अपनी सेना पर गर्व है, परंतु यह मत भूलो कि पांडवों के साथ धर्म और सत्य हैं। अर्जुन जैसा धनुर्धर और भीम जैसा बलवान योद्धा उनके साथ है। मैं स्वयं उनके पक्ष में हूँ, यद्यपि शस्त्र नहीं उठाऊँगा।”
दुर्योधन ने क्रोध में आकर कहा—
“यदि आप पांडवों के पक्ष में हैं, तो आप हमारे शत्रु हैं। सैनिकों! इन्हें बंदी बना लो।”
सभा में हलचल मच गई। भीष्म और द्रोण ने दुर्योधन को रोकने का प्रयास किया, परंतु वह नहीं माना। उसी क्षण श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपना विराट रूप प्रकट किया।
उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। उनके भीतर सम्पूर्ण सृष्टि का दर्शन हो रहा था—सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, देवता, ऋषि, और अनगिनत ब्रह्मांड। सभा के सभी सदस्य विस्मित रह गए। धृतराष्ट्र ने भी दिव्य दृष्टि की याचना की और श्रीकृष्ण ने उन्हें कुछ क्षणों के लिए दृष्टि प्रदान की।
श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप से गूँजती हुई वाणी निकली—
“मैं काल हूँ, लोकसंहारक। जब अधर्म बढ़ता है, तब मैं धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेता हूँ। दुर्योधन, तुम्हारा विनाश निश्चित है यदि तुम अभी भी शांति का मार्ग नहीं अपनाते।”
दुर्योधन भयभीत तो हुआ, परंतु उसका अहंकार अभी भी जीवित था। उसने कहा—
“यह सब मायाजाल है। मैं अपने निर्णय से नहीं हटूँगा।”
श्रीकृष्ण ने पुनः अपना सामान्य रूप धारण किया और शांत स्वर में बोले—
“मैंने अपना कर्तव्य निभाया। मैंने शांति का प्रस्ताव रखा, परंतु यदि तुम युद्ध चाहते हो, तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो। यह युद्ध केवल भूमि के लिए नहीं, धर्म और अधर्म के मध्य होगा।”
सभा में गहरा मौन छा गया। भीष्म पितामह ने दुःखी होकर कहा—
“हाय! आज मैंने कुरुवंश के विनाश की आहट सुन ली है।”
विदुर ने आँसू भरे नेत्रों से कहा—
“जब राजा और राजकुमार विवेक खो देते हैं, तब विनाश निश्चित हो जाता है।”
श्रीकृष्ण ने अंत में धृतराष्ट्र से कहा—
“महाराज, अभी भी समय है। यदि आप चाहें, तो इस विनाश को रोक सकते हैं। परंतु यदि अधर्म का साथ देंगे, तो परिणाम से कोई नहीं बच सकेगा।”
यह कहकर श्रीकृष्ण सभा से प्रस्थान कर गए। उनके जाते ही सभा का वातावरण भारी हो गया। सभी को ज्ञात था कि अब युद्ध अवश्यंभावी है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव अस्वीकार हो गया। उन्होंने अंतिम प्रयास किया था कि भाई-भाई के बीच रक्तपात न हो, परंतु दुर्योधन के अहंकार और हठ ने समस्त प्रयासों को विफल कर दिया।
यह संवाद हमें यह शिक्षा देता है कि अहंकार और अधर्म अंततः विनाश की ओर ले जाते हैं। शांति, न्याय और धर्म ही स्थायी विजय का मार्ग हैं। श्रीकृष्ण का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था—जहाँ धर्म है, वहीं सच्ची विजय है।